ताबिश कमाल

ताबिश कमाल की रचनाएँ

अजब यक़ीन उस शख़्स के गुमान में था

अजब यक़ीन उस शख़्स के गुमान में था
वो बात करते हुए भी नई उड़ान में था

हवा भरी हुई फिरती थी अब के साहिल पर
कुछ ऐसा हौसला कष्ती के बादबाँ में था

हमारे भीगे हुए पर नहीं खुले वर्ना
हमें बुलाता सितारा तो आसमान में था

उतर गया है रग-ओ-पय में ज़ाइक़ा उस का
अजीब शहद सा कल रात उस ज़बान में था

खुली तो आँख तो ‘ताबिष’ कमाल ये देखा
वो मेरी रूह में था और मैं मकान में था

अजीब सुब्ह थी दीवार ओ दर कुछ और से थे

अजीब सुब्ह थी दीवार ओ दर कुछ और से थे
निगाह देख रही थी कि घर कुछ और से थे

वो आशियाने नहीं थे जहाँ पे चिड़ियाँ थीं
शजर कुछ और से उन पर समर कुछ और से थे

तमाम कश्तियाँ मंजधार में घिरी हुई थीं
हर एक लहर में बनते भँवर कुछ और से थे

बहुत बदल गया मैदान-ए-जंग का नक़्शा
वो धड़ कुछ और से थे उन पे सर कुछ और से थे

मिरे हलीफ़ मिरे साथ थे लड़ाई में
हर एक शख़्स के तेवर मगर कुछ और से थे

कई पड़ाव थे मंज़िल की राह में ‘ताबिश’
मिरे नसीब में लेकिन सफ़र कुछ और से थे

कब खुलेगा कि फ़लक पार से आगे क्या है

कब खुलेगा कि फ़लक पार से आगे क्या है
किस को मालूम कि दीवार से आगे क्या है

एक तुर्रा सा तो मैं देख रहा हूँ लेकिन
कोई बतलाए कि दस्तार से आगे क्या है

ज़ुल्म ये है कि यहाँ बिकता है यूसुफ़ बे-दाम
और नहीं जानता बाज़ार से आगे क्या है

सर में सौदा है कि बार तो देखूँ जा कर
सर-ए-मैदान सजी दार से आगे क्या है

जिस ने इंसाँ से मोहब्बत ही नहीं की ‘ताबिश’
उस को क्या इल्म कि पिंदार से आगे क्या है

न देखें तो सुकूँ मिलता नहीं है

न देखें तो सुकूँ मिलता नहीं है
हमें आख़िर वो क्यूँ मिलता नहीं है

मोहब्बत के लिए जज़्बा है लाज़िम
ये आईना तो यूँ मिलता नहीं है

हम इक मुद्दत से दर पर मुंतज़िर हैं
मगर इज़्न-ए-जुनूँ मिलता नहीं है

है जितना ज़र्फ़ उतनी पासदारी
ज़रूरत है फ़ुज़ूँ मिलता नहीं है

अजब होती है आइंदा मुलाक़ात
हमेशा जूँ का तूँ मिलता नहीं है

अगर मिलते भी हों अपने ख़यालात
तो इक दूजे से ख़ूँ मिलता नहीं है

वो मेरे शहर में रहता है ‘ताबिश’
मगर मैं क्या करूँ मिलतना नहीं है

यक़ीं से जो गुमाँ का फ़ासला है

यक़ीं से जो गुमाँ का फ़ासला है
ज़मीं से आसमाँ का फ़ासला है

हवा-पैमाई की ख़्वाहिश है इतनी
कि जितना बादबाँ का फ़ासला है

ख़यालात इस क़दर हैं मुख़्तलिफ़ क्यूँ
हमारे दरमियाँ का फ़ासला है

कोई इज़हार कर सकता है कैसे
ये लफ़्ज़ों से ज़बाँ का फ़ासला है

मैं उस तक किस तरह पहुँचूँगा ‘ताबिश’
यहाँ से इस जहाँ का फ़ासला है

ये शहर आफ़तों से तो ख़ाली कोई न था

ये शहर आफ़तों से तो ख़ाली कोई न था
जब हम सख़ी हुए तो सवाली कोई न था

लिक्खा है दास्ताँ में कि गुलशन उजड़ते वक़्त
गुलचीं बे-शुमार थे माली कोई न था

उस दश्त में मिरा ही हयूला था हर तरफ़
मैं ने ही शम-ए-इश्क़ जला ली कोई न था

जलसे उजड़ गए थे किसी ख़ुद-फ़रेब के
खुद ही जा रहा था वो ताली कोई न था

‘ताबिश’ हर एक दिल में शरारे थे क़हर के
हो पास जिस के सोज़-ए-बिलाली कोई न था

हमारा डूबना मुश्किल नहीं था

हमारा डूबना मुश्किल नहीं था
नज़र में दूर तक साहिल नहीं था

कहाँ था गुफ़्तुगू करते हुए वो
वो था भी तो सर-ए-महफ़िल नहीं था

मैं उस को सब से बेहतर जानता हूँ
जिसे मेरा पता हासिल नहीं था

ज़माने से अलग थी मेरी दुनिया
मैं उस की दौड़ में शामिल नहीं था

वो पत्थर भी था कितना ख़ूब-सूरत
जो आईना था लेकिन दिल नहीं था

हम उस धरती के बाषिंदे थे ‘ताबिष’
कि जिस को कोई मुस्तकबि़ल नहीं था

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