फ़ारूक़ शमीम की रचनाएँ

दर्द के चेहरे बदल जाते हैं क्यूँ

दर्द के चेहरे बदल जाते हैं क्यूँ
मर्सिए नग़मों में ढल जाते हैं क्यूँ

सोच के पैकर नहीं जब मोम के
हाथ आते ही पिघल जाते हैं क्यूँ

जब बिखर जाती है ख़ुशबू ख़्वाब की
नींद के गेसू मचल जाते हैं क्यूँ

झील सी आँखों में मुझ को देख कर
दो दिए चुपके से जल जाते हैं क्यूँ

धूप छूती है बदन को जब ‘शमीम’
बर्फ़ के सूरज पिघल जाते हैं क्यूँ

ग़ज़लों में अब वो रंग न रानाई रह गई

ग़ज़लों में अब वो रंग न रानाई रह गई
कुछ रह गई तो क़ाफ़िया-पैमाई रह गई

लफ़्ज़ों का ये हिसार बुलंदी न छू सका
यूँ भी मिरे ख़याल की गहराई रह गई

क्या सोचिए कि रिश्ता-ए-दीवार क्या हुआ
धूपों से अब जो मारका-आराई रह गई

कब जाने साथ छोड़ दें दिल की ये धड़कनें
हर वक़्त सोचती यही तन्हाई रह गई

अपने ही फ़न की आग में जलते रहे ‘शमीम’
होंटों पे सब के हौसला-अफ़ज़ाई रह गई

हर एक लफ़्ज़ में पोशीदा इक अलाव न रख

हर एक लफ़्ज़ में पोशीदा इक अलाव न रख
है दोस्ती तो तकल्लुफ़ का रख-रखाव न रख

हर एक अक्स रवानी की नज़्र होता है
नदी से कौन ये जा कर कहे बहाओ न रख

ये और बात ज़माने पे आश्कार न हो
मिरी नज़र से छुाप कर तू दिल का घाव न रख

हिसार-ए-ज़ात से कट कर तो जी नहीं सकते
भँवर की ज़द से यूँ महफ़ूज़ अपनी नाव न रख

ये इंकिसार मुबारक ‘शमीम’ तुझ को मगर
अब इतना शाख़-ए-समर-दार में झुकाव न रख

जो ख़ुद पे बैठे बिठाए ज़वाल ले आए

जो ख़ुद पे बैठे बिठाए ज़वाल ले आए
कहाँ से हम भी लिखा कर कमाल ले आए

किवाड़ खोलें तो उड़ जाएँगी अबाबीलें
न जाने ज़ेहन में कैसा ख़याल ले आए

हर एक शख़्स समझ कर भी हो गया ख़ामोश
अज़ल से चेहरे पे हम वो सवाल ले आए

हैं राख राख मगर आज तक नहीं बिखरे
कहो हवा से हमारी मिसाल ले आए

सुलगती बुझती हुई ज़िंदगी की ये सौग़ात
‘शमीम’ अपने लिए माह-ओ-साल ले आए

मैं तो लम्हात की साज़िश का निशाना ठहरा

मैं तो लम्हात की साज़िश का निशाना ठहरा
तू जो ठहरा तो तिरे साथ ज़माना ठहरा

आने वाले किसी मौसम से हमें क्या लेना
दिल ही जब दर्द की ख़ुश्बू का ख़ज़ाना ठहरा

याद है राख-तले एक शरारे की तरह
ये जो बुझ जाए हवाओं का बहाना ठहरा

झूठ सच में कोई पहचान करे भी कैसे
जो हक़ीक़त का ही मेयार फ़साना ठहरा

अक्स बिखरे हुए चेहरों के हैं हर सम्त ‘शमीम’
दिल हमारा भी कोई आइना-ख़ाना ठहरा

सिलसिले ख़्वाब के अश्कों से सँवरते कब हैं

सिलसिले ख़्वाब के अश्कों से सँवरते कब हैं
आज दरिया भी समुंदर में उतरते कब हैं

वक़्त इक मौज है आता है गुज़र जाता है
डूब जाते हैं जो लम्हात उभरते कब हैं

यूँ भी लगता है तिरी याद बहुत है लेकिन
ज़ख़्म ये दिल के तिरी याद से भरते कब हैं

लहर के सामने साहिल की हक़ीक़त क्या है
जिन को जीना है वो हालात से डरते कब हैं

ये अलब बात है लहजे में उदासी है ‘शमीम’
वर्ना हम दर्द का इज़हार भी करते कब हैं

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