जावेद सबा

जावेद सबा की रचनाएँ

बड़ी मुश्किल से छुपाया है कोई देख न ले

बड़ी मुश्किल से छुपाया है कोई देख न ले
आँख में अश्क जो आया है कोई देख न ले

ये जो महफ़िल में मेरे नाम से मौजूद हूँ मैं
मैं नहीं हूँ मेरा धोका है कोई देख न ले

सात पर्दों में छुपा कर उसे रक्खा है मगर
दिल को अब भी यही धड़का है कोई देख न ले

डर रहा हूँ के सर-ए-शाम तेरी आँखों में
मैं ने जो वक़्त गुज़ारा है कोई देख न ले

हाथ नरमी से छुड़ाती हुई ख़ल्वत ने कहा
ये जो ख़ल्वत है तमाशा है कोई देख न ले

तेरा मेरा कोई रिश्ता तो नहीं है लेकिन
मैं ने जो ख़्वाब में देखा है कोई देख न ले

साथ चलना है तो ग़ैरों की तरह साथ न चल
शहर का शहर शनासा है कोई देख न ले

बर तरफ़ करके तकल्लुफ़ इक तरफ़ हो जाइए

बर तरफ़ कर के तकल्लुफ़ इक तरफ़ हो जाइए
मुस्तक़िल मिल जाइये या मुस्तक़िल खो जाइए

क्या गिले शिकवे के किस ने किस की दिल-दारी न की
फै़सला कर ही लिया है आप ने तो जाइए

मेरी पलकें भी बहुत बोझल हैं गहरी नींद से
रात काफी हो चुकी है आप भी सो जाइए

आप से अब क्या छुपाना आप कोई ग़ैर हैं
हो चुका हूँ मैं किसी का आप भी हो जाइए

मौत की आग़ोश में गिरिया-कुनाँ है जिं़दगी
आइए दो चार आँसू आप भी रो जाइए

शाएरी कार-ए-जुनूँ है आप के बस की नहीं
वक़्त पर बिस्तर से उठिए वक़्त पर सो जाइए

लहराता है ख़्वाब-सा आँचल और मैं लिखता जाता हूँ

लहराता है ख़्वाब सा आँचल औंर में लिखता जाता हूँ
पलकें नींद से बोझल और मैं लिखता जाता हूँ

जैसे मेरे कान में कोई चुपके चुपके कहता है
इश़्क जुनूँ है इश़्क है पागल और मैं लिखता जाता हूँ

छोटी छोटी बात पे उस की आँखें भर भर आती हैं
फैलता रहता है फिर काजल और मैं लिखता जाता हूँ

आँख में उस के अक्स की आहट दस्तक देती रहती है
भर जाती है अश्क से छागल और मैं लिखता जाता हूँ

मद्धम मद्धम साँस की ख़ुश-बू मीठे मीठे दर्द की आँच
रह रह के करती है बे-कल और मैं लिखता जाता हूँ

धीमे सुरों में दर्द का पंछी अपनी धुन में गाता है
प्यासी रूहें प्यास का जंगल और मैं लिखता जाता हूँ

उस के प्यार की बूँदें टप टप दिल में गिरती रहती हैं
नर्म गुदाज़ ओ शोख़ ओ चंचल और में लिखता जाता हूँ

