जलज कुमार अनुपम

जलज कुमार अनुपम की रचनाएँ

मैं मुस्कुराता हूँ

कई दफा अपनों से छुपता हूँ
छुपाता हूँ
मैं मुस्कुराता हूँ
जब कोई पहेली सुलझ जाती है
या कोई रुठा अपना मान जाता है
मैं मुस्कुराता हूँ
जब कोई जीतता है अपना
या ऐसा कोई जिससे मुझे लगाव है
मैं मुस्कुराता हूँ
खुशी को नहीं तौलता बटखरे से
सबको जीता जाता हूँ
मैं मुस्कुराता हूँ
प्रारब्ध की गति नहीं मालूम मुझे
फिर भी सबको गले लगाता हूँ
मैं मुस्कुराता हूँ
नहीं मानता अच्छे और बुरे दौर को
रात के बाद दिन का आना तय है
यह सोच के इतराता हूँ
मैं मुस्कुराता हूँ
जब देखता हूँ गाँव से शहर भागते
और फिर लौटते कुछ को जड़ की ओर
मैं मुस्कुराता हूँ
विज्ञान की प्रगति देख अच्छा लगता है
फिर जब उसको प्रकृति के सामने लाचार पाता हूँ
मैं मुस्कुराता हूँ
जब कभी देखता हूँ
पापा की आँखों में गर्व के आँसू
माँ की आँखों में हरपल मेरे लिए प्यार
और पत्नी की आँखों में कुछ आशा, कुछ चिंता
मैं मुस्कुराता हूँ।

एक चिट्ठी

मन भीड़ मे एक अन्तर्देशी खोज रहा है
एक चिट्ठी लिखना चाहता है
तुम्हारे नाम
और उसमे समेटना चाहता है
मेरी कल्पनाओं को
जो सिर्फ़ प्यार की हैं,
मन
इश्क को मंजिल बनाना चाहता है
अब यही काम और मुकाम है
नकाम ही सही
जीना चाहता है उसे
आखिरी साँस तक
हर तिलस्म को तोड़
सारे आड़े-तिरछे ख्वाबों को
उस पत्र में सजाना चाहता है
समेटना चाहता है
और उसी के सहारे
मुहब्बत का
एक बीज रोपना चाहता है
सबके दिलों में।

सावन और मैं

इस बार सावन खफा है
लगता है कुछ अटक सा गया है
कल सपने में
गाँव आया था
कुछ चेहरे थे
और उसमें थी उदासीनता
जो मेरे है
और जिनका सिर्फ मै हूँ
साथ में बाँसवारी और ब्रह्म बाबा
उनके साथ गुजरते
पटहेरा और चुड़ीहारिन की टोकरी में
हरे रंगो की चुड़ीयाँ
गेरुवे और भगवा रंगों से लिपटी
देवघर जाने वाले यात्रियों की गूँज
घर की पुजा और झंडा मेला की यादें
साथ लाया था
पलायन की भट्ठी में
झुलस रहा हूँ
और बुलबुले से ख्वाबों के चक्कर में
खुद अपनो से दुर
होता जा रहा हूँ
जिसनें सिंचा बचपन
बनाया जवान
वह कराह रहा है
वह मेरी यादों को संजोए
टकटकी लगाए
बाट जोह रहा है ।

 

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