फ़रहत एहसास

फ़रहत एहसास की रचनाएँ

गौर से देखो तो हर चेहरे की बेनूरी का राज

ग़ौर से देखो तो हर चेहरे की बेनूरी का राज़
बादशाह-ए-वक़्त के चेहरे की ताबानी में है

चाँद भी हैरान दरिया भी परेशानी में है
अक्स किसका है कि इतनी रौशनी पानी में है

अब दिल की तरफ दर्द की यलगार बहुत है 

अब दिल की तरफ दर्द की यलगार बहुत है
दुनिया मेरे जख़्मों की तलबगार बहुत है

अब टूट रहा है मेरी हस्ती का तसव्वुर
इस वक़्त मुझे तुझ से सरोकार बहुत है

मिट्टी की ये दीवार कहीं टूट न जाए
रोको के मेरे ख़ून की रफ़्तार बहुत है

हर साँस उखड़ जाने की कोशिश में परेशाँ
सीने में कोई है जो गिरफ़्तार बहुत है

पानी से उलझते हुए इंसान का ये शोर
उस पार भी होगा मगर इस पार बहुत है

हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है

हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है
शहर में जो भी हुआ है वो ख़ता मेरी है

ये जो है ख़ाक का इक ढेर बदन है मेरा
वो जो उड़ती हुई फिरती है क़बा मेरी है

वो जो इक शोर सा बरपा है अमल है मेरा
ये जो तनहाई बरसती है सज़ा है मेरी है

मैं न चाहूँ तो न खिल पाए कहीं एक भी फूल
बाग़ तेरा है मगर बाद-ए-सबा मेरी है

एक टूटी हुई कश्ती सा बन बैठा हूँ
न ये मिट्टी न ये पानी न हवा मेरी है

जिस्म की कुछ और अभी मिट्टी निकाल

जिस्म की कुछ और अभी मिट्टी निकाल
और अभी गहराई से पानी निकाल

ऐ ख़ुदा मेरी रगों में दौड़ जा
शाख़-ए-दिल पर इक हरी पत्ती निकाल

भेज फिर से अपनी आवाज़ों का रिज़्क़
फिर मेरे सहरा से इक बस्ती निकाल

मुझ से साहिल की मोहब्बत छीन ले
मेरे घर के बीच इक नद्दी निकाल

मैं समंदर की तहों में क़ैद हूँ
मेरे अंदर से कोई कश्ती निकाल

काबा-ए-दिल दिमाग़ का फिर से गुलाम हो गया

काबा-ए-दिल दिमाग़ का फिर से गुलाम हो गया
फिर से तमाम शहर पे इश्क़ हराम हो गया

मैं ने तो अपने सारे फूल उस के चमन को दे दिए
ख़ुश-बू उड़ी तो इक ज़रा मेरा भी नाम हो गया

यार ने मेरी ख़ाक-ए-ख़ाम रख ली फिर अपने चाक पर
मैं तो सफ़र पे चल पड़ा मेरा तो काम हो गया

जब भी हुई अज़ान-ए-वस्ल हम ने बिछाई जा-नमाज़
हिज्र का एक पास-बाँ बढ़ के इमाम हो गया

सारे हवास के चराग़ सो गए इंतिज़ार में
इश्क़ तो बरक़रार है शौक़ तमाम हो गया

कभी हँसते नहीं कभी रोते नहीं कभी कोई गुनाह नहीं करते

कभी हँसते नहीं कभी रोते नहीं कभी कोई गुनाह नहीं करते
हमें सुब्ह कहाँ से मिले के कभी कोई रात सियाह नहीं करते

हाथों से उठाते हैं जो मकाँ आँखों से गिराते रहते हैं
सहराओं के रहने वाले हम शहरों से निबाह नहीं करते

बेकार सी मिट्टी का इक ढेर बने बैठ रहते हैं हम
कभी ख़ाक उड़ाते नहीं अपनी कभी दश्त की राह नहीं करते

जी में हो तो दर पर रहते हैं वरना आवार फिरते हैं
हम इश्क़ उस से करते हैं मगर कोई बा-तनख़्वाह नहीं करते

ये तेरा मेरा झगड़ा है दुनिया को बीच में क्यूँ डालें
घर के अंदर की बातों पर ग़ैरों को गवाह नहीं करते

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं

मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं
और उस के बाद गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं

तेरे होंटों के सहरा में तेरी आँखों के जंगल में
जो अब तक पा चुका हूँ उस को खोना चाहता हूँ मैं

ये कच्ची मिट्टीयों को ढेर अपने चाक पर रख ले
तेरी रफ़्तार का हम-रक़्स होना चाहता हूँ मैं

तेरा साहिल नज़र आने से पहले इस समंदर में
हवस के सब सफ़ीनों को डुबोना चाहता हूँ मैं

कभी तो फ़स्ल आएगी जहाँ में मेरे होने की
तेरी ख़ाक-ए-बदन में ख़ुद को बोना चाहता हूँ मैं

मेरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है
तुम्हारे साथ मिल कर ख़ुद को धोना चाहता हूँ मैं

 

Share