ज़िया' ज़मीर

ज़िया’ ज़मीर की रचनाएँ

देखी नहीं, सुनी नहीं ऐसी वफ़ा कि यार बस

देखी नहीं सुनी नहीं ऐसी वफ़ा कि यार बस
वादे पे मेरे शख़्स वो ऐसे जिया कि यार बस

चाहीं रिफ़ाकतें अगर उससे तमाम उम्र की
सन्दली हाथ, हाथ पर ऐसे रखा कि यार बस

जह्न में यूँ ही आ गया तेरा ख़्याल एक शब
तारों से सारा आसमाँ ऐसा सजा कि यार बस

मैंने ज़रा-सी देर ही देखा था यार को अभी
जाने वो क्यों सिमट गया, कहने लगा कि यार बस

एक नज़र की बात थी जिसने तबाह कर दिया
नाज़ था जिस पे दिल वही ऐसा लुटा कि यार बस

होने को और भी बहुत हमसे जुदा हुए मगर
तू जो ज़रा जुदा हुआ दिल वो दुखा कि यार बस

राहे-हयात जब कभी लगने लगी बहुत कठिन
थाम के हाथ वो मेरा ऐसे चला कि यार बस

उसने कहा सुनो ‘ज़िया’ सज-धज के कुछ रहा करो
मुझको न जाने क्या हुआ ऐसा सजा कि यार बस

ज़र्द पत्ते थे, हमें और क्या कर जाना था

ज़र्द पत्ते थे, हमें और क्या कर जाना था
तेज़ आँधी थी मुक़ाबिल सो बिखर जाना था

वो भी जब तरके-तअल्लुक़ पे पशेमान न था
तुम को भी चाहिए यह था कि मुकर जाना था

क्यूँ भला कच्चे मकानों का तुम्हें आया ख़्याल
तुम तो दरिया थे, तुम्हें तेज़ गुज़र जाना था

हम कि हैं क़ाफला सालारों के मारे हुए लोग
आज भी यह नहीं मालूम किधर जाना था

इश्क में सोच समझ कर नहीं चलते साईं
जिस तरफ उसने बुलाया था उधर जाना था

क्या ख़बर थी कि यहाँ तेरी ज़रूरत होगी
हमनें तो बस दर-ओ-दीवार को घर जाना था

ऐसी हसरत थी सफ़र की कि ‘ज़िया’ मंज़िल को
हमने मंज़िल नहीं जाना था, सफ़र जाना था

इश्क़ से तेरे मेरे ज़ह्न के जुगनू जागे

इश्क़ से तेरे मेरे ज़ह्न के जुगनू जागे
लफ़्ज़ पैकर में ढले सोच के पहलू जागे

देखिए खिलता है अब कौन से एहसास का फूल
देखिए रूह में अब कौनसी ख़ुशबू जागे

जाने कब मेरे थके जिस्म की जागे क़िस्मत
जाने कब यार तेरे लम्स का जादू जागे

सोचता हूँ मैं यही जागते तन्हा जानाँ
रतजगा कैसा हो गर साथ मेरे तू जागे

चाँद तारों ने तका तेरा सरापा शब भर
देखने भर को तुझे रात में जुगनू जागे

वो समन्दर के सफ़र पर जो मेरे साथ चला
लहरें इठला के उठीं नींद से टापू जागे

तू भी पलकों पे सितारों को सजा ऐ शब भर
मेरी ही तरह मेरे यार कभी तू जागे

सोचता होगा ‘ज़िया’ वो गुलो-गुलज़ार बदन
अब के छूने से उसे कौनसी ख़ुशबू जागे

अब तो आते हैं सभी दिल को दुखाने वाले

अब तो आते हैं सभी दिल को दुखाने वाले
जाने किस राह गए नाज़ उठाने वाले

क्या गुज़रती है किसी पर यह कहाँ सोचते हैं
कितने बेदर्द हैं ये रूठ के जाने वाले

दर्द उनका कि जो फुटपाथ पे करते हैं बसर
क्या समझ पाएँगे ये राजघराने वाले

इश्क़ में पहले तो बीमार बना देते हैं
फिर पलटते ही नहीं रोग लगाने वाले

पार करता नहीं अब आग का दरिया कोई
थे कोई और जो थे डूब के जाने वाले

लाख तावीज़ बने लाख दुआएँ भी हुईं
मगर आए ही नहीं जो न थे आने वाले

तू भी मिलता है तो मतलब से ही अब मिलता है
लग गए तुझको भी सब रोग ज़माने वाले

अब वो बेलौस मोह

किसी को क्या पता जो महफ़िलों की जान होता है

किसी को क्या पता जो महफ़िलों की जान होता है
कभी होता है जब तन्हा तो कितनी देर रोता है

यह दुनिया है यहाँ होती है आसानी भी मुश्किल भी
बुरा भी ख़ूब होता है यहाँ अच्छा भी होता है

तेरी यादों के बादल से गुज़र होता है जब इसका
उदासी का परिंदा मुझसे मिलकर खूब रोता है

किसी को रिश्ते फूलों की तरह महकाए रखते हैं
कोई रिश्तों का भारी बोझ सारी उम्र ढोता है

बढ़ेगी उम्र जब उसकी तब उसका हाल पूछेंगे
अभी तो छोटा बच्चा है सुकूँ की नींद सोता है

‘ज़िया’ क्या शौक है चीज़ें पुरानी जमा करने का
ज़रा-सा दिल है दुनिया भर की यादों को संजोता है

ब्बत कहाँ मिलती है ‘ज़िया’
लोग मिलते ही नहीं अब वो पुराने वाले

ज़िन्दगी से थकी-थकी हो क्या

ज़िन्दगी से थकी-थकी हो क्या
तुम भी बेवज़ह जी रही हो क्या

मैं तो मुरझा गया हूँ अब के बरस
तुम कहीं अब भी खिल रही हो क्या

तुमको छूकर चमकने लगता हूँ
तुम कोई नूर की बनी हो क्या

इसकी ख़ुशबू नहीं है पहले-सी
शहर से अपने जा चुकी हो क्या

देखकर तुमको खिलने लगते हैं
तुम गुलों से भी बोलती हो क्या

आज यह शाम भीगती क्यों है
तुम कहीं छिप के रो रही हो क्या

सोचता हूँ तो सोचता यह हूँ
तुम मुझे अब भी सोचती हो क्या

 

 

Share