‘ताबाँ’ अब्दुल हई की रचनाएँ

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ
रश्क से शम्मा को जलाता हूँ

वो मेरा शोख़ है निपट चंचल
भाग जाता है जब बुलाता हूँ

उस परी-रू को देखता हूँ जब
हो के दीवाना सुध भुलाता हूँ

मुझ को देता है गालियाँ उठ कर
नींद से जब उसे जगाता हूँ

जब मुझे घेरता है ग़म ‘ताबाँ’
साग़र-ए-मय को भर पिलाता हूँ

देख उस को ख़्वाब में जब आँख खुल

देख उस को ख़्वाब में जब आँख खुल जाती है सुब्ह
क्या कहूँ मैं क्या क़यामत मुझ पे तब लाती है सुब्ह

जिस का गोरा रंग हो वो रात को खिलता है ख़ूब
रौशनाई शम्मा की फीकी नज़र आती है सुब्ह

पास तू सोता है चंचल पर गले लगता नहीं
मिन्नतें करते ही सारी रात हो जाती है सुब्ह

नींद से उठता है ‘ताबाँ’ जब मेरा ख़ुर्शीद-रू
देख उस के मुँह के तईं शरमा के छुप जाती है सुब्ह

दिल-बर से दर्द-ए-दिल न कहूँ हाए

दिल-बर से दर्द-ए-दिल न कहूँ हाए कब तलक
ख़ामोश उस के ग़म में रहूँ हाए कब तलक

उस शोख़ से जुदा मैं रहूँ हाए कब तलक
ये ज़ुल्म ये सितम मैं सहूँ हाए कब तलक

रहता है रोज़-ए-हिज्र में ज़ालिम के ग़म मुझे
इस दुख से देखिए कि छुटूँ हाए कब तलक

आई बहार जाइए सहरा में शहर छोड़
मुज को जुनूँ है घर में रहूँ हाए कब तलक

ज़ालिम को टुक भी रहम मेरे हाल पर नहीं
‘ताबाँ’ मैं उस के जौर सहूँ हाए कब तलक

ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान

ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान है आज
मैं हूँ और हाथ मेरा और ये गिरेबान है आज

लटपटी चाल खुले बाल ख़ुमारी अंखियाँ
मैं तसद्दुक़ हूँ मेरी जान ये क्या आन है आज

कब तलक रहिए तेरे हिज्र में पाबंद-ए-लिबास
कीजिए तर्क-ए-तअल्लुक़ ही ये अरमान है आज

आइने को तेरी सूरत से न हो क्यूँ हैरत
दर ओ दीवार तुझे देख के हैरान है आज

आशियाँ बाग़ में आबाद था कल बुलबुल का
हाए ‘ताबाँ’ ये सबब क्या है कि वीरान है आज

ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान

ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान है आज
मैं हूँ और हाथ मेरा और ये गिरेबान है आज

