फ़ातिमा हसन की रचनाएँ

बिखर रहे थे हर इक सम्त काएनात के रंग

बिखर रहे थे हर इक सम्त काएनात के रंग
मगर ये आँख कि जो ढूँढती थी ज़ात के रंग

हमारे शहर में कुछ लोग ऐसे रहते हैं
सफ़र की सम्त बताते हैं जिन को रात के रंग

उलझ के रह गए चेहरे मिरी निगाहों में
कुछ इतनी तेज़ी से बदले थे उन की बात के रंग

बस एक बारउन्हें खेलने का मौक़ा दो
ख़ुद इन की चाल बता देगी सारे मात के रंग

हवा चलेगी तो ख़ुशबू मिरी भी फैलेगी
मैं छोड़ आई हूँ पेड़ों पे अपनी बात के रंग

जिन ख़्वाहिशों को देखती रहती थी ख़्वाब में

जिन ख़्वाहिशों को देखती रहती थी ख़्वाब में
अब लिख रही हूँ उन को हक़ीक़त के बाब में

इक झील के किनारे परिंदों के दरमियाँ
सूरज को होते देखा था तहलील आब में

ख़्वाबों पे इख़्तियार न यादों पे ज़ोर है
कब ज़िंदगी गुज़ारी है अपने हिसाब में

इक हाथ उस का जाल पे पतवार एक में
और डूबता वजूद मिरा सैल-ए-आब में

पुरवाई चल के और भी वहशत बढ़ा गई
हल्की सी आ गई थी कमी इजि़्तराब में

आज़ाद हैं तो बाग़ का मौसम ही और है
ख़ुशबू है तेज़ रंग भी गहरा गुलाब में

अपनी ज़मीं की आब-ओ-हवा रास है मुझे
मेरे लिए कशिश नहीं कोई सराब में

देखो जुनूँ में उन के खिलौने न तोड़ना
तुम को रक़म करेंगे ये बच्चे किताब में

ख़ुशबू है और धीमा सा दुख फैला है

ख़ुशबू है और धीमा सा दुख फैला है
कौन गया है अब तक लान अकेला है

क्यूँ आहट पर चौकूँ मैं किस को देखूँ
बे-दस्तक ही आया जब वो आया है

खुली किताबें सामने रक्खे बैठी हूँ
धुँदले धुँदले लफ़्ज़ों में इक चेहरा है

रात दरीचे तक आ कर रूक जाती है
बंद आँखों में उस का चेहरा रहता है

आवाज़ों से ख़ाली किरनें फैली हैं
ख़ामोशी में चाँद भी तन्हा जलता है

जाने कौन से रस्ते पे खो जाए वो
शहर में भी आसेबों का डर रहता है

किस से बिछड़ी कौन मिला था भूल गई

किस से बिछड़ी कौन मिला था भूल गई
कौर बुरा था कौन था अच्छा भूल गई

कितनी बातें झूठी थीं और कितनी सच
जितने भी लफ़्ज़ों को परखा भूल गई

चारों ओर थे धुंधले चेहरे से
ख़्वाब की सूरत जो भी देखा भूल गई

सुनती रही मैं सब के दुख ख़ामोशी से
किस का दुख था मेरे जैसा भूल गई

भूल गई हूँ किस से मेरा नाता था
और ये नाता कैसे टूटा भूल गई

सुकून-ए-दिल के लिए इश्क़ तो बहाना था

सुकून-ए-दिल के लिए इश्क़ तो बहाना था
वगरना थक के कहीं तो ठहर ही जाना था

जो इजि़्तराब का मौसम गुज़ार आएँ हैं
वो जानते हैं कि वहशत का क्या ज़माना था

वो जिन को शिकवा था औरों से ज़ुल्म सहने का
ख़ुद उन का अपना भी अंदाज़ जारेहाना था

बहुत दिनों से मुझे इन्तिज़ार-ए-शब भी नहीं
वो रूत गुज़र गई हर ख़्वाब जब सुहाना था

कब उस की फ़त्ह की ख़्वाहिश को जीत सकती थी
मैं वो फ़रीक़ हूँ जिस को कि हार जाना था

यादों के सब रंग उड़ा कर तन्हा हूँ

यादों के सब रंग उड़ा कर तन्हा हूँ
अपनी बस्ती से दूर आ कर तन्हा हूँ

कोई नहीं है मेरे जैसा चारों ओर
अपने गिर्द इक भीड़ सजा कर तन्हा हूँ

जितने लोग हैं उतनी ही आवाज़ें हैं
लहज़ों का तूफ़ान उठा कर तन्हा हूँ

रौशनियों के आदी कैसे जानेंगे
आँखों में दो दीप जला कर तन्हा हूँ

जिस मंज़र से गुज़री थी मैं उस के साथ
आज उसी मंज़र में आ कर तन्हा हूँ

पानी की लहरों पर बहती आँखों में
कितने भूले ख़्वाब जगा कर तन्हा हूँ

मेरा प्यारा साथी कब ये जानेगा
दरिया की आग़ोश तक आ कर तन्हा हूँ

अपना आप भी खो देने की ख़्वाहिश में
उस का भी इक नाम भुला कर तन्हा हूँ

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