ज़ाहिद इमरोज़

ज़ाहिद इमरोज़ की रचनाएँ

इज़हार का मतरूक रास्ता

इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए लाज़मी नहीं
कि फूल ख़रीदे जाएँ
किसी होटल में कमरा लिया जाए
या परिंदे आज़ाद किए जाएँ

इज़हार-ए-मोहब्बत के लिए तुम अपने बोसे
काग़ज़ में लपेट कर भेज सकती हो
जिस तरह मैं ने अपने जज़्बे
तुम्हें पोस्ट कर दिए हैं

एक आवामी नज़्म 

हम ख़ाली पेट सरहद पर
हाथों की अम्न ज़ंजीर नहीं बना सकते
भूक हमारी रातें ख़ुश्क कर देती है
आँसू कभी प्यास नहीं बुझाते
रजज़ क़ौमी तराना बन जाए
तो ज़रख़ेज़ी क़हत उगाने लगती है
बच्चे माँ की छातियों से
ख़ून चूसने लगते हैं
कोई चेहरों पे परचम नहीं बनाता
और यौम-ए-आज़ादी पर लोग
फुल-झड़ियाँ नहीं अपनी ख़ुशियाँ जलाते हैं
फ़ौज कभी नग़्मे नहीं गुनगुना सकती
कि सिपाही खेतियाँ उजाड़ने वाले
ख़ुद-कार औज़ार होते हैं

क्या फूल नौ-बियाहता औरत के बालों
और बच्चों के लिबास पर ही जचता है
काश
वतन की हद हुदूद के तअय्युन के लिए
फूलों की कियारियाँ
आहिनी-तारों का मुतबादिल होतीं

अधूरी मौत का कर्ब

उसे ने मुझ से मोहब्बत की
मैं ने उसे अपना सीना छूने को कहा
उस ने मेरा दिल चूम कर
मुझे अमर कर दिया

मैं ने उस से मोहब्बत की
उस ने मुझे दिल चूमने को कहा
मैं ने उस का सीना छू कर
उसे हिदायत बख़्शी

हम दोनों जुदा हो गए
जुदाई ने हमारे ख़्वाब ज़हरीले कर दिए
यक साँसी मौत अब हमारी पहली तरजीह है
तन्हाई का साँप हमें रात भर डसता रहता है
और सुब्ह अपना ज़हर चूस कर
अगली रात डसने के लिए
ज़िंदा छोड़ जाता है

तज़ाद की काश्त

उसे ने मुझ से मोहब्बत की
मैं ने उसे अपना सीना छूने को कहा
उस ने मेरा दिल चूम कर
मुझे अमर कर दिया

मैं ने उस से मोहब्बत की
उस ने मुझे दिल चूमने को कहा
मैं ने उस का सीना छू कर
उसे हिदायत बख़्शी

हम दोनों जुदा हो गए
जुदाई ने हमारे ख़्वाब ज़हरीले कर दिए
यक साँसी मौत अब हमारी पहली तरजीह है
तन्हाई का साँप हमें रात भर डसता रहता है
और सुब्ह अपना ज़हर चूस कर
अगली रात डसने के लिएमैं ने कई रंग के साए सूँघे हैं
मगर दीवारों पर कंदा किए फूलों में
कभी ख़ुशबू नहीं महकी
मोहब्बत रूह में तब उतरती है
जब ग़मों की रेत और आँसुओं से
हम अपने अंदर शिकस्तगी तामीर करते हैं

जिस क़दर भी हँस लो
नजात का कोई रास्ता नहीं
तुम मोहब्बत के गुनहगार हो
सौ ग़म तुम्हारी हड्डियों में फैला हुआ है
अपने अमीक़ तजरबे से बताओ
एक मोहब्बत मापने के लिए
हमें दूसरी मोहब्बत क्यूँ तलाशना पड़ती है

मैं जमा हो कर कम पड़ गया हूँ
कहीं ऐसा तो नहीं
इर्तिक़ा की जल्द-बाज़ी में
मैं ने दो नफ़ी जोड़ लिए हैं

ज़िंदा छोड़ जाता है

चोर दरवाजा

मेरे ख़्वाब ज़ख़्मी हुए
तो दुनिया के सारे ज़ाब्ते झूठे लगे
मैं ने ज़िंदगी के लिए भीक माँगी
मगर आबाद लम्हों की पूजा के लिए
वक़्त कभी मेरे लिए न रूका
मुझे वेस्ट-पन से अपनाइयत महसूस हुई
लोग काग़ज़ों से बने खिलौने थे
जिन्हें हमेशा ख़िलाफ़-ए-मर्ज़ी नाचना पड़ा