लटपटी चाल खुले बाल ख़ुमारी अंखियाँ
मैं तसद्दुक़ हूँ मेरी जान ये क्या आन है आज

कब तलक रहिए तेरे हिज्र में पाबंद-ए-लिबास
कीजिए तर्क-ए-तअल्लुक़ ही ये अरमान है आज

आइने को तेरी सूरत से न हो क्यूँ हैरत
दर ओ दीवार तुझे देख के हैरान है आज

आशियाँ बाग़ में आबाद था कल बुलबुल का
हाए ‘ताबाँ’ ये सबब क्या है कि वीरान है आज

मुझे ऐश ओ इशरत की क़ुदरत नहीं

मुझे ऐश ओ इशरत की क़ुदरत नहीं है
करूँ तर्क-ए-दुनिया तो हिम्मत नहीं है

कभी ग़म से मुझ को फ़राग़त नहीं है
कभी आह ओ नाले से फ़ुर्सत नहीं है

सफ़ों की सफ़ें आशिक़ों की उलट दें
क़यामत है ये कोई क़ामत नहीं है

बरसता है मेंह मैं तरसता हूँ मय को
ग़ज़ब है ये बारान-ए-रहमत नहीं है

मेरे सर पे ज़ालिम न लाया हो जिस को
कोई ऐसी दुनिया में आफ़त नहीं है

है मिलना मेरा फ़ख़्र आलम को लेकिन
तेरे पास कुछ मेरी हुरमत नहीं है

मैं गोर-ए-ग़रीबाँ पे जा कर जो देखा
ब-जुज़ नक़्श-ए-पा लौह-ए-तुर्बत नहीं है

बुरी ही तरह मुझ से रूठी हैं मिज़गाँ
उन्हें कुछ भी चश्म-ए-मुरव्वत नहीं है

तू करता है इबलीस के काम ज़ाहिद
तेरे फ़ेल पर क्यूँके लानत नहीं है

मैं दिल खोल ‘ताबाँ’ कहाँ जा के रोऊँ
के दोनों जहाँ में फ़राग़त नहीं है

नहीं कोई दोस्त अपना यार अपना मेहर-बाँ

नहीं कोई दोस्त अपना यार अपना मेहर-बाँ अपना
सुनाऊँ किस को ग़म अपना अलम अपना फ़ुग़ाँ अपना

न ताक़त है इशारे की न कहने की न सुनने की
कहूँ क्या मैं सुनूँ क्या मैं बताऊँ क्या बयाँ अपना

निपट रखता है जी मेरा ख़फ़ा हूँ नाक में दम है
न घर भाता है ने सहरा कहाँ कीजे मकाँ अपना

हुआ हूँ गुम मैं लश्कर में परी-रूयाँ के हे ज़ालिम
कहाँ ढूँढूँ किसे पूछूँ नहीं पाता निशाँ अपना

बहुत चाहा कि आवे यार या इस दिल को सब्र आवे
न यार आया न सब्र आया दिया में जी नदाँ अपना

क़फ़स में बंद हैं ये अंदलीबें सख़्त बे-बस हैं
न गुलशन देख सकती हैं न अब वे आशियाँ अपना

मुझे आता है रोना ऐसी तन्हाई पे ऐ ‘ताबाँ’
न यार अपना न दिल अपना न तन अपना न जाँ अपना

नहीं तुम मानते मेरा कहा जी

नहीं तुम मानते मेरा कहा जी
कभी तो हम भी समझेंगे भला जी

अचम्भा है मुझे बुलबुल के गुल बिन
क़फ़स में किस तरह तेरा लगा जी

तुम्हारे ख़त के आने की ख़बर सुन
मियाँ साहब निपट मेरा कुढ़ा जी

ज़कात-ए-हुस्न दे मैं बे-नवा हूँ
यही है तुम से अब मेरी सदा जी

किसी के जी के तईं लेता है दुश्मन
मेरा तो ले गया है आशना जी

थका मैं सैर कर सारे जहाँ की
मेरा अब सब तरफ़ से मर गया जी

जलाया आ के फिर ‘ताबाँ’ को तू ने
हमारी जान अब तू भी सदा जी

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है
आह क्या चाहना ऐसा ही बुरा होता है

तेरे अबरू से मेरा दिल न छुटेगा हरगिज़
गोश्त नाख़ून से भला कोई जुदा होता है

मैं समझता हूँ तुझे ख़ूब तरह ऐ अय्यार
तेरे इस मक्र के इख़्लास से क्या होता है

है कफ़-ए-ख़ाक मेरी बस-के तब-ए-इश्क़ से गर्म
पाँव वाँ जिस का पड़े आबला-पा होता है

दिल मेरा हाथ से जाता है करूँ क्या तदबीर
यार मुद्दत का मेरा हाए जुदा होता है

राह-बर मंज़िल-ए-मक़सूद को दरकार नहीं
शौक़-ए-दिल अपना ही याँ राह-नुमा होता है

ग़ैर हरजाई मेरा यार लिए जाता है
मुझ पे ‘ताबाँ’ ये सितम आज बड़ा होता है

यार रूठा है मेरा उस को मनाऊँ किस तरह

यार रूठा है मेरा उस को मनाऊँ किस तरह
मिन्नतें कर पाँव पड़ उस के ले आऊँ किस तरह

जब तलक तुम को न देखूँ तब तलक बे-चैन हूँ
मैं तुम्हारे पास हर साअत न आऊँ किस तरह

दिल धड़कता है मुबादा उठ के देवे गालियाँ
यार सोता है मेरा उस को जगाऊँ किस तरह

बुलबुलों के हाल पर आता है मुज को रहम आज
दाम से सय्याद के उन को छुड़ाऊँ किस तरह

यार बाँका है मेरा छुट तेग़ नईं करता है बात
उस से ऐ ‘ताबाँ’ मैं अपना जी बचाऊँ किस तरह

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