जलील आली

जलील आली की रचनाएँ

आँख में परतव-ए-महताब सलामत रह जाए

आँख में परतव-ए-महताब सलामत रह जाए
कोई सूरत हो कि इक ख़्वाब सलामत रह जाए

रोज़ ढह जाए ये हारा तन ओ जाँ का लेकिन
ढेर में इक दिल बे-ताब सलामत रह जाए

वो किसी ख़ैर ख़ज़ाने की ख़बर देता है
जो सफ़ीना पस-ए-सैलाब सलामत रह जाए

दिल किसी मौज-ए-जुनूँ में जो लहू से लिख दे
ऐसी तहरीर सर-ए-आब सलामत रह जाए

प्यार वो पेड़ है सौ बार उखाड़ो दिल से
फिर भी सीने में कोई दाब सलामत रह जाए

लाख वो शौक़-सहीफ़ों को जला लें ‘आली’
राख में इक न इक बाब सलामत रह जाए

अपने होने की इहानत नहीं हम कर सकते

अपने होने की इहानत नहीं हम कर सकते
सो तेरी याद से ग़फ़लत नहीं हम कर सकते

दिल में लाते नहीं दुश्मन से भी नफ़रत का ख़याल
इस से कम कोई इबादत नहीं हम कर सकते

दूर रहते हैं तकब्बुर ही हवा से लेकिन
इज्ज़ को गाफ़िल-ए-ग़ैरत नहीं हम कर सकते

मस्लहत सहर बहुत फूँकती फिरती है भरे
कम क़द-ओ-कामत वहशत नहीं हम कर सकते

ढेर तफ़रीह-ए-तन-ओ-जाँ के लगा दो जितने
तर्क इक दर्द की दौलत नहीं हम कर सकते

छोड़ सकते हैं ये सब सहन-ओ-दर-ओ-बाम-ए-जहाँ
क़रिया-ए-ख़्वाब से हिजरत नहीं हम कर सकते

अपने होने से इनकार किए जाते हैं

अपने होने से इनकार किए जाते हैं
हम कि रास्ता हम-वार किए जाते हैं

रोज़ अब शहर में सजते हैं तिजारत-मेले
लोग सहनों को भी बाज़ार किए जाते हैं

डालते हैं वो जो कश्कोल में साँसें गिन कर
कल के सपने भी गिरफ़्तार किए जाते हैं

किस को मालूम यहाँ असल कहानी हम तो
दरमियाँ का कोई किरदार किए जाते हैं

दिल पे कुछ और गुज़रती है मगर क्या कीजे
लफ़्ज़ कुछ और ही इज़हार किए जाते हैं

मेरे दुश्मन को ज़रूरत नहीं कुछ करने की
उस से अच्छा तो मेरे यार किए जाते हैं

बर्ग भर बार मोहब्बत का उठाया कब था

बर्ग भर बार मोहब्बत का उठाया कब था
तुम ने सीने में कोई दर्द बसाया कब था

अब जो ख़ुद से भी जुदा हो के फिरो हो बन में
तुम ने बस्ती में कोई दोस्त बनाया कब था

नक़्द-ए-एहसास कि इंसाँ का भरम होता है
हम ने खोया है कहाँ आने ने पाया कब था

शहर का शहर उमड़ आया है दिल-जूई को
दुश्मनों ने भी तेरी तरह सताया कब था

सई सहरा-ए-वफ़ा सैर-ए-गुलिस्ताँ कब थी
धूप ही धूप थी हर सू कोई साया कब था

अक्स क्या क्या थे निगाहों में फ़िरोजाँ ‘आली’
पर ये अंदाज़-ए-नज़र वक़्त को भाया कब था

दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से

दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से
कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से

बे-ताबी कुछ और बढ़ा दी एक झलक देने से
प्यास बुझे कैसे सहरा की दो बूँदें बरसा देने स

हँसती आँखें लहू रूलाएँ खिलते गुल चेहरे मुरझाएँ
क्या पाएँ बे-महर हवाएँ दिल धागे उलझा देने से

हम कि जिन्हें तारे बोने थे हम के जिन्हें सूरज थे उगाने
आस लिए बैठे हैं सहर की जलते दिए बुझा देने से

आली शेर हो या अफ़्साना या चाहत का ताना बाना
लुत्फ़ अधूरा रह जाता है पूरी बात बता देने से

ग़ुरूर-ए-कोह के होते नियाज़-ए-काह रखते हैं

ग़ुरूर-ए-कोह के होते नियाज़-ए-काह रखते हैं
तेरे हम-राह रहने को क़दम कोताह रखते हैं

अँधेरों में भी गुम होती नहीं सम्त-ए-सफ़र अपनी
निगाहों में फ़िरोज़ाँ इक शबीह-ए-माह रखते हैं

ये दुनिया क्या हमें अपनी डगर पर ले के जाएगी
हम अपने साथ भी मर्ज़ी की रस्म-ओ-राह रखते हैं

वो दीवार-ए-अना की ओट किस किस आग जलता है
दिल ओ दीदा को सब अहवाल से आगाह रखते हैं

दर-ओ-बसत-ए-जहाँ में देखते हैं सकम कुछ आली
और अपनी सोच का इक नक़्शा-ए-इस्लाह रखते हैं

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