ज़फ़र गोरखपुरी की रचनाएँ

अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने

अब के साल पूनम में, जब तू आएगी मिलने
हम ने सोच रखा है रात यूँ गुज़ारेंगे
धड़कनें बिछा देंगे शोख़ तेरे क़दमों पे
हम निगाहों से तेरी आरती उतारेंगे

तू कि आज क़ातिल है, फिर भी राहत-ए-दिल है
ज़हर की नदी है तू, फिर भी क़ीमती है तू
पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे
ज़िन्दगी इधर आ जा, हम तुझे गुज़ारेंगे

आहनी कलेजे को, ज़ख़्म की ज़रूरत है
उँगलियों से जो टपके, उस लहू की हाज़त है
आप ज़ुल्फ़-ए-जानां के, ख़म सँवारिए साहब
ज़िन्दगी की ज़ुल्फ़ों को आप क्या सँवारेंगे

हम तो वक़्त हैं पल हैं, तेज़ गाम घड़ियाँ हैं
बेकरार लमहे हैं, बेथकान सदियाँ हैं
कोई साथ में अपने, आए या नहीं आए
जो मिलेगा रस्ते में हम उसे पुकारेंगे

अब्र था कि ख़ुशबू था, कुछ ज़रूर था एक शख़्स

अब्र था कि ख़ुशबू था, कुछ ज़रूर था एक शख़्स
हाथ भी नहीं आया, पास भी रहा एक शख़्स

मैं तो दस्तख़त कर दूँ, झूठ पर भी, ऐ लोगो !
सच पे जान देता है, मुझमें दूसरा एक शख़्स

क़ुर्बतों की ख़्वाहिश भी फ़ासले बढ़ाती है
कितना दूर लगता है, सामने खड़ा एक शख़्स

जब भी कोई समझौता ज़िन्दगी से करता हूँ
ज़ोर से लगाता है, मुझमें क़हक़हा एक शख़्स

चीख़ता नहीं, लेकिन टूटता है छूने से
अपने वास्ते ख़ुद ही, आबला[1] हुआ एक शख़्स

जाने कितने टुकड़ों में बँट के रह गया होगा
ख़्वाब की बहुत ऊँची, शाख़ से गिरा एक शख़्स

अश्क-ए-ग़म आँख से बाहर भी

अश्क-ए-ग़म आँख से बाहर भी नहीं आने का
अब्र छट जाएँ वो मंज़र भी नहीं आने का

अब के आग़ाज़-ए-सफ़र सोच समझ के करना
दश्त मिलने का नहीं घर भी नहीं आने का

हाए क्या हम ने तड़पने का सिला पाया है
ऐसा आराम जो आ कर भी नहीं आने का

अहद-ए-‘ग़ालिब’ से ज़्यादा है मेरे अहद का कर्ब
अब तो कूज़े में समंदर भी नहीं आने का

सब्ज़ा दीवार पे उग आया ‘ज़फ़र’ ख़ुश हो लो
आगे आँखों में ये मंज़र भी नहीं आने का

इकीसवीं सदी

दुःख सुख था एक सबका अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना

दादा हैं आते थे जब, मिटटी का एक घर था
चोरों का कोई खटका न डाकुओं का डर था
खाते थे रूखी-सूखी, सोते थे नींद गहरी
शामें भरी-भरी थीं, आबाद थी दुपहरी
संतोष था दिलों को माथे पे बल नहीं था
दिल में कपट नहीं था आँखों में छल नहीं था
थे लोग भोले-भाले लेकिन थे प्यार वाले
दुनिया से कितनी जल्दी सब हो गए रवाना

दुःख सुख था एक सबका अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना

अब्बा का वक़्त आया तालीम घर में आई
तालीम साथ अपने ताज़ा विचार लाई
आगे रवायतों [1] से बढ़ने का ध्यान आया
मिटटी का घर हटा तो पक्का मकान आया
दफ्तर की नौकरी थी, तनख्वाह का सहारा
मालिक पे था भरोसा हो जाता था गुज़ारा
पैसा अगरचे कम था फिर भी न कोई ग़म था
कैसा भरा-पूरा था अपना गरीब-खाना

दुःख सुख था एक सबका अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना

अब मेरा दौर है ये कोई नहीं किसी का
हर आदमी अकेला हर चेहरा अजनबी-सा
आँसूं न मुस्कराहट जीवन का हाल ऐसा
अपनी ख़बर नहीं है माया का जाल ऐसा
पैसा है, मर्तबा है, इज्ज़त, वक़ार[2] भी है
नौकर है और चाकर बंगला है कार भी है
ज़र पास है, ज़मीं है, लेकिन सुकूं नहीं है
पाने के वास्ते कुछ क्या-क्या पड़ा गंवाना

दुःख सुख था एक सबका अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना

ए आने वाली नस्लों, ए आने वाले लोगों
भोगा है हमने जो कुछ वो तुम कभी न भोगो
जो दुःख था साथ अपने तुम से करीब न हो
पीड़ा जो हम ने झेली तुमको नसीब न हो
जिस तरह भीड़ में हम तन्हा रहे अकेले
वो जिंदगी की महफ़िल तुमसे न कोई ले ले
तुम जिस तरफ़ से गुजरो मेला हो रौशनी का
रास आये तुमको मौसम इक्कीसवी सदी का
हम तो सुकूं को तरसे तुम पर सुकून बरसे
आनंद हो दिलों में जीवन लगे सुहाना

इरादा हो अटल तो मोजज़ा ऐसा भी होता है

इरादा हो अटल तो मोजज़ा[1] ऐसा भी होता है
दिए को ज़िंदा रखती है हव़ा, ऐसा भी होता है

उदासी गीत गाती है मज़े लेती है वीरानी
हमारे घर में साहब रतजगा ऐसा भी होता है

अजब है रब्त की दुनिया ख़बर के दायरे में है
नहीं मिलता कभी अपना पता ऐसा भी होता है

किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम[2] में उतर जाओ
तो शायद ये समझ पाओ, ख़ुदा ऐसा भी होता है

ज़बां पर आ गए छाले मगर ये तो खुला हम पर
बहुत मीठे फलों का ज़ायक़ा ऐसा भी होता है

तुम्हारे ही तसव्वुर[3] की किसी सरशार मंज़िल में
तुम्हारा साथ लगता है बुरा, ऐसा भी होता है

 

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