जावेद अनवर

जावेद अनवर

अज़ब ख़्वाबों से मेरा राबता रक्खा गया

अज़ब ख़्वाबों से मेरा राबता रक्खा गया
मुझे सोए-हुवों में जागता रक्खा गया

वो कोई और घर थे जिन में तय्यब रिज़्क़ पहुँचे
हमें तो बस क़तारों में खड़ा रक्खा गया

मोअत्तल कर दिए आज़ा से आज़ा के रवाबित
यहाँ जिस्मों को आँखों से जुदा रक्खा गया

वो जिस पर सिर्फ़ फूलों की दुआएँ फूटती हैं
उसी मिट्टी में वो दस्त-ए-दुआ रक्खा गया

अजीब सानेहा गुज़रा है इन घरों पे कोई

अजीब सानेहा गुज़रा है इन घरों पे कोई
के चौंकता ही नहीं अब तो दस्तकों पे कोई

है बात दूर की मंज़िल का सोचना अब तो
के रस्ता खुलता नहीं है मुसाफिरों पे कोई

उजाड़ शहर के रस्ते जिन्हें सुनाते हैं
यक़ीन करता है कब उन कहानियों पे कोई

वो ख़ौफ़ है के बदन पत्थरों में ढलने लगे
अजब घड़ी के दुआ भी नहीं लबों पे कोई

हवा भी तेज़ न थी जब परिंदा आ के गिरा
नहीं था ज़ख़्म भी ‘जावेद’ इन परों पे कोई

बे-तुकी रौशनी में पराए अँधेरे लिए

बे-तुकी रौशनी में पराए अँधेरे लिए
एक मंज़र है तेरे लिए एक मेरे लिए

इक गुल-ए-ख़्वाब ऐसा खुला शाख़ मुरझाा गई
मैं ने मस्ती में इस्म के सात फेरे लिए

दर दरीचे मुक़फ्फ़ल किए कुंजियाँ फेंक दीं
चल पड़े अपने कंधों पे अपने बसेरे लिए

तेरी ख़ातिर मेरे गर्म ख़ित्ते की ठंडी हवा
सब हरी टहनियाँ और उन पर खिले फूल तेरे लिए

शाम-ए-वादा ने किस दिन हमारा इरादा सुना
कब किसे शब मिली और किस ने सवेरे लिए

मेरी तहरीरों का महवर एक बे-सर फ़ाख़्ता

मेरी तहरीरों का महवर एक बे-सर फ़ाख़्ता
मेरा नारा ख़ामोशी मेरा पयम्बर फ़ाख़्ता

एक आँगन क़हक़हों और सिसकियों से बे-ख़बर
छत पे इक परचम फटा सा और दर पर फ़ाख़्ता

तेरे रस्तों की रूकावट शाख़ इक जैतून की
तेरे ऐवानों के अंदर जागता दर फ़ाख़्ता

शाम प्यारी शाम उसपर भी कोई दर खोल दे
शाख़ पर बैठी हुई है एक बे-घर फ़ाख़्ता

एक जानिब उजले पानी का बुलावा और हुआ
दूसरी सम्त इक अकेली और बे-पर फ़ाख़्ता

मुहीब रात के गुंजान पानियों से निकल

मुहीब रात के गुंजान पानियों से निकल
नई सहर के सितारे तू चिमनियों से निकल

हर एक हद से परे अपना बोरिया ले जा
बदी का नाम न ले और नेकियों से निकल

ऐ मेरे मेहर तू उस की छतों पर आख़िर हो
ऐ मेरे माह तू आज उस की खिड़कियों से निकल

निकल के देख तेरी मंुतज़िर क़तार क़तार
अज़ीज़ दान-ए-गंदुम तू बोरियों से निकल

तू मेरी नज़्म के असरार में हुवैदा हो
तू मेरे कश्फ़ की ना-दीदा घाटियों से निकल

ऐ पिछली उम्र इधर सूखी पत्तियों में आ
ऐ अगले साल बुझी मोम-बत्तियों से निकल

फिर अपनी ज़ात की तीरा-हदों से बाहर आ

फिर अपनी ज़ात की तीरा-हदों से बाहर आ
तू अब तो ज़ब्त के इन शोबदों से बाहर आ

मैं देख लूँगा तेरे अस्प तेरे ज़ोर-आवर
बस एक बार तू अपनी हदों से बाहर आ

दहक दहक के बहलते दिनों के आँसू पोंछ
अज़ान-ए-गुँग मेरे गुम्बदों से बाहर आ

तुझे मैं ग़ौर से देखूँ मैं तुझ से प्यार करूँ
ऐ मेरे बुत तू मेरे बुत-कदों से बाहर आ

तवील और न कर अब विसाल की साअत
नवा-ए-सुब्ह-ए-सफ़र माबदों से बाहर आ

तू अब तो फोड़ ले आँखें तू अब तो रो ‘जावेद’
तू अब तो ज़ब्त के इन शोबदों से बाहर आ

निकल गुलाब की मुट्ठी से और ख़ुश-बू बन

निकल गुलाब की मुट्ठी से और ख़ुश-बू बन
मैं भागता हूँ तेरे पीछे और तू जुगनू बन

तू मेरे दर्द की ख़ामोश हिचकियों में आ
तू मेरे ज़ख़्म की तनहाइयों का आँसू बन

मैं झील बनता हूँ शफ़्फ़ाक पानियों से भरी
तू दौड़ दौड़ थका बे-क़रार आहू बन

तू मेरी रात की तारीकियों को गाढ़ा कर
मेरे मकान का तनहा चराग़ भी तू बन

फिर उस के बाद सभी वुसअतें हमारी हैं
मैं आँख बनता हूँ ‘जावेद’ और तू बाज़ू बन

ऐ सैल-ए-आब ठहर अब के गर्दनों तक रह

ऐ सैल-ए-आब ठहर अब के गर्दनों तक रह
तनों की तख़्तियाँ धोनी हैं बस तनों तक रह

जहाँ है शहर वहाँ दूर तक दरिन्दे हैं
ग़ज़ल, ग़ज़ाल के होंटों पे आ बनों तक रह

गली में ताक में बैठे हैं तिफ़्ल-ए-सँग-ब-दस्त
ऐ मेरी ख़्वाहिश-ए-अय्यार आँगनों तक रह

बहुत से काम हैं जिन से निपटना बाक़ी है
विसाल-रुत तो बड़ी शय है सावनों तक रह

हवा में तीर चलाने से फ़ाएदा ‘जावेद’
तिरी जब आँखें खुली हैं तो दुश्मनों तक रह

कोई कहानी कोई वाक़िआ सुना तो सही

कोई कहानी कोई वाक़िआ सुना तो सही
अगर हंसा नहीं सकता मुझे रुला तो सही

किसी के हिज्र का छल्ला किसी विसाल की छाप
बिछड़ के मुझ से तुझे क्या मिला दिखा तो सही

कभी बुला तो सही अपने आस्ताने पर
मुझे भी अपना कोई मोजज़ा दिखा तो सही

मैं ख़ूद से छुप के तुझे प्यार करने आऊँगा
तू एक बार मुझे भूल कर बुला तो सही

किसे ख़बर यहीं तेरा शिकार हो ‘जावेद’
तू चन्द तीर अन्धेरे में ही चला तो सही

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