जावेद नासिर की रचनाएँ

बहुत उदास था उस दिन मगर हुआ क्या था

बहुत उदास था उस दिन मगर हुआ क्या था
हर एक बात भली थी तो फिर बुरा क्या था

हर एक लफ़्ज़ पे लाज़िम नहीं कि ग़ौर करूँ
ज़रा सी बात थी वैसे भी सोचना क्या था

मुझे तो याद नहीं है वहाँ की सब बातें
किसी किसी पे नज़र की थी देखना क्या था

गली भी एक थी अपने मकाँ भी थे नज़दीक
इसी ख़याल से आया था पूछना क्या था

मैं जिस की ज़द में रहा आख़िरी तसल्ली तक
ख़ुदा-ए-बरतर-ओ-आला वो सिलसिला क्या था

दुनिया है तेज़ धूप समुंदर है जैसे तू

दुनिया है तेज़ धूप समुंदर है जैसे तू
बस एक साँस और कि मंज़र है जैसे तू

ये और बात है कि बहुत मुक़्तदिर हूँ मैं
है दस्त-रस में कोई तो पल भर है जैसे तू

बस चलते चलते मुझ को बदन की रविश मिली
वर्ना ये सर्द शाम भी पत्थर है जैसे तू

क्या जाने किस सदी का तकल्लुफ़ है दरमियाँ
ये रोज़ ओ शब की धूल ही बेहतर है जैसे तू

घर की तसल्लियों में जवाज़-ए-हुनर तो है

घर की तसल्लियों में जवाज़-ए-हुनर तो है
इन जंगलों में रात का झूठा सफ़र तो है

जिस के लिए हवाओं से मुँह पोंछती है नींद
इस जुरअत-ए-हिसाब में ख़्वाबों का डर तो है

खुलती हैं आसमाँ में समुंदर की खिड़कियाँ
बे-दीन रास्तों पे कहीं अपना घर तो है

रौशन कोई चराग़ मज़ार-ए-हवा पे हो
पल्कों पे आज रात ग़ुबार-ए-सहर तो है

हैरत से देखती है दरीचों की सफ़ यहाँ

हैरत से देखती है दरीचों की सफ़ यहाँ
बनते हैं जान-बूझ के साए हदफ़ यहाँ

किन किन की आत्माएँ पहाड़ों में क़ैद हैं
आवाज़ दो तो बजते हैं पत्थर के दफ़ यहाँ

छनती हैं जंगलों में दरख़्तों से रौशनी
धब्बे हैं कैसे धूप के चारों तरफ़ यहाँ

उठ उठ के आसमाँ को बताती है धूल क्यूँ
मिट्टी में दफ़्न हो गए कितने सदफ़ यहाँ

ग़ुस्सा था जाने कौन सी सदियों का उन के पास
आँखों से अब भी बहता है ख़्वाबों का कफ़ यहाँ

Share