ज़ुबैर फ़ारूक़

ज़ुबैर फ़ारूक़ की रचनाएँ

आँखों में है बसा हुआ तूफ़ान देखना

आँखों में है बसा हुआ तूफ़ान देखना
निकले हैं दिल से यूँ मिरे अरमान देखना

भूला हूँ जिस के वास्ते मैं अपने आप को
वो भी है मेरे हाल से अंजान देखना

देखा जो मुस्कुराते हुए आज उन को फिर
रौशन हुआ है जीने का इम्कान देखना

है हर्फ़ हर्फ़ ज़ख़्म की सूरत खिला हुआ
फ़ुर्सत मिले तो तुम मिरा दीवान देखना

चारों तरफ़ है फैला हुआ सब्ज़ा-ज़ार सा
बादल का है ज़मीन पर एहसान देखना

आँखों में अश्क लब पे फ़ुग़ाँ दिल फ़िगार सा
राह-ए-वफ़ा में जीने का सामान देखना

चलता हूँ एहतियात से ‘फ़ारूक़’ इस लिए
कर लूँ न फिर कहीं कोई नुक़सान देखना

लोग कहते हैं यहाँ एक हसीं रहता था

लोग कहते हैं यहाँ एक हसीं रहता था
सर-ए-आईना कोई माह-जबीं रहता था

वो भी क्या दिन थे कि बर-दोश-ए-हवा थे हम भी
आसमानों पे कोई ख़ाक-नशीं रहता था

मैं उसे ढूँढता फिरता था बयाबानों में
वो ख़ज़ाने की तरह ज़ेर-ए-ज़मीं रहता था

फिर भी क्यूँ उस से मुलाक़ात न होने पाई
मैं जहाँ रहता था वो भी तो वहीं रहता था

जाने ‘फ़ारूक़’ वो क्या शहर था जिस के अंदर
एक डर था कि मकीनों में मकीं रहता था

मेरा सारा बदन राख हो भी चुका मैं ने दिल को बचाया है तेरे लिए

मेरा सारा बदन राख हो भी चुका मैं ने दिल को बचाया है तेरे लिए
टूटे फूटे से दीवार-ओ-दर हैं सभी फिर भी घर को सजाया है तेरे लिए

कितनी मेहनत हुई ख़ूँ पसीना हुआ जिस्म मिट्टी हुआ रंग मैला हुआ
ख़ुद तो जलता रहा दोज़खों में मगर घर को जन्नत बनाया है तेरे लिए

तेरी हर बात थी तल्ख़ियों से भरी तेरा लहजा सदा मुझ को डसता रहा
फिर भी थक हार कर अपना दामन मार कर मैं ने ख़ुद को मनाया है तेरे लिए

मेरे हर साँस में हुक्म शामिल तिरा मैं हिला भी तो मर्ज़ी से तेरी हिला
तू ने जो कुछ भी चाहा वही हो गया मैं ने ख़ुद को गँवाया है तेरे लिए

लोग कहते हैं बेचारे ‘फ़ारूक़’ की मौत हो भी चुकी ज़िंदगी के लिए
अपनी हस्ती मिटाई है तेरे लिए उस को जीना भी आया है तेरे लिए

साफ़ आईना है क्यूँ मुझे धुँदला दिखाए दे

साफ़ आईना है क्यूँ मुझे धुँदला दिखाए दे
गर अक्स है ये मेरा तो मुझ सा दिखाई दे

मुझ को तो मार डालेगा मेरा अकेला-पन
इस भीड़ में कोई तो शनासा दिखाई दे

बर्बाद मुझ को देखना चाहे हर एक आँख
मिल कर रहूँगा ख़ाक में ऐसा दिखाई दे

ये आसमाँ पे धुँद सी छाई हुई है क्या
गर अब्र है तो हम को बरसता दिखाई दे

ये मुझ को किस मक़ाम पे ले आई ज़िंदगी
या रब कोई फ़रार का रस्ता दिखाई दे

‘फारूक़’ दिल का हाल मैं जा कर किसे कहूँ
हर चेहरा मुझ को अपना ही चेहरा दिखाई दे

वाक़िआ कोई तो हो जाता सँभलने के लिए

वाक़िआ कोई तो हो जाता सँभलने के लिए
रास्ता मुझ को भी मिलता कोई चलने के लिए

क्यूँ न सौग़ात समझ कर मैं उसे करता क़ुबूल
भेजते ज़हर वो मुझ को जो निगलने के लिए

इतनी सर्दी है कि मैं बाँहों की हरारत माँगूँ
रूत ये मौज़ूँ है कहाँ घर से निकलने के लिए

चाहिए कोई उसे नाज़ उठाने वाला
दिल तो तय्यार है हर वक़्त मचलने के लिए

अब तो ‘फ़ारूक़’ इसी हाल में ख़ुश रहते हैं
वक़्त है पास कहाँ अपने बदलने के लिए

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