बाबूलाल मधुकर

बाबूलाल मधुकर की रचनाएँ

तुम्हारे नाम

तुम्हारी अर्चना कर सकूँ
तुम्हारी वन्दना कर सकूँ
ऐसा कोई विश्वास तो
तुमने दिया नहीं!
अपनी वंशावली और
भौगोलिक सीमा-सुरक्षा का ध्यान रखकर
हमारी असुरक्षित काया को
कुट्टी-कुट्टी काटकर आपसी हित में बाँटने—
के सिवा और क्या किया है तुमने?
हमारे श्रम के पुण्य फल पर कुंडली मारकर बैठने
के सिवा और क्या किया है तुमने?
हमें दरकिनार कर—
आज भी आग पर ढाहने
के सिवा और क्या किया है तुमने?
मैं मुक्त नहीं हो सकूँ
इसके लिए मकड़े का जाल बुनने
के सिवा और क्या किया है तुमने?
अभी-अभी जो मंगल-कलश चढ़ा है
उसे रोटी से बड़ा समझने—
के सिवा और क्या किया है तुमने?
यह सब कुछ करना
कितनी बड़ी बेईमानी है
जबकि लाल अभी गंगा का पानी है
उसे धूमिल और टेस करने
के सिवा और क्या किया है तुमने?
तुम्हारी अर्चना कर सकूँ
तुम्हारी वन्दना कर सकूँ
ऐसा कोई विश्वास तो
तुमने दिया ही नहीं!!

तलाश

मेरे चारों ओर शिविर लगे हुए हैं
जहाँ नयी-नयी तालीमें दी जा रही हैं
दिशाओं में शोर है, इतिहास बदला जा रहा है
दलित मूल्यों के पाये ढाहे जा रहे हैं
परम्परा के अनुसार कोई मसीहा या कोई—
अवतार जन्म ले रहा है
मैं एक अदना आदमी की हैसियत से
शिविर को देख रह हूँ
ग्लोब पर खड़ा होकर
भूगोल को देख रहा हूँ
जब कभी मेरी अँतड़ियों की ऐंठन से
आह और कराह निकलती है
तभी फुँफकार के अपराध में
मेरी क़ौम की बस्तियों में
आग लगती रही है आग
जिसे शिविर के लोग
तमाशे की तरह देखते रहे हैं
मसीहा मुस्कुराता रहा है
और मैं चौराहे पर खड़ा होकर
अपनी जमात की तलाश करता रहा
तलाश!!

कठगर-रसगर दतवन

ओ संथाल परगना—
सिंहभूमि की बेटियो!
आठ आने में तुम कब तक बेचती रहोगी
अपने ही समतुल्य कठगर-कचगर-रसगर
दुधगर और पनगर मुट्ठा भर दतवन
अपनी अस्मत और क़िस्मत
कब तक बेचती रहोगी… कब तक?

दतवन और तुम, एक-दूसरे का
पर्याय बना दी गयी हो
तुम नगर-महानगर में लादकर
लपेटकर-सहेजकर लाती हो दतवन
और तुम्हारे साथ ही बेचैन होकर
चले जाते हैं जंगल-पहाड़
चली जाती हैं नदियाँ-निर्झरणियाँ
सभ्यता संस्कृति आदमियत
निश्छलता और प्रकृति
इन सबसे अलग हो
बहुत ही अलग
तुम लादे हुए होती हो घुघुआते हुए
दहकते हुए कोयले की तरह धधकती हुई—
टहकती हुई अपनी भूख, अपनी ग़रीबी

ओ रत्न-गर्भा संथाल परगना—
सिंहभूमि की बेटियो!
तुम बख़ूबी जानती हो कि तुम्हारी
कोख से ही जन्म लेते हैं
कोयला, हीरा, मोती, मूँगा, लोहा, अभ्रक
और बहुत-बहुत क़िस्म के अनमोल रत्नधन
लेकिन तुम्हारे हिस्से में तिजारत करने के लिए है
सिर्फ़ दतवन, हाँ सिर्फ़ दतवन

ओ संथाल परगना—
सिंहभूमि की बेटियो!
अब भी बोलो, मुँह खोलो
पहचानो अपने दिक्कू को
तुम्हारे दिक्कू अब विदेश में नहीं बसते
बल्कि अपने ही देश में,
अपने ही प्रदेश में बसते हैं
तभी तो तुम सदियों से
नगर सभ्यता के बीच
फुटपाथ पर आठ आने मुट्ठा दतवन
के साथ-साथ अपनी अस्मत और
क़िस्मत को बेचकर नमक के साथ
खाती हो बसियाई-कठुआई रोटी
बोलो, यह सब कब तक, कब तक?

ओ संथाल परगना—
सिंहभूमि की बेटियो!
नगर सभ्यता मदान्ध है—
वह जानकर भी अनजान है
तभी तो सदियों से लोकतान्त्रिक चौराहे पर
आठ आने में बिक रही है सभ्यता
संस्कृति, अस्मत और क़िस्मत
जिस पर ही गुमान है इस देश के
कर्णधार पहरुओं को…

ओ संथाल परगना—
सिंहभूमि की बेटियो!
तुम्हें क़त्तई निराश नहीं होना है
भाग्य-भरोसे क़त्तई नहीं सोना है
देखो पूरब में घन-घटा छा रही है
पढ़ो
बिजलियाँ इतिहास के अद्यतन
सुनहरे पृष्ठ पर
तुम्हारे ही नाम लिख रही हैं
और कड़क-कड़क कर कह रही हैं
दतवन के सात-साथ
पर्वतास्त्र लाने के लिए
हाँ, पर्वतास्त्र
नगर-सभ्यता के बीचो-बीच
पटक देने के लिए—
सभ्यता-संस्कृति
अस्मत और क़िस्मत
की रक्षा के साथ-साथ
तुम्हारी भूख और ग़रीबी
मिटा देने के लिए!

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