'फ़य्याज़' फ़ारुक़ी

‘फ़य्याज़’ फ़ारुक़ी की रचनाएँ

जुगनू हवा में ले कि उजाले निकल पड़े

जुगनू हवा में ले कि उजाले निकल पड़े
यूँ तीरगी से लड़ने जियाले निकल पड़े

सच बोलना महाल था इतना के एक दिन
सूरज की भी ज़बान पे छाले निकल पड़े

इतना न सोच मुझ को ज़रा देख आईना
आँखों के गिर्द हल्के भी काले निकल पड़े

महफ़िल में सब के बीच था ज़िक्र-ए-बहार कल
फिर जाने कैसे तेरे हवाले निकल पड़े

कहानी हो कोई भी तेरा क़िस्सा हो ही जाती है

कहानी हो कोई भी तेरा क़िस्सा हो ही जाती है
कोई तस्वीर देखूँ तेरा चेहरा हो ही जाती है

तेरी यादों की लहरें घेर लेती हैं ये दिल मेरा
ज़मीं घिर कर समंदर में जज़ीरा हो ही जाती है

गई शब चाँद जैसा जब चमकता है ख़याल उस का
तमन्ना मेरी इक छोटा सा बच्चा हो ही जाती है

सजा है ताज मेरे सर पे लेकिन ये नज़र मेरी
जो उस की सम्त जाती है तो कासा हो ही जाती है

जतन करता हूँ कितने रोक लूँ सैलाब आँखों में
मगर तामीर मेरी ये शिकस्ता हो ही जाती है

ये सोचा है कि तुझ को सोचना अब छोड़ दूँगा मैं
ये लग्ज़िश मुझ से लेकिन बे-इरादा हो ही जाती है

जो है ‘फ़य्याज़’ उस को देख कर मबहूत हैरत क्या
तड़पती है जो बिज़ली आँख ख़ीरा हो ही जाती है

किसी को सोचना दिल का गुदाज़ हो जाना

किसी को सोचना दिल का गुदाज़ हो जाना
हवा की छेड़ से पत्तों का साज़ हो जाना

कभी वो गुफ़्तगू जैसे के कुछ छुपा ही नहीं
कभी वो बोलती आँखों का राज़ हो जाना

बढ़ाना हाथ पकड़ने को रंग मुट्ठी में
तो तितलियों के परों का दराज हो जाना

कभी तो गफ़लतें सजदों में और कभी यूँ भी
के उस को सोच ही लेना नमाज़ हो जाना

वो डूबता हुआ सूरज वो कारवाँ का ग़ुबार
हक़ीक़तों का भी पल में मजा़ज हो जाना

किवाड़ खुलते हों जैसे किसी ख़ज़ाने के
वो ख़्वाब ख़्वाब सी आँखों का बाज़ हो जाना

निकला जो चिलमनों से वो चेहरा आफ़ताबी

निकला जो चिलमनों से वो चेहरा आफ़ताबी
इक आन में उफ़ुक का आँचल हुआ गुलाबी

रूख़ से नक़ाब उन के सरका हुआ है कुछ कुछ
दीवाना कर न डाले ये नीब-बे-हिजाबी

सौ जाम का नशा है साक़ी तेरी नज़र में
कहते हैं बादा-कश भी मुझ को तेरा शराबी

बेकार लग रही हैं दुनिया की सब किताबें
देखी है जब से मैं ने सूरत तेरी किताबी

मुरझाए फूल हैं कलियों ने सर झुकाए
गुलशन में इक सितम है ये तेरी बे-नक़ाबी

कब चैन से रहा है ये फ़िक्र का परिंदा
‘फ़य्याज़’ की है फ़ितरत किस दजा इजि़्तराबी

राह में उस की चलें और इम्तिहाँ कोई न हो

राह में उस की चलें और इम्तिहाँ कोई न हो
कैसे मुमकिन है के आतिश हो धुआँ कोई न हो

उस की मर्ज़ी हैं वो मिल जाए किसी को भीड़ में
और कभी ऐसे मिले के दरमियाँ कोई न हो

जगमगाता है सितारा बन के तब उम्मीद का
बुझ गए हों सब दिए और कहकशां कोई न हो

ख़ाना-ए-दिल में वो रहता कब किसी के साथ है
जलवा-गर होता है वो जब मेहमाँ कोई न हो

कैसे मुमकिन है के क़िस्से जिस से सब वाबस्ता हों
वो चले और साथ उस के दास्ताँ कोई न हो

सारे आलम पर वो लिख देता है उस का नाम जब
कोई ख़ुद को यूँ मिटा ले के निशां कोई न हो

बन के लश्‍कर साथ हो जाता है वो ‘फय्याज़’ जब
हम-सफ़र कोई न हो और कारवाँ कोई न हो

शिकवा हम तुझ से भला तेज़ हवा क्या करते

शिकवा हम तुझ से भला तेज़ हवा क्या करते
घर तो अपने ही चराग़ों से जला क्या करते

तुम तो पहले ही वफ़ाओं से गुरेज़ाँ थे बहुत
तुम से हम तर्क-ए-तअल्लुक़ का गिला क्या करते

गुल में रंगत थी नज़ारों में जवानी तुझ से
हम तेरे बाद बहारों का भला क्या करते

तुझ से दिल में जो गिला था वो न लाए लब पर
फिर से हम भर गए ज़ख्मों को हरा क्या करते

हम तो कर देते गिला तुझ से न आने का तेरे
घोट देती थी पर उम्मीद गला क्या करते

जिस की उल्फ़त में हर इक चीज़ लुटा दी ‘फ़य्याज़’
हम को समझा गए आदाम-ए-वफ़ा क्या करते

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