भीगे साहिलों की हवा में ख़ून ही ख़ून था
झीलों के आबाद किनारे मुझे बंजर कर गए
पानी में तैरता मंज़र दग़ाबाज़ निकला
मैं मुख़ालिफ़ सम्त बहती कश्तियों में
ब-यक-वक़्त सवार हो गया
बादल बरस गए
तो आसमान पर धुआँ रह गया
मैंने ख़ुद को धुवें में उड़ाया
और मसरूफ़िसत से सौदा कर लिया

थूका हुआ आदमी

ज़िंदगी ने मुझे लकीर पर चलना सिखाया
मैं ने मुन्हरिफ़ होना सीख लिया

उस की अंदाम-ए-नहानी
साँप जनने में मसरूफ़ रही
और वो उन्हें मारने में
वो भी क्या करती
रात भर मेरी जगह इजि़्दहाम सोया रहा

अपनी बेकारी से तंग आ कर
मैं अपना उज़्व नीला करने चला आया
ऐसा करना जुर्म है
मगर क्या क्या जाए
एक भूक मिटाने के लिए दूसरी ख़रीदनी पड़ती है
अदालत ने मेरी आज़ादी के एवज़
मेरी हज़िए माँग लिए
लोगों ने मेरे मादा-ए-तौलीद से
दीवारों पर भूल बना लिए
और इबादत के लिए मेरा उज़्व

इंहिराफ़ ने मुझे कभी क़तार नहीं बनने दिया
मैं ने हमेशा चियँूटियों को गुमराह किया
एक दिन तंग आ कर
ज़िंदगी ने मुझे थूक दिया

ज़ख़्मी ख़्वाबों की तीसरी दुनिया

सदर-ए-मुम्लिकत ने
अपनी दौलत को ज़र्ब लगाई
और परा-ए-मुल्क में एक क़ब्र किराए पर ले ली
ता-कि उस की लाश महफ़ूज़ रहे

रौशनी ने दुनिया का सफ़र किया
मगर किसी अदालत में इंसाफ न मिला
कि अंधे तराज़ू ने तो कभी आँखें नहीं खोलीं
दीवारे तमाम रात जागती रहीं
सामान पड़ा रहा
लेकिन घरों से लड़कियाँ चुरा ली गईं

एक जिस्म को कई जिस्मों ने छुआ
तो बिचारी रूहों ने अपने चेहरों पर क़य की
लड़की माँ तो बनी बियाही न गई
उसे ने आँसुओं से ग़ुस्ल किया
मगर पाक न हुई

हमें दुनिया में ही दोज़ख़ मिली
क्यूँकि हम उस लड़की के घर पैदा हुए
जिस का बाप फ़ाक़े से मर गया
और माँ बेवा-ख़्वाबों की घुटन से

उस रात चाँद का क़त्ल कर दिया गया
और हम भाइयों ने
वीरान सड़क पर ख़ुद-कुशी कर ली

 

नीम-लिबासी का नौहा

तुम्हारी मोहब्बत को ज़िंदगी देने के लिए
मैं ने तो अपने सारे बुत तोड़ लिए
मगर तुम ने जवाबन
अपने काबे पर ग़िलाफ़ चढ़ा लिया
फ़क़त तवाफ़ से मेरी तशफ़्फ़ी नहीं हो सकती
मैं कैसे तुम्हारे अंदर झाँकूँ
बेबसी ने मुझे मेंडक बना दिया है
मैं अपनी ज़ात के कुएँ में पड़ा हूँ
और ख़्वाहिश मेरे ख़ून में
रस्सी की तरह लटक रही है
मैं कपड़ों में भी फ़ुहश कहलाया
तो लिबास मेरी क़ैद क्यूँ है
मुझे रंगत नहीं एहसास दर-कार है
क्यूँकि आँखों से ज़ियादा मेरे हाथ प्यासे हैं

लाज़मी नहीं सिर्फ़ आँख से रोया जाए
और रोने के लिए बेहतरीन जगह
वाशरूम ही हो सकती है
जहाँ में अपनी नीम-लिबासी थूक कर
तुम्हारे नाम का ग़ुस्ल कर सकता हूँ

 

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