महसूस करोगे तो गुज़र जाओगे जाँ से

महसूस करोगे तो गुज़र जाओगे जाँ से
वो हाल है अंदर से के बाहर है बयाँ से

वहशन का ये आलम के पस-ए-चाक गिरेबाँ
रंज़िश है बहारों से उलझते हैं ख़िज़ाँ से

इक उम्र हुई उस के दर ओ बाम को तकते
आवाज़ कोई आई यहाँ से न वहाँ से

उठते हैं तो दिल बैठने लगता है सर-ए-बज़्म
बैठे हैं तो अब मर के ही उठेंगे यहाँ से

हर मोड़ पे वा हैं मेरी आँखों के दरीचे
अब देखना ये है कि वो जाता है कहाँ से

क्या नावक-ए-मिज़गाँ से रखें ज़ख़्म की उम्मीद
चलते हैं यहाँ तीर किसी और कमाँ से

आँखों से अयाँ होता है आलम मेरे दिल का
मतलब है इस आलम को ज़बाँ से न बयाँ से

सब का दिल-दार है दिल-दार भी ऐसा-वैसा

सब का दिल-दार है दिल-दार भी ऐसा वैसा
इक मेरा यार है और यार भी ऐसा वैसा

दुश्मन-ए-जाँ भी नहीं कोई बराबर उस के
और मेरा हाशिया-बरदार भी ऐसा वैसा

बे-तअल्लुक ही सही उस को मगर है मुझ से
इक सरोकार सरोकार भी ऐसा वैसा

उस का लहजा के बहुत सादा ओ मासूम सही
है फ़ुँसू-कार फ़ुँसू-कार भी ऐसा वैसा

‘ज़ौक़’ से उस को अक़ीदत है के अल्लाह अल्लाह
और ‘गालिब़’ का तरफ़दार भी ऐसा वैसा

क्या ज़माना था के जब अहल-ए-हवस के नज़दीक
कोई मेयार था मेयार भी ऐसा वैसा

मैं भी तमसील-निगारी में बहुत आगे था
वो भी फ़न-कार था फ़न-कार भी ऐसा वैसा

कोई उफ़्ताद पड़ी थी के अभी तक चुप था
इक सुख़न-कार सुख़न-कार भी ऐसा वैसा

एक थी जुरअत-ए-इंकार कि ऐसी वैसी
एक दरबार था दरबार भी ऐसा वैसा

जिस का शाहों की नज़र में कोई किरदार न था
एक किरदार था किरदार भी ऐसा वैसा

इस इसरार था इसरार भी बैअत के लिए
एक इंकार था इंकार भी ऐसा वैसा

तस्बीह-ओ-सज्दा-गाह भी सजदा भी मस्त-मस्त

तस्बीह ओ सज्दा-गाह भी सज्दा भी मस्त मस्त
क़िबला भी मस्त मस्त है काबा भी मस्त मस्त

क़तरा भी अपनी मौज में दजला भी मौज में
दरिया भी मस्त मस्त है सहरा भी मस्त मस्त

ख़ुर्शीद ओ माहताब भी ज़र्रा भी बे-दिमाग़
अदना ओ पस्त ओ अरफ़ा ओ आला भी मस्त मस्त

मेरा वजूद और वजूद-ए-अदम भी मस्त
पिनहाँ भी मस्त मस्त है पैदा भी मस्त मस्त

आईना अक्स और पस-ए-आईना भी मस्त
पोशीदा मस्त-ए-ख़्वाब हुवैदा भी मस्त मस्त

आली ज़नाब क़िबला ओ काबा हु़जुर-ए-मन
मैं ही नहीं हूँ क़िबला ओ काबा भी मस्त मस्त

साग़र सुराही जाम प्याला भी मस्त मस्त
साक़ी भी मस्त मस्त है सहबा भी मस्त मस्त

यख़-बस्तगी भी मस्त है और आए-ए-सर्द भी
चिंगारी आग आग का शोला भी मस्त मस्त

ऐ बे-ख़ुदी सलाम तुझे मेरा शुक्रिया
दुनिया भी मस्त मस्त है उक़्बा भी मस्त मस्त

कुछ तेरी मध भरी हुई आँखें भी मस्त हैं
कुछ उन के साथ साथ ज़माना भी मस्त मस्त

तुझ को पाने की ये हसरत मुझे ले डूबेगी

तुझ को पाने की ये हसरत मुझे ले डूबेगी
लग रहा है के मोहब्बत मुझे ले डूबेगी

हालत-ए-इश्क़ में हूँ और ये हालत है के अब
एक लम्हे की भी फ़ुर्सत मुझे ले डूबेगी

अब मैं समझा हूँ के ये दर्द-ए-मोहब्बत क्या है
ये तेरे प्यार की शिद्दत मुझे ले डूबेगी

मेरी बे-ताबी-ए-दिल चैन न लेने देगी
तेरी ख़ामोश तबीअत मुझे ले डूबेगी

तेरी आँखों के समंदर में ख़यालों की तरह
डूब जाने की ये आदत मुझे ले डूबेगी

डूबती नब्ज़ कहीं का नहीं छोड़ेगी मुझे
दर्द ले डूबेगा वहशत मुझे ले डूबेगी

तेरी आँखों का ये जादू कहीं ले जाएगा
ये तेरी सादा सी सूरत मुझे ले डूबेगी

तेरे अश़्कों से कलेजा मेरा कट जाएगा
मेरी हस्सास तबीअत मुझे ले डूबेगी

हर क़दम पर मैं तेरा बोझ उठाऊँ कैसे
ज़िंदगी तेरी जरूरत मुझे ले डूबेगी

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