ज़फ़र सहबाई

ज़फ़र सहबाई की रचनाएँ

अक्स ज़ख़्मों का जबीं पर नहीं आने देता

अक्स ज़ख़्मों का जबीं पर नहीं आने देता
मैं ख़राश अपने यक़ीं पर नहीं आने देता

इसलिए मैं ने ख़ता की थी कि दुनिया देखूँ
वर्ना वो मुझ को ज़मीं पर नहीं आने देता

उम्र भर सींचते रहने की सज़ा पाई है
पेड़ अब छाँव हमीं पर नहीं आने देता

झूठ भी सच की तरह बोलना आता है उसे
कोई लुक्नत भी कहीं पर नहीं आने देता

अपने इस अह्द का इंसाफ़ है ताक़त का ग़ुलाम
आँच भी कुर्सी-नशीं पर नहीं आने देता

चाहता हूँ कि उसे पूजना छोडूँ लेकिन
कुफ्र जो ख़ूँ में है दीं पर नहीं आने देता

जब अधूरे चाँद की परछाईं पानी पर पड़ी

जब अधूरे चाँद की परछाईं पानी पर पड़ी
रौशनी इक ना-मुकम्मल सी कहानी पर पड़ी

धूप न कच्चे-फलों में दर्द का रस भर दिया
इश्क़ की उफ़्ताद ना-पुख़्ता जवानी पर पड़ी

गर्द ख़ामोशी की सब मेरे दहन से धुल गई
इस क़दर बारिश सुख़न की बे-ज़बानी पर पड़ी

उस ने अपने क़स्र से कब झाँक कर देखा हमें
कब नज़र उस की हमारे बे-मकानी पर पड़ी

अस्ल सोने पर था जितना भी मुलम्मा जल गया
धूप इस शिद्दत की अल्फ़ाज़ ओ मआनी पर पड़ी

तर्क कीजिए अब दिलों में नर्म गोशों की तलाश
बे-हिसी की ख़ाक हर्फ़-ए-मेहरबानी पर पड़ी

ज़ख़्म-ए-दिल उस की तवाज़ु में नमक-दाँ बन गया
ये मुसीबत भी हमारी मेज़बानी पर पड़ी

अपने हाथों टूटने का तजरबा तो हो गया
चोट बे-शक सख़्त थी जो ख़ुश-गुमानी पर पड़ी

कभी कभी कोई चेहरा ये काम करता है

कभी कभी कोई चेहरा ये काम करता है
मिरे बदन में लहू तेज़-गाम करता है

हर एक लफ़्ज़ को माह-ए-तमाम करता है
मिरी ज़बान से जब वो कलाम करता है

कई दिनों के सफ़र से मैं जब पलटता हूँ
वो अपने पूरे बदन से कलाम करता है

बहुत अज़ीज़ हैं उस को भी छुट्टियाँ मेरी
वो रोज़ कोई नया एहतिमाम करता है

शिकायतों की अदा भी बड़ी निराली है
वो जब भी मिलता है झुक कर सलाम करता है

मैं मुश्तहिर हूँ सितमगर की मेहरबानी से
वो अपने सारे सितम मेरे नाम करता है

किसी के हाथ में ख़ंजर किसी के हाथ में फूल
क़लम है एक मगर कितने काम करता है

जब उस से मिलता हूँ दफ़्तर को भूल जाता हूँ
‘ज़फ़र’ वो बातों ही बातों में शाम करता है

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे
अभी तो सुनना है अफ़्साने रात भर के मुझे

ये बात तो मिरे ख़्वाब ओ ख़याल में भी न थी
सताएँगे दर ओ दीवार मेरे घर के मुझे

मैं चाहता था किसी पेड़ का घना साया
दुआएँ धूप ने भेजी हैं सेहन भर के मुझे

वो मेरा हाथ तो छोड़ें कि मैं क़दम मोड़ूँ
बुला रहे हैं नए रास्ते सफ़र के मुझे

चराग़ रोए है जगमग किया था जिन का नसीब
वो लोग भूल गए ताक़चे में धर के मुझे

मैं अपने आप में वहशत का इक तमाशा था
हवाएँ फूल बनाती रहीं कतर के मुझे

तमाम अज़्मतें मश्कूक हो गईं जैसे
वो उथला-पन मिला गहराई में उतर के मुझे

दिलों के बीच न दीवार है न सरहद है
दिखाई देते हैं सब फ़ासले नज़र के मुझे

शब के ग़म दिल के अज़ाबों से अलग रखता हूँ

शब के ग़म दिल के अज़ाबों से अलग रखता हूँ
सारी ताबीरों को ख़्वाबों से अलग रखता हूँ

जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन
ज़िंदगी को मैं किताबों से अलग रखता हूँ

उसक की तक़्दीस पे धब्बा नहीं लगने देता
दामन-ए-दिल को हिसाबों से अलग रखता हूँ

ये अलम रेत को पानी नहीं बनने देता
प्यास को अपनी सराबों से अलग रखता हूँ

उस के दर पर नहीं लिखता मैं हिसाब-ए-दुनिया
दिल की मस्जिद को ख़राबों से अलग रखता हूँ

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