ज़ुल्फ़िकार नक़वी की रचनाएँ

दूर तक इक सराब देखा है

दूर तक इक सराब देखा है
वहशतों का शबाब देखा है

ज़ौ-फ़िशाँ क्यूँ है दश्त के ज़र्रे
क्या कोई माहताब देखा है

बाम ओ दर पर है शोलगी रक़्साँ
हुस्न को बे-नक़ाब देखा है

नामा-बर उन से बस यही कहना
नीम-जाँ इक गुलाब देखा है

अब ज़मीं पर क़दम नहीं टिकते
आसमाँ पर उक़ाब देखा है

मेरी नज़रों में बाँकपन कैसा
जागता हूँ कि ख़्वाब देखा है

बेचैनी के लम्हे साँसें पत्थर की

बेचैनी के लम्हे साँसें पत्थर की
सदियों जैसे दिन हैं रातें पत्थर की

पथराई सी आँखें चेहरे पत्थर के
हम ने देखीं कितनी शक्लें पत्थर की

गोरे हों या काले सार पर बरसे हैं
परखी हम ने सारी ज़ातें पत्थर की

नीलामी के दर पर बेबस शर्मिंदा
ख़ामोशी में लिपटी आँखें पत्थर की

दिल की धड़कन बढ़ती जाए सुन सुन कर
शीशागर के लब पर बातें पत्थर की

अंदर की आराइश-ए-नाज़ुक क्या होगा
बाहर वज़नी हैं दीवारें पत्थर की

आओ मिल कर उन में ढूँढें आदम-ज़ाद
चलती फिरती जो हैं लाशें पत्थर की

सदियों के बाद होश में जो आ रहा हूँ मैं

सदियों के बाद होश में जो आ रहा हूँ मैं
लगता है पहले जुर्म को दोहरा रहा हूँ मैं

पुर-हौल वादियों का सफ़र है बहुत कठिन
ले जा रहा है शौक़ चला जा रहा हूँ मैं

ख़ाली हैं दोनों हाथ और दामन भी तार तार
क्यूँ एक मुश्त-ए-ख़ाक पे इतरा रहा हूँ मैं

शौक़-ए-विसाल-ए-यार में इक काट दी
अब बाम ओ दर सजे हैं तो घबरा रहा हूँ मैं

शायद वरक़ है पढ़ लिया कोई हयात का
बन कर फ़कीह-ए-शहर जो समझा रहा हूँ मैं

साहिल पे बैठा देख के मौजों का इजि़्तराब
उलझी हुई सी गुत्थियाँ सुलझा रहा हूँ मैं

सिलसिला-दर-सिलसिला जुज़्ब-ए-अदा होना ही था

सिलसिला-दर-सिलसिला जुज़्ब-ए-अदा होना ही था
आख़िरश तेरी नज़र का मुद्दआ होना ही था

कू-ब-कू सहरा-ब-सहरा हम-सफ़र था इजि़्तराब
इक नया महशर नया इक हादसा होना ही था

डस रहा था तेरी यादों का मुसलसल अज़दहा
लहज़ा लहज़ा फ़िक्र में इक सानेहा होना ही था

हाथ उट्ठे चश्म-ए-तर थी दिल भी था महव-ए-फ़ुग़ाँ
हाशिया-दर-हाशिया हर्फ़-ए-दुआ होना ही था

खींच ली थी इक लकीर-ए-ना-रसा ख़ुद दरमियाँ
फ़ासला-दर-फ़ासला-दर-फ़ासला होना ही था

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