बसन्तजीत सिंह हरचंद की रचनाएँ

लोहा

मैं किसी जयप्रकाश से न मिला,
किसी विनोबा के आश्रम में
वसन्त बनकर न खिला
किसी भी गांधी की
लाठी न हुआ,
मुझे किसी पारस ने न छुआ
मैं लोहा हूँ लोहा
हथौड़े का
कल का
दात्री का
हल का

(समय की पतझड़ में, १९८२)

नाले पर

साफ़ – सुथरी सभ्यता की गन्दगी
अध- मैले लोगों की ज़िन्दगी
ढोता हुआ
नगर में से होता हुआ
बह रहा गन्दगी की
ज़िन्दगी का नाला

उठ रही है नाक में चुभती हुई बदबू ,
नहीं कोई ढांपता पर नाक
नहीं कोई थूकता “आ थू”

गंदे इस नाले पर
अध – टूटा ,अध – खड़ा मकान खड़ा है
जिसके भीतर इक पीला – सा मुखड़ा है ;
जिसकी आँखों में स्थिर आंसू की लहरी ,
जिसकी छाती में मरुस्थल की दोपहरी ;
जिसके आन्तर की राहों पर
दु;खों के आने और जाने से
चिन्ह बने घावों के
पावों के ;
जिसका अति दु;सह दुखड़ा ,
कियोंकि मरता सुकुमार कलेजे का टुकडा
— नवजात लाल —
है नोच रहा दारिद्र्य – काल
बन भूख

देख पाते यह कैसे नयन ?’
तभी तो छलकीं पलकें बन्द,
झाँक रहे दो सिकुड़े उरोज – सरोज
बन्धनहीन – स्वछन्द ;
अध – फटे ,पुराने ,मैले कुर्ते से
जिनमें न है मकरन्द;
पर हैं अधीर,

सहसा अब
उस हल्दी- से पीले – पीले चहरे की ,
आँखों में आंसू की धारा घहराई
पलकों के तट को तोड़ – तोड़ बह आई;
शिशु के नन्हें अधरों पर
लघु बूँद – बूँद गिरती है
जल रहे पेट की आग बुझाने को शायद

गंदे इस नाले की
गन्दी इस बस्ती में ,
बेकार , भूख के भाव , जवानी बिकती
पिचकी गालों वाले काले चेहरों में
उपन्यास , कविता अथवा
साकार बोलती हुई कहानी दिखती

( अग्निजा ,१९७८)

इन्द्र से

दल व दल
बढ रहे बादल
इधर से बढ रहे बादल,
उधर से बढ रहे बादल;
चतुर्दिक भर रहे बादल .

घटाटोप घन अंधियारे की बाढ़ ,बहे बादल ,
उमड़- घुमड़ते मद गर्वित चिंघाड़ रहे बादल।
निम्नग नद- नालों से नव शक्ति हथिया कर ,
अहंकार के छाये भीम पहाड़ ,बहे बादल ;
गरज – गरज कर दलित कलेजे फाड़ रहे बादल .

इंद्र ! तुम्हारे बादल मुसलधार बरस कर ,
बहा नहीं सकते इस विद्रोही बस्ती को .
गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले को
जन्म अभी देने की शुभ क्षमता इसमें है .

चाहे तेरे कितने भी
बढ़ते रहें
दल – बादल
दल व दल
दल बदल

(अग्निजा ,१९८०)

गीतेश्वर

ओ,गीतेश्वर !
भूख ही भूख है,
क्षुधा ही क्षुधा है
हृदयों में किसी के हर्ष नहीं रहा है
भारत अब भारतवर्ष नहीं रहा है ।

हज़ारों एकवस्त्रधारिणी दरिद्र – सुताओं को
शोषण निर्वस्त्रा करने पर तुला है .
थर -थर काँप रहीं प्रार्थनाएं ये ,
आकुला – व्याकुला हैं .
क्या इन्हें फिर आत्मा को मारना है ,
सत्य को हारना है .
हा ! विवशताओं ने
इनका मुख सीया है ,
इनके लिए कृष्ण कह तूने क्या किया है १

ये आत्म – ग्लानी के
लाक्षाग्रह में जल रही हैं ,
झुलस प्रतिपल रही हैं .
इन सबका परन्तप


परम तप —-
जल कर राख हो गया तो
तू कहीं का न रहेगा
न इन लोगों का
न उन लोकों का
तेरा यह उदार यश
कृष्ण पड़ जाएगा .
रज में गढ़ जाएगा .

संघर्ष फिर खड़ा है
संघर्ष फिर कड़ा है.
भीष्म प्रहारों से धराशायी भारत यह
मूर्छितप्राय पड़ा है .
तुझे ओ,युद्धेश्वर !
श्रृंगारिक वंशी फेंककर
उखड़े हुए पहिये का उग्र चक्र लिए
शत्रु पर दौड़ना है .
अपनी मर्यादा को
स्वयम ही तोड़ना है
हर ओर से लड़ना है
स्वयम ही मारना है .
स्वयम ही मरना है ।.
नहीं तो तेरी इस
गीता वाली अजेतव्य मूर्ति को
कुदालों ,हथोडों और छड़ों से घिरना है
टूट कर गिरना है ।।

मेरे इस देश में
हर्ष नहीं रहा है
और यह भारत
भारतवर्ष नहीं रहा है ;
इसलिए पृथ्वी पर
कब आ रहे हो तुम
ओ,गीतेश्वर !!

(अग्निजा, १९७८)

पृथ्वी-पुत्र

दोपहरी है , खेतों में हल हांक रहा है ।
कर्मठ जीवन – बिम्ब कृषक का
मेरी कविता की आँखों से झाँक रहा है ।।

इसके जलते ब्रह्मांड में
दूर- दूर तक कोई शीतल छाँव नहीं है ,
कंटीली झाड़ी तक का भी नाम नहीं है ;
पद रखने को ठांव नहीं है ।
अन्तरिक्ष में दु;खों का निर्वात ताप है ,
यहाँ जलद का जल ले आना घोर पाप है ;
मिला श्राप है ।

गर्मी से , श्रम से आकुल हो
झाड़ी पर कुर्ता फैलाए

अपने सिर पर ओढ़े फटी हुई छाया को
यह लेटा है ।
अभिशापों को इसने भुजभर के भेंटा है ;
पृथ्वी के जैसा ही पृथ्वी का बेटा है ।

तुच्छ बीज इसके पांवों से कुचले – रौंदे
पाद – परस पा उगते बन जीवन के पौधे ।
इसने यौवन झोंक दिया है
श्रम को जीवन सौंप दिया है ;
इन खेतों में
इसने निज को यहाँ – वहां पर रोप दिया है ।
फिर भी निर्धनता ने इस पर कोप किया है
जलन वेदना की इन प्राणों में गहरी है ।
दोपहरी है ।।

(अग्निजा , १९७८)

घर लौटता मजदूर

दिवस भर के कड़े श्रम से चूर ,
सांझ को घर लौटता मजदूर ;
याद कर निज झोंपड़ी ,
याद कर निज झोंपड़ी की प्रीति वह भरपूर ;
बाँध रखा उसे जिसने ,
लौटता मजदूर १

क्षुधा , चिंता , दीनता , व क्लेश
खा गये इसका यौवन नोचकर
रह गया है शेष ,
एकमात्र अध – खड़ा ध्वंसावशेष ।
क्षुब्ध शोषण तो
इक हथौड़ा है ,
रात – दिन पड़ते प्रहारों ने
इसे तोड़ा है ।

अपने सुख के भव्य महल का
इसकी इच्छाओं पर करके निर्माण
मिल – मालिक भगवान् जी रहा है ।
निर्बल के खून – पसीने को
बलवान पी रहा है ।
नादान ही रहा है ,
अपने ही भाई पर देखो ,
इंसान जी रहा है ।

घर पहुँच
खोल दरवाजा निज आँगन में
रुका वह खंखार कर अपना गला
लिपट टांगों से गये आ भाग दो बच्चे ;
चहक जीवन से उठा फिर घोंसला
छोड़ घर का काज भीतर से
सने- हाथों भागकर आई ,
सादगी की इक झलक
गृह – स्वामिनी १

और फिर
भुज , भुजाओं में फंसे
बात कर दोनों हंसे ,
हंसी लहरी में धंसी गहरी
मालिक की बड़- बड़ ;
वह मिल की खड़- खड़ ।।

(अग्निजा ,१९७८)

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