ज़ाकिर अली ‘रजनीश’की रचनाएँ

चुपके से बतलाना

बापू तुम्हें कहूँ मैं बाबा, या फिर बोलूँ नाना?
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

छड़ी हाथ में लेकरके क्यों, सदा साथ हो चलते?
दाँत आपके कहां गये, क्यों धोती एक पहनते?

हमें बताओ आखिर कैसे, तुम खाते थे खाना?
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

टीचर कहते हैं तुमने भारत आज़ाद कराया।
एक छड़ी से तुमने था दुश्मन मार भगाया।

कैसे ये हो गया अजूबा मुझे जरा समझाना।
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

भोला–भाला सा मैं बालक, अक्ल मेरी है थोड़ी।
कह देता हूं बात वही जो, आती याद निगोड़ी।

लग जाए गर बात बुरी तो रूठ नहीं तुम जाना।
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।

यह बस्ते का भार 

कब तक मैं ढ़ोऊँगा मम्मी, यह बस्ते का भार?

मन करता है तितली के पीछे मैं दौड़ लगाऊँ।
चिडियों वाले पंख लगाकर अम्बर में उड़ जाऊँ।

साईकिल लेकर जा पहुंचूँ मैं परी–लोक के द्वार।
कब तक मैं ढ़ोऊँगा मम्मी, यह बस्ते का भार?

कर लेने दो मुझको भी थोड़ी सी शैतानी।
मार लगाकर मुझको, मत याद दिलाओ नानी।

बिस्किट टॉफी के संग दे दो, बस थोड़ा सा प्यार।
कब तक मैं ढ़ोऊँगा मम्मी, यह बस्ते का भार?

सुन लो नई कहानी

अब्बक–डब्बक टम्मक–टूँ नाचे गु‍डिया रानी।
आसमान में छेद हो गया, बरसे झम–झम पानी।
आओ लल्लू, आओ पलल्लू, सुन लो नई कहानी।।

थोड़ा सा हम शोर मचाएँ, थोड़ा हल्ला–गुल्ला।
हम चाहे तो लड्डू खाएँ, हम चाहे रसगुल्ला।

लेकिन ध्यान रहे न ज़्यादा, हो जाए शैतानी।
आओ लल्लू, आओ पलल्लू, सुन लो नई कहानी।।

हम चाहें तो चंदा पर जाकर झंडा फहराएँ।
हम चाहें तो शेरों के भी दांतों को गिन आएँ।

हूई बात पूरी वो, जो है मन में हमने ठानी।
आओ लल्लू, आओ पलल्लू, सुन लो नई कहानी।।

परी कहाँ अब दुनिया में हैं कम्प्यूटर की बातें।
दिन बीतें धरती पर अपने, और चंदा पर रातें।

हम राजा, हम रानी, अपनी चले यहां मनमानी।
आओ लल्लू, आओ पलल्लू, सुन लो नई कहानी।।

जादू का पुडिया सा मौसम

कभी ताड़ सा लम्बा दिन है कभी सींक सा लगता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कुहरा कभी टूट कर पड़ता, चलती कभी हवाएँ।
आए कभी यूँ आँधी कि कुछ समझ में नहीं आए।

जमने लगता खून कभी तो सूरज कभी पिघलता।।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कभी बिकें अंगूर, अनार व कभी फलों का राजा।
कभी–कभी हैं बिकते जामुन बाज़ारों में ताज़ा।

लीची आज और कल आड़ू, मस्ती भरा उछलता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

बढ़ता जाता समय तेज गति हर कोई बतलाए।
छूट गया जो पीछे, वो फिर लौट कभी न आए।

पछताए वो, काम समय से जो अपना न करता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

Share