‘फ़ायज़’ देहलवी की रचनाएँ

बे-सबब हम से जुदाई न करो

बे-सबब हम से जुदाई न करो
मुझ से आशिक़ से बुराई न करो

ख़ाक-साराँ को न करिए पामाल
जग में फ़िरऔन सी ख़ुदाई न करो

बे-गुनाहाँ कूँ न कर डालो क़त्ल
आह कूँ तीर-ए-हवाई न करो

एक दिल तुम से नहीं है राज़ी
जग में हर इक सूँ बुराई न करो

महव है ‘फाएज़’-ए-शैदा तुम पर
उस से हर लहज़ा बखाई न करो

जब सजीले ख़िराम करते हैं

जब सजीले ख़िराम करते हैं
हर तरफ़ क़त्ल-ए-आम करते हैं

मुख दिखा छब बना लिबास सँवार
आशिकों को ग़ुलाम करते हैं

ये चकोरे मिल उस सिरीजन सूँ
रात दिन अपना काम करते हैं

यार को आशिक़ान-साहब-फ़न
एक देखे में राम करते हैं

गर्दिश-ए-चश्‍म सूँ सिरीजन सब
बज़्म में कार-ए-जाम करते हैं

ये नहीं नेक तौर ख़ूबाँ के
आशनाई को आम करते हैं

जी को करते हैं आशिक़ाँ तसलीम
जब वो हँस कर सलाम करते हैं

मुर्ग़-ए-दिल के शिकार करने कूँ
जुल्फ़ ओ काकुल को दाम करते हैं

शोख़ मेरा बुताँ में जब जावे
उस को अपना इमाम करते हैं

ख़ूब-रू आशना हैं ‘फाएज़’ के
मिल सबी राम राम करते हैं

ख़ूबाँ के बीच जानाँ मुमताज़ है सरापा

ख़ूबाँ के बीच जानाँ मुमताज़ है सरापा
अंदाज़-ए-दिलबरी में एजाज़ है सरापा

पल पल मटक के देखे डग डग चले लटक के
वो शोख़ छल छबीला तन्नाज़ है सरापा

तिरछी निगाह करना कतरा के बात सुनना
मजलिस में आशिकों की अंदाज़ है सरापा

नैनों में उस की जादू ज़ुल्फाँ में उस की फँदा
दिल के शिकार में वो शहबाज़ है सरापा

ग़म्ज़ा निगह तग़ाफुल अंखियाँ सियाह ओ चंचल
या रब नज़र न लागे अंदाज़ है सरापा

उस के ख़िराम ऊपर ताऊस मस्त हैगा
वो मीर दिल-रूबाबी तन्नाज़ है सरापा

किश्‍त-ए-उम्मीद करता सर-सब्ज़ सब्ज़ा-ए-ख़त
अंजाम-ए-हुस्न उस का आगाज़ है सरापा

वक़्त-ए-नज़ारा ‘फाएज़’ दिल-दार का यही है
बिस्तर नहीं बदन पर तन-बाज़ है सरापा

सजन मुझ पर बहुत ना-मेहर-बाँ है

सजन मुझ पर बहुत ना-मेहर-बाँ है
कहाँ वो आशिक़ाँ का क़दर-दाँ है

कहूँ अहवाल दिल का उसे को क्यूँकर
बहुत नाज़ुक-मिज़ाज ओ बद-ज़बाँ है

मेरा दिल बंद है उस नाज़नीं पर
अजब उस ख़ुश-लक़ा में एक आँ है

भवाँ शमशीर हैं ओ जुल्फ़ फाँसी
हर इक पलक उस की मानिंद-ए-सिनाँ है

ख़ुदा उस को रखे दुनिया में महफूज़
निहाल-ए-आरज़ू आराम-ए-जाँ है

चंद्र बे-वक्र है उस बद्र आगे
सफ़ा उस मुख की हर इक पर अयाँ है

समझता है तेरे अशआर ‘फाएज़
ख़ुदा के फ़ज़्ल सूँ वो नुक्ता-दाँ है

तुझ बिना दिल को बे-क़रारी है

तुझ बिना दिल को बे-क़रारी है
दम-ब-दम मुझ को आह ओ ज़ारी है

हाथ तेरे जो देखी है तलवार
आरजू दिल को जाँ-सिपारी है

मुझ को औरों से कुछ नहीं है काम
तुझ से हर दम उम्मीद-वारी है

हम से तुझ को नहीं मिलाप कभी
ये मगर जग में तौर-ए-यारी है

आह कूँ दिल में मैं छुपाता हूँ
लाज़िम-ए-इश्‍क पर्दा-दारी है

गिर रहा तेरी राह पर ‘फाएज़’
इश्‍क की शर्त ख़ाक-सारी है

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