फ़व्वाद अहमद

फ़व्वाद अहमद की रचनाएँ

गली में ज़र्फ़ से बढ़ का मिला मुझे

गली में ज़र्फ़ से बढ़ का मिला मुझे
इक प्याला-ए-जुस्तुजू थी समुंदर मिला मुझे

मैं चल पड़ा था और किसी शाह-राह पर
ख़ंजर-ब-दस्त यादों का लश्कर मिला मुझे

दरिया-ए-शब से पार उतरना मुहाल था
टूटा हुआ सफ़ीना-ए-ख़ावर मिला मुझे

तारों में उस का अक्स है फूलों में उस का रंग
मैं जिस तरफ़ गया मिरा दिलबर मिला मुझे

हर ज़र्रा बा-कमाल है हर पŸाा बे-मिसाल
दुनिया में ख़ुद से कोई न कम-तर मिला मुझे

कब से भटक रहा हूँ मैं इस दश्त में मगर
ख़ुद से कभी मिला न तिरा दर मिला मुझे

होता नहीं है तुझ पे किसी बात का असर
लगता है तेरे रूप में पत्थर मिला मुझे

बे-कैफ़ कट रही थी मुसलसल ये ज़िंदगी
फिर ख़्वाब में वो ख़्वाब सा पैकर मिला मुझे

इस बात पर करूँगा मैं दिन रात एहतिजाज
किस जुर्म में ये ख़ाक का बिस्तर मिला मुझे

मुझ को नहीं रही कभी मंज़र की जुस्तुजू
घर के क़रीब कू-ए-सितमगर मिला मुझे

जब तक रहा मैं ख़ुद में भटकता रहा यहाँ
जब ख़ुद को खो दिया तो तिरा दर मिला मुझे

मिट्टी में ढूँढता हुआ कुछ बूढ़ा आसमाँ
मैं जिस तरफ़ गया यही मंज़र मिला मुझे

करते हैं लोग हुस्न से याँ ना-रवा सुलूक
रोते हुए हमेशा गुल-ए-तर मिला मुझे

हमारे दिल की बजा दी उस न ईंट से ईंट

हमारे दिल की बजा दी उस न ईंट से ईंट
हमारे आगे कभी उस का नाम मत लेना

उसी निगाह से पीने में लुत्फ़ है सारा
अलावा उस के कोई और जाम मत लेना

इसी सबब से है दुनिया में आसमाँ बदनाम
तुम अपने हाथ में ये इंतिज़ाम मत लेना

दिल ओ नज़र की बक़ा है फ़क़त मोहब्बत में
दिल ओ नज़र से कोई और काम मत लेना

यहाँ पे अच्छा है जितना भी मुख़्तसर हो क़याम
ज़लील होगे हयात-ए-दवाम मत लेना

ये सारे लोग तुम्हारा मज़ाक़ उड़ाते हैं
जहाँ में और मोहब्बत का नाम मत लेना

रहोगे चाँद की सरगोशियों से भी महरूम
किसी से धूप का जलता कलाम मत लेना

अगरचे तुम पे हुआ है यहाँ पे ज़ुल्म बहुत
किसी से उस का मगर इंतिक़ाम मत लेना

हवा ने छीन लिया आ के मेरे होंटों से

हवा ने छीन लिया आ के मेरे होंटों से
वो एक गीत जो मैं गुनगुना रहा था अभी

वो जा के नींद के पहलू में मुझ से छुपने लगा
मैं उस को अपनी कहानी सुना रहा था अभी

कि दिल में आ के नया तीर हो गया पैवस्त
पुराना ज़ख़्म मैं उस को दिखा रहा था अभी

बरस रही थी ज़मीं पर अजीब मदहोशी
न जाने कौन फ़ज़ाओं में गा रहा था अभी

उफ़ुक़ के पार ये डूबा है किस तरह सूरज
यहीं पे बैठ के बातें बना रहा था अभी

उठा के धूप ने घर से मुझे निकाल दिया
मैं इंतिज़ार की शमएँ जला रहा था अभी

जो सब को हँसने की तल्क़ीन करता रहा है
वो मेरे सामने आँसू बहा रहा था अभी

वो जिस का नाम पड़ा है ख़मोश लोगों में
यहाँ पे लफ़्ज़ों के दरिया बहा रहा था अभी

तुम्हारे लिए मुस्कुराती सहर है

तुम्हारे लिए मुस्कुराती सहर है
हमारे लिए रात का ये नगर है

अकेले यहाँ बैठ कर क्या करेंगे
बुलाया है जिस ने हमें वो किधर है

परेशाँ हूँ किस किस का सुर्मा बनाऊँ
यहाँ तो हर इक की उसी पर नज़र है

उजाला हैं रूख़्सार जादू हैं आँखें
ब-ज़ाहिर वो सब की तरह इक बशर है

वो जिस ने हमेशा हमें दुख दिए हैं
तमाशा तो ये है वही चारागर है

निकल कर वहाँ से कहीं दिल न ठहरा
बिचारा अभी तक यहाँ दर-ब-दर है

किसी दिन ये पत्थर भी बातें करेगा
मोहब्बत की नज़रों में इतना असर है

जो पल्कों से गिर जाए आँसू का क़तरा
जो पल्कों में रह जाएगा वो गुहर है

वो ज़िल्लत वो ख़्वारी भी उस के सबब थी
मोहब्बत का सेहरा भी उस दिल के सर है

कोई आ रहा है कोई जा रहा है
समझते हैं दुनिया को ख़ाला का घर है

न कोई पयाम उस की जानिब से आया
न मिलता कहीं अब मिरा नामा-बर है

उन निगाहों को हम-आवाज़ किया है मैं ने

उन निगाहों को हम-आवाज़ किया है मैं ने
तब कहीं गीत का आग़ाज़ किया है मैं ने

ख़त्म हो ता-कि सितारों की इजारा-दारी
ख़ाक को माइल-ए-परवाज़ किया है मैं ने

आप को इक नई ख़िफ़्फ़त से बचाने के लिए
चाँदनी को नज़र-अंदाज़ किया है मैं ने

आसमानों की तरफ़ और नहीं देखूँगा
इक नए दौर का आग़ाज़ किया है मैं ने

रूठे लोगों को मनाने में मज़ा आता है
जान कर आपको नाराज किया है मैं ने

तुम मुझे छोड़ के इस तरह नहीं जा सकते
इस तअल्लुक़ पे बहुत नाज़ किया है मैं ने

वो जो सदियों से यहाँ बंद पड़ा था देखो
शाइरी का वही दर बाज़ किया है मैं ने

सुन के मब्हूत हुई जाती है दुनिया सारी
शेर लिक्खें हैं कि एजाज़ किया है मैं ने

इश्क़ में नाम कमाना कोई आसान न था
सारे अहबाब को नाराज़ किया है मैं ने

सिर्फ़ लोगों को बताने से तसल्ली न हुई
चाँद तारों को भी हमराज़ किया है मैं ने

और भी होंगे कई चाहने वाले लेकिन
आप के नाम को मुम्ताज़ किया है मैं ने

आसमानों से परे करता है अब जा के शिकार
ताइर-ए-दिल को वो शहबाज़ किया है मैं ने

शाइरों से जो तिरे बाद कभी हो न सका
काम वो हाफ़िज़-ए-शीराज़ किया है मैं ने

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