बहिणाबाई

बहिणाबाई की रचनाएँ

ये गोकुल चल हो

ये गोकुल चल हो कहत मुरारी।
मेघ तुसार निवारे फनिधर सेवा करे बलिहारी॥
बसुवा अपने कर दीन्हो पालख योंही कीन्हो
जमुना के तट आयके देखें पूरन निरंजन॥
पूरन रूप यो देखे जमुना जानीये सबही भाव
दोही ठौर भई जमुना नीर तब जानत यो हरि भाव॥
जैसा परवत वैसो नीर हवो जानी के हास
पाव लागे जनु बहे जायगे सब दोस॥
जिस चरन को तीरथ शंकर माथा रखीया नीर
वो चरन अब प्राप्त भये हो ये जान उधार॥
बहिनी कहे जिसकू हरि भावे, उसकू काल ही धोके
बसुदेवा कर आप ही मुरीरी काहे कुं संकट आवे॥

जीस आस जोगी जग

जीस आस जोगी जग,
जीस आस छोड़ भाग,
जीस आस ले बैराग बनवास जात है॥
जीस आस पान खावे,
जीस आस धरत सोवें,
जप तप ही करतु है॥
जीस आस शिर मुंडे,
जीस आस मुच्छ खंडे,
जीस आस होते रंडे,
जलमे वसतु है॥
वो ही सत्य जान नंद,
प्रगट भया है गोविंद,
पुण्य ही तेरा अगाध,
बहिणी ये कहतु है॥

ये अजब बात सुनाई भाई

ये अजब बात सुनाई भाई।
गरुड़ को पंख हिरावे कागा
लक्ष्मी चरन चुराई॥

ये सूरज को बींब अंधोर,
सोवे चंदर कूं आग जगावे।
राहु के गिहो भोगी कहा रे,
अमृत ले भर जावे॥

कुबेर सोवे धन के आस,
हनुमान जोरु मंगावें।
वैसे सब ही झुटा है,
निंदा की बात सुनावे॥

समीदर तान्हो पीयत कैसो,
साधू मांगत दान।
बहिनी कहे जन निंदक है रे,
बाको सांच न मान॥

मरन सो हक रे है बाबा

मरन सो हक रे है बाबा
मरन सो हक है॥
काहे डरावत मोहे बाबा,
उपजे सो मर जाये भाई।
मरन धरन सा कोई बाबा,
जनन-मरन ये दोनों भाई।
मोकले तन के साथ
मोती पुरे सो आपही मरेंगे,
बदनामी झुठी बात॥
जैसा करना वैसा भरना,
संचित ये ही प्रमान।
तारन हार तो न्यारा है रे,
हकीम वो रहिमान॥
बहिनी कहे वो अपनी बात,
काहे करे डौर (गौर)।
ग्यानी होवे तो समज लेवे,
मरन करे आपे दूर॥

वैसी रात बढ़ाई

वैसी रात बढ़ाई
सब जानो तुम भाई॥
देव कहे सो कहा न होवे,
सुन रे मूढ़ो अंध।
लीला मनुख भई जीस,
मणिका छूटा बंद॥
रावन मार के विभीषण लंका,
यह पाई राज्य कमाई।
राक्षस कू अमराई दीयो,
ये वैसे राम नबाई॥
पहरादों विश्व समिंदर बुरना
परबत लोट दिया है।
आगे जलावे पिता उसका
सत्व से राम रखावे॥
पानी मांहे गजकू छोड़े,
सावज मार न भाई।
उसको रन्यो कुटनी मुक्तो,
करता राम सो वोही॥
मिरा को बिख अमृत किया,
फत्तर कू दूध पिलाया।
स्वामी बिख चढ़े तब राम-राम,
ऐसो बीरद बढ़ाया॥
शनि को रूप लिया,
राम राखो भक्त को सीस।
ब्रह्मन सुदामा सुन्नो की नगरी,
वैसे करे जगदीश॥
वैसे भगत बहुत रखे,
तब कहा कहु जी बढ़ाई।
बहिनी कहे तुम भक्त कृपाल हो,
जो करे सो सब होई॥

जय कृष्ण कृपाल भयो जी

जय कृष्ण कृपाल भयो जी
नहीं कीये जप तप दान
नै गृही ब्रह्मन पूजन
कीया भूमि नहि गोदान॥
तुम क्यौं प्रगट बयो कहा जानो
अर्चन वंदन नहिं कछु पायो
हाय अचंवा मान॥
अन्न दीयो तब या
रसि नहि देवन पूजो भाव
तीरथ यात्रा कछु नहीं जोड़ी
कहा भयो नवलाव॥
वनधारी और निरबाना है
पत्र लिखावत जान
नंगाह पांव, नंगा देहहि
बन बन जावत रात।
परबत मांहे जोगी होकर
छोड़ दिया संसार
धूमरपान और पंचाग्नी साधन
बैठे जल की धार॥
बहिनी कहे कहा जलम का
संचित प्राप्त भये इस बेला
चार भुजा हरि मुझ को दिखाया
ये ही कहो घन नीला॥

जटा न कंथा सिंगी न शंख

जटा न कंथा सिंगी न शंख।
अलख मेक हमारा बाबू।
झोली न पत्र कान में मुद्रा।
गगन पर देख तारा॥
बाबा हमतो निरंजन वासी,
साधू संत योगी जान लो हम क्या जाने घरवासी॥
माता न पिता बंधु न भगिनी।
गव गोत बो सब न्यारा।
काया न माया रूप न रेखा।
उलटा पंथ हमारा बाबा।
धोती न पोथी जात न कुल।
सहजी-सहजी भेक पाया।
अनुभवी पत्रि सी सिद्ध की खादी।
उन नी ध्यान लगाया॥
बोध बाल पर बैठा भाई।
देखत हे तिन्ह लोक।
ऊर्ध्व नयन की उलटी पाती।
जहाँ प्रकाश आनंद कोटि॥
भाव भगत मांगत भिक्षा।
तेरा मोक्ष कीदर रहा दिखाई।
बहिनी कहे मैं दासी संतन की।
तेरे पर बलि जावे॥

दो दिन की दुनिया रे बाबा

दो दिन की दुनिया रे बाबा
दो दिन की है दुनिया॥

ले अल्ला का नाम कूल धरो ध्यान।
बंदे न होना गुंमान।
गाव रतन से ही सार।
नई आवेगा दूज बार।
वेगी करो है फिकीर।
करो अल्ला की जिकीर॥

करो अल्ला की फिकीर।
तब मिलेगा गामील पीर।
बहिणी कहे तुजे पुकार।
कृष्ण नाम तमे हुसियार॥

कंटक को मल्ल मर्द

कंटक को मल्ल मर्द
दौतन को सिर छेद
सुत तेरा नंद कृष्ण
तोही जानी है, गोपिन को प्राननाथ
भक्तन कू करे सनाथ
शास्तर की ऐसी बात
संत जानी है॥
धरम का रक्षन आया
पाप कू सब डार दिया
बोही सुत कृष्ण भया
बात ये सत्य मानी है
सुत मत कहो नंद, ब्रह्म सो ये ही गोविंद।
बहिनी का भार प्रबंध, सत्य सुदाईये॥

सच्चा साहब तूं येक मेरा

सच्चा साहब तूं येक मेरा,
काहे मुजे फिकीर।
महाल मुलुख परवा नही,
क्या करूं पील पथीर॥
गोविंद चाकरी पकरी,
पकरी पकरी तेरी॥
साहेब तेरी जिकीर करते,
माया परदा हुवा दूर।
चारो दील भाई पीछे रहते हैं,
बंदा हुज़ूर॥
मेरा भी पन सट कर,
साहेब पकरे तेरे पाय।
बहिनी कहे तुमसे गोंविंद,
तेरे पर बलि जाय॥

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