फ़राग़ रोहवी की रचनाएँ

देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा

देखा जो आईना तो मुझे सोचना पड़ा
ख़ुद से न मिल सका तो मुझे सोचना पड़ा

उस का जो ख़त मिला तो मुझे सोचना पड़ा
अपना सा वो लगा तो मुझे सोचना पड़ा

मुझ को था ये गुमाँ कि मुझी में है इक अना
देखी तिरी अना तो मुझे सोचना पड़ा

दुनिया समझ रही थी कि नाराज़ मुझ से है
लेकिन वो जब मिला तो मुझे सोचना पड़ा

सर को छुपाऊँ अपने कि पैरों को ढाँप लूँ
छोटी सी थी रिदा तो मुझे सोचना पड़ा

इक दिल वो मेरे ऐब गिनाने लगा ‘फ़राग़’
जब ख़ुद ही थक गया तो मुझे सोचना पड़ा

हमारे साथ उम्मीद-ए-बहार तुम भी करो

हमारे साथ उम्मीद-ए-बहार तुम भी करो
इस इंतिज़ार के दरिया को पार तुम भी करो

हवा का रूख़ तो किसी पल बदल भी सकता है
उस एक पल का ज़रा इंतिज़ार तुम भी करो

मैं एक जुगनू अंधेरा मिटाने निकला हूँ
रिदा-ए-तीरा-शबी तार तार तुम भी करो

तुम्हारा चेहरा तुम्हीं हू-ब-हू दिखाऊँगा
मैं आईना हूँ मिरा ए‘तिबार तुम भी करो

ज़रा सी बात पे क्या क्या न खो दिया मैं ने
जो तुम ने खोया है उस का शुमार तुम भी करो

मिरी अना तो तकल्लुफ़ में पाश पाश हुई
दुआ-ए-ख़ैर मिरे हक़ में यार तुम भी करो

अगर मैं हाथ मिलाऊँ तो ये ज़रूरी है
कि साफ़ सीने का अपने ग़ुबार तुम भी करो

कोई ज़रूरी नहीं है कि बस की तरह ‘फ़राग़’
ज़माने वाली रविश इख़्तियार तुम भी करो

जिस दिन से कोई ख़्वाहिश-ए-दुनिया नहीं रखता

जिस दिन से कोई ख़्वाहिश-ए-दुनिया नहीं रखता
मैं दिल में किसी बात का खटका नहीं रखता

मुझ में ही यही ऐब कि औरों की तरह मैं
चेहरे पे कभी दूसरा चेहरा नहीं रखता

क्यूँ क़त्ल मुझे कर के डुबोते हो नदी में
दो दिन भी किसी लाश को दरिया नहीं रखता

क्यूँ मुझ को लहू देने पे तुम लोग ब-ज़िद हो
मैं सर पे किसी शख़्स का क़र्ज़ा नहीं रखता

अहबाब तो अहबाब हैं दुश्मन के तईं भी
कम-ज़र्फ ज़माने का रवैया नहीं रखता

ये सच है कि मैं ग़ालिब-ए-सानी नहीं लेकिन
यारान-ए-मूआसिर का भी लहजा नहीं रखता

बादल तो ‘फ़राग़’ अस्ल में होता है वो बादल
जो प्यास के सहरा को भी प्यासा नहीं रखता

कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे

कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे
कि दुश्मनों के भी मुश्किल-कुशा हमीं ठहरे

किसी ने राह का पत्थर हमीं को ठहराया
ये और बात कि फिर आईना हमीं ठहरे

जो आज़माया गया शहर के फ़क़ीरों को
तो जाँ-निसार-ए-तारीक़-ए-अना हमीं ठहरे

हमीं ख़ुदा के सिपाही हमीं मुहाजिर भी
थे हक़-शनास तो फिर रहनुमा हमीं ठहरे

दिलों पे क़ौल-ओ-अमल के वो नक़्श छोड़े हैं
कि पेशवाओं के भी पेशवा हमीं ठहरे

‘फ़राग़’ रन में कभी हम ने मुँह नहीं मोड़ा
मक़ाम-ए-इश्क़ से भी आश्ना हमीं ठहरे

कभी न सोचा था मैं ने उड़ान भरते हुए

कभी न सोचा था मैं ने उड़ान भरते हुए
कि रंज होगा ज़मीं पर मुझे उतरते हुए

ये शौक़-ए-ग़ोता-ज़नी तो नया नहीं फिर भी
उतर रहा हूँ मैं गहराइयों में डरते हुए

हवा के रहम-ओ-करम पर चराग़ रहने दो
कि डर रहा हूँ नए तजरबात करते हुए

न जाने कैसा समुंदर है इश्क़ का जिस में
किसी को देखा नहीं डूब के उभरते हुए

मैं उस घराने का चश्म ओ चराग़ हूँ जिस की
हयात गुज़री है ख़्वाबों में रंग भरते हुए

मैं सब से मिलता रहा हँस के इस तरह कि मुझे
किसी ने देखा नहीं टूटते बिखरते हुए

‘फ़राग़’ ऐसे भी इंसान मैं ने देखे हैं
जो सच की राह में पाए गए हैं मरते हुए

कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है

कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है
इशारे से तिरे क्या क्या चमकता है

फ़लक से जब नई किरनें उतरती हैं
गुहर सा शबनमी क़तरा चमकता है

उसे दुनिया कभी दरिया नहीं कहती
चमकने को तो हर सहरा चमकता है

सितारा तो सितारा है मिरे भाई
कभी तेरा कभी मेरा चमकता है

मिरी मैली हथेली पर तो बचपन से
ग़रीबी का खरा सोना चमकता है

मशक़्क़त की बदौलत ही जबीनें पर
पसीने का हर इक क़तरा चमकता है

क़रीने से तराशा ही न जाए तो
किसी पहलू कहाँ हीरा चमकता है

ये क्या तुरफ़ा-तमाशा है सियासत का
कहीं ख़ंजर कहीं नेज़ा चमकता है

तसव्वुर में ‘फ़राग़’ आठों पहर आब तो
कोई चेहरा ग़ज़ल जैसा चमकता है

मैं एक बूँद समुंदर हुआ तो कैसे हुआ

मैं एक बूँद समुंदर हुआ तो कैसे हुआ
ये मोजज़ा मिरे अंदर हुआ तो कैसे हुआ

ये भेद सब पे उजागर हुआ तो कैसे हुआ
कि मेरे दिल में तिरा घर हुआ तो कैसे हुआ

न चाँद ने किया रौशन मुझे न सूरज ने
तो मैं जहाँ में मुनव्वर हुआ तो कैसे हुआ

न आस-पास चमन है न गुल-बदन कोई
हमारा कमरा मोअŸार हुआ तो कैसे हुआ

ज़रा सी बात पे इक ग़म-गुसार के आगे
मैं अपने आपे से बाहर हुओ तो कैसे हुआ

सुलगते सहरा मे तूफ़ाँ का सामना था मुझे
ये मारका जो हुआ सर हुआ तो कैसे हुआ

वो जंग हार के मुझ से ये पूछता है कि मैं
बग़ैर तेग़ मुज़फ़्फ़र हुआ तो कैसे हुआ

सुना है अम्न-परस्तों का वो इलाक़ा है
वहीं शिकार कबूतर हुआ तो कैसे हुआ

नवाह-ए-जाँ में किसी के उतरना चाहा था

नवाह-ए-जाँ में किसी के उतरना चाहा था
ये जुर्म मैं ने बस इक बार करना चाहा था

जो बुत बनाऊँगा तेरा तो हाथ होंगे क़लम
ये जानते हुए जुर्माना भरना चाहा था

बग़ैर उस के भी अब देखिए मैं ज़िंदा हूँ
वो जिस के साथ कभी मैं ने मरना चाहा था

शब-ए-फ़िराक़ अजल की थी आरज़ू मुझ को
ये रोज़ रोज़ तो मैं ने न मरना चाहा था

कशीद इत्र किया जा रहा है अब मुझ से
कि मुश्क बन के फ़ज़ा में बिखरना चाहा था

उस एक बात पे नाराज़ हैं सभी सूरज
कि मैं ने उन सा उफ़ुक़ पर उभरना चाहा था

लगा रहा है जो शर्तें मिरी उड़ानों पर
मिरे परों को उसी ने कतरना चाहा था

उसी तरफ़ है ज़माना भी आज महव-ए-सफ़र
‘फ़राग़’ मैं ने जिधर से गुज़रना चाहा था

यारो हुदूद-ए-ग़म से गुज़रने लगा हूँ मैं

यारो हुदूद-ए-ग़म से गुज़रने लगा हूँ मैं
मुझ को समेट लू की बिखरने लगा हूँ मैं

छू कर बुलंदियों से उतरने लगा हूँ मैं
शायद निगाह-ए-वक़्त से डरने लगा हूँ मैं

पर तौलने लगी हैं जो ऊँची उड़ान को
उन ख़्वाहिशों के पंख कतरने लगा हूँ मैं

आता नहीं यक़ीन कि उन के ख़याल में
फिर आफ़्ताब बन के उभरने लगा हूँ मैं

क्या बात है कि अपनी तबीअत के बर-ख़िलाफ़
दे कर ज़बाँ ‘फ़राग़’ मुकरने लगा हूँ मैं

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