फ़रहत कानपुरी

फ़रहत कानपुरी की रचनाएँ

आँखों में बसे हो तुम आँखों में अयाँ हो कर

आँखों में बसे हो तुम आँखों में अयाँ हो कर
दिल ही मे न रह जाओ आँखों से निहाँ हो कर

हाँ लब पे भी आ जाओ अंदाज़-ए-बयाँ हो कर
आँखों में भी आ जाओ अब दिल की ज़बाँ हो कर

खुल जाओ कभी मुझे से मिल जाओ कभी मुझ को
रहते हो मिरे दिल में उल्फ़त का गुमाँ हो कर

है शैख़ का ये आलम अल्लाह से बदमस्ती
आँखों ही से ज़ाहिर है आया है जहाँ हो कर

बदनामी ओ बर्बादी अंजाम-ए-मोहब्बत हैं
दुनिया में रहा ‘फ़रहत’ रूस्वा-ए-जहाँ हो क

जो कुछ भी है नज़र में सो वहम-ए-नुमूद है

जो कुछ भी है नज़र में सो वहम-ए-नुमूद है
आलम तमाम एक तिलिस्म-ए-वजूद है

आराइश-ए-नुमूद से बज़्म-ए-जुमूद है
मेरी जबीन-ए-शौक़ दलील-ए-सुजूद है

हस्ती का राज़ क्या है ग़म-ए-हस्त-ओ-बूद है
आलम तमाम दाम-ए-रूसूम-ओ-क़ुयूद है

अक्स-ए-जमाल-ए-यार से वहम-ए-नुमूद है
वर्ना वजूद-ए-ख़ल्क भी ख़ुद बे-वजूद है

अब कुश्तगान-ए-शौक़ को कुछ भी न चाहिए
फ़र्श-ए-ज़मीं है साया-ए-चर्ख़-ए-कबूद है

हंगामा-ए-बहार की अल्लाह रे शोख़ियाँ
ज़ाग़-ओ-ज़ग़्न का शोर भी सौत-ओ-सुरूद है

कोई भी हम-सफ़र नहीं होता

कोई भी हम-सफ़र नहीं होता
दर्द क्यूँ रात भर नहीं होता

राह-ए-दिल ख़ुद-ब-ख़ुद है मिल जाती
कोई भर राहबर नहीं होता

आह का भी न ज़िक्र कर ऐ दिल
आह में भी असर नहीं होता

दिल को आसूदगी भी क्यूँकर हो
ग़म से शीर-ओ-शकर नहीं होता

आह ऐ बे-ख़बर ये बे-ख़बरी
दिल-ए-नादाँ ख़बर नहीं होता

दिल की राहें जुदा हैं दुनिया से
कोई भी राहबर नहीं होता

अब तो महफ़िल से चल दिया ‘फ़रहत’
अब किसी का गुज़र नहीं होता

मेरा दिल-ए-नाशाद जो नाशाद रहेगा

मेरा दिल-ए-नाशाद जो नाशाद रहेगा
आलम दिल-ए-बर्बाद का बर्बाद रहेगा

ता-देर जो हंगामा-ए-फ़रियाद रहेगा
शक है कि कहीं आलम-ए-ईजाद रहेगा

पाबंदी-ए- अक़्दार में आज़ाद रहेगा
लेकिन ये तिरा जौर-ओ-सितम याद रहेगा

दिल अपने ही हाथों से जो बर्बाद रहेगा
अफ़्साना-ए-नाकामी-ए-फ़रियाद रहेगा

दिल सुस्त तो लब तिश्ना-ए-फ़रियाद रहेगा
अब फ़रहत-ए-नाशाद तो नाशाद रहेगा

दिल महव-ए-चमन है तो निगाहों में चमन है
पाबंद-ए-क़फ़स हो के भी आज़ाद रहेगा

ग़ैरों का करम रास न आएगा न आया
आलम दिल-ए-बर्बाद का बर्बाद रहेगा

‘फ़रहत’ तिरे नग़मों की वो शोहरत है जहाँ में
वल्लाह तिरा रंग-ए-सुख़न याद रहेगा

वस्ल के लम्हे कहानी हो गए

वस्ल के लम्हे कहानी हो गए
शब के मोती सुब्ह पानी हो गए

रफ़्ता रफ़्ता ज़िंदगानी हो गए
ग़म के लम्हे जावेदानी हो गए

दौलत-ए-अहद-ए-जवानी हो गए
चंद लम्हे जो कहानी हो गए

कैसी कुछ रंगीनियाँ थीं जिन से हम
महव-ए-सैर-ए-दहर-ए-फ़ानी हो गए

सुख भरे दुख दुख भरे सुख सब के सब
वाक़िआत-ए-ज़िंदगानी हो गए

मुस्कुराए आप जाने किस लिए
हम रहीं-ए-शादमानी हो गए

बातों ही बातों में रातें उड़ गईं
हाए वो दिन भी कहानी हो गए

तुम ने कुछ देखा ख़ुलूस-ए-जज़्ब-ए-शौक़
संग-रेज़े गुल के पानी हो गए

‘फ़रहत’ ऐसी बुत-परस्ती के निसार
बुत भी महव-ए-लन-तरानी हो गए

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