बिन्दु जी की रचनाएँ

हे दयामय दीन पालक अज विमल निष्काम हो

हे दयामय दीन पालक अज विमल निष्काम हो।
जगतपति जग व्याप्त जगदाधार जग विश्राम हो।
दिवस-निशि जिसकी प्रबल भय रोग कि हो वंदना।
उस दुखी जन के लिए तुम वास्तविक सुख धाम हो।
क्लेश इस कलिकाल का उसको कभी व्यापे नहीं।
ह्रदय में जिनके तुम्हारा ध्यान आठो याम हो॥
एक ही अभिलाष है पूरी इसे कर दो प्रभो।
मेरी रसना पे सदा रस ