बालकृष्ण गर्ग की रचनाएँ

कानाबाती कुर्र

मेढक बोले टर्र,
बर्राती है बर्र ।

जूता बोले चर्र,
मोटर चलती घर्र ।

मम्मी सोतीं खर्र,
पापा जाते डर्र ।

चिड़िया उडती फुर्र,
कानाबाती कुर्र ।

सबसे अच्छी नानी

दूध न पीता गुड्डा,
हुआ तभी तो बुड्ढा ।

खाती दाल न रोटी,
फिर भी गुड़िया मोटी ।

दिन भर नटखट भैया,
करता धम्मक-धय्या ।

कपड़ा इतना मँहगा,
बहना माँगे लँहगा ।

चिढ़ जाते जब चाचा,
मारें मुझे तमाचा ।

पापा करते गड़बड़,
मम्मी करतीं बडबड ।

खों-खों खाँसे दादी,
तम्बाकू की आदी ।

सबसे अच्छी नानी,
कहती रोज कहानी ।

नाकाबाती छीं

सर्दी में थर-थर,
गर्मी में लू-लू ।

तुम करते हा-हा,
हम करते हू-हू ।

मीठा-मीठा गप,
कड़वा-कड़वा थू ।

नाकाबाती छीं,
कानाबाती कू ।

देश हमारा एक है

देश हमारा एक है
मज़हब अलग अलग है
लेकिन देश हमारा एक है

हम सब एक देश के वासी
यही हमारा काबा – काशी .
यहीं मरेंगे यहीं जियेंगे
भाग्य सितारा एक है
देश हमारा एक है .

हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
रिश्ते में हैं भाई भाई
किश्ती अलग-अलग है बेशक ,
किन्तु किनारा एक है
देश हमारा एक है .

कभी ईद है कभी दिवाली
रहती यहाँ सदा खुशहाली
नज़र भले हीं अलग अलग है
मगर नज़ारा एक है
देश हमारा एक है .

जुदा न कोई कर पाएगा
करने वाला पछताएगा
हम अखंड भारत के प्रहरी
सबका नारा एक है
देश हमारा एक है .

कदम मिलाकर सदा बढ़ेंगे
नए नए परवान चढेंगे
एक ओर बहना है सबको
सबकी धारा एक है
देश हमारा एक है .

मीठा सपना

चंदा-सूरज केक हमारे,
चाकलेट बन गए सितारे!
बादल थे शक्कमर के गोले,
बरसे नभ से मीठे ओले!

आइसक्रीम बन गए पर्वत,
सागर-नदियों में था शर्बत!
तालाबों में दिखे न कोई,
तैर रही थी मधुर मलाई!

तरह-तरह के टाफी बिस्कुट,
लटके थे पेड़ों पर छुटपुट!
ज्यों ही हाथ बढ़ाया अपना,
टूट गया झट मीठा सपना!

पेटूलाला

पेटू लाला,
चाट-मसाला।
छोले आलू,
नरम कचालू।
इडली-डोसे,
गरम समोसे
दही-पकौड़ी,
सोंठ-कचौड़ी!
आलू टिक्की,
गुड़ की चिक्की!
रसगुल्ले हों,
तो हल्ले हों!
लार टपकती,
जीभ लपकती!
बस डट जाते,
चट कर जाते!

तुक्का

तड़बड़ बजता ताशा,
मीठा लगे बताशा।

मार करारा झापड़,
तोड़ा हमने पापड़।

फड़-फड़ उड़े दुपट्टा,
मारे चील झपट्टा।

छत पर बोले कौआ,
उड़े गगन कनकौआ।

भिन्नाता है मच्छर,
बोझा ढोता खच्चर।

सट-सट लगता कोड़ा,
सरपट दौड़े घोड़ा।

बैठ कार में कुत्ता,
पहुँच गया कलकत्ता।

मेरी प्यारी बिल्ली,
देख चुकी है दिल्ली।

मार तुकों में मुक्का,
बन जाएगा ‘तुक्का’!

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