जयप्रकाश मानस

जयप्रकाश मानस की रचनाएँ

कोई नहीं है बैठे-ठाले 

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कोई नहीं है बैठे-ठालेकीड़े भी सड़े-गले पत्तों को चर रहे हैं

कुछ कोसा बुन रहे हैं

केचुएँ आषाढ़ आने से पहले

उलट-पलट देना चाहते हैं ज़मीन

वनपांखी भी कुड़ा-करकट को बदल रहा है घोंसले में

भौंरा फूलों से बटोर रहा है मकरंद

साँप धानकुतरू चूहों की ताक में

उधर देखो – काले बादलों के पंजों से

किरणों को बचाने की कशमकश में चांद

पृथ्वी की सुंदरता में उनका भी कोई योगदान है

इनमें से किसी को शायद नहीं पता

फिर भी वे हैं कि लगे हुए रामधुन में

इसी समय –

नींद की कविता में

उतारा जा रहा है सुंदर पृथ्वी का सपना

अंधा कुआँ

कुएँ में पानी नहीं था पर वह था लबालब
जब तक वह रहा
पानी भरा रहा गाँव भर में

उसके करीब जाओ तो
मिट्टी की मीठी बोली सुनाई देती
माँओं, बहनों की कथाएँ याद आने लगतीं यक-ब-यक
गीत गाते लोग झिलमिला उठते रंग-बिरंगे परिधानों में
अब उसकी जगह नल रुक-रुककर निथरता रहता है
सिर्फ़ इतना ही नहीं
निथर चुका है अब गाँव भर का उल्लास

अभिसार

आना होगा जब उसे

आना होगा जब उसे

रोक नहीं सकती

भूखी शेरनी – सी दहाड़ती नदी

उलझा नहीं सकते

जादुई और तिलिस्मी जंगल

झुका नहीं सकते

रसातल को छूती खाई

आकाश को ऊपर उठाते पहाड़

पथभ्रण्ट देवताओं के मायावी कूट

अकारण बुनी गई वर्जनाएँ

समुद्री मछुआरों की जाल-सी

दसों दिशाओं को घेरती प्रलयंकारी लपटें

अभिसार के रास्ते में

नतमस्तक खड़ा हो जाता है सृष्टि-संचालक

स्वयं पुष्पांजलि लिए

आना होगा जब-जब उसे

वह आएगा ही

आकाश की आत्मकथा

नितांत एकाकी नदी हूँ
जब कोई न था, जब कुछ भी नहीं रहेगा
अंत के बाद भी बहता रहूँगा

वह उस दुनिया का सबसे बड़ा भ्रम ही है
जिन्हें दीखता है मेरी गोद में सूर्य, चंद्र, सितारे नक्षत्र
उनसे भी अलग एकदम अकेला
अपने रचयिता का सुनसान के सिवाय
कुछ भी नहीं हूँ मैं

मैं नहीं कर सकता मनपसंद भोर की सैर
मनुष्य की तरह
मेरे लिए कहीं नहीं है गप्पें मारने की जगह
बस्स,
टकटकी लगाकर देखता रहता हूँ पृथ्वी की परिक्रमा को

चौपाल

धूप का पर्वत बातों ही बातों में कट जाता
चारों दिशाओं से आकर एक लय में खिलखिलाने लगते

कई झरने नये पुराने
ठीक इसी जगह
जी हाँ, ठीक इसी जगह

पंच से पंडे तक
पटवारी से प्रधानमंत्री तक
पहचान लिये जाते अपनी नंगईयों के साथ
इस छोटे से दर्पण घर में

इसके स्पर्श से ही
साबुत बच जाता
जुम्मन और अलगू के बीच थरथराता पुल
मौसी की उदासियाँ लौट-लौट जातीं हर बार

मन में आ घुसा अँधेरा
चुपचाप आत्मसमर्पण कर देता
जब-जब वो इस मुकाम तक पहुँचता

दुर्दिन वाले हादसों के ख़िलाफ़
लामबद्ध करने की पाठशाला था यह
झुर्रीदार मस्तक की रेखाएँ फ्लैश की तरह बता देती
गाँव के दबे पाँव आने वाले संकटों की पदचाप

ठीक इसी जगह
जी हाँ, ठीक इसी जगह
अब खड़ी हो गई है पंचईत घर
जहाँ बैठा रहता है एक गिद्ध
कुछ कौवों, कुछ बाजों से गुंताड़ा करता हुआ
साथ में सिर हिलाता हुआ एक सरकारी बगुला

पुरखे

हम बहुत पहले से हैं
बहुत बाद तक हमीं झिलमिलाते रहेंगे
पहली बारिश से उमगती गंध की तरह
हमारी उपस्थिति है

भली-भाँति याद है हमें
चंदा को खिलौना बनाकर खेलने की ज़िद
तमतमाते सूरज को लील जाने की कोशिश

कुछ घर, कुछ गहने, कुछ रास्ते
जो भी बचा है दृश्य-अदृश्य
जो नहीं बचाया जा सका चाहा-अनचाहा
सारा का सारा किया-धऱा हमारा है

बहुत सारी नाकामयाबियों के बावजूद
किसी छोटी-सी नाकामयाबी पर
वर्षों मथते रहे हैं भीतर-बाहर

जब-तब उजड़ते रहे
बच ही जाते रहे हर बार हम

कभी पक्षी, कभी घास, कभी ओस बनकर
आ जाते हैं बिलकुल करीब
रात की, नींद की, सपनों की
रखवाली होती रहे इसी तरह

संसार के लिए सिर्फ़ शुभकामनाएँ
बुदबुदाते रहते हैं हमारे होंठ
हर घड़ी बाट जोहते हैं अपनों की हमीं

 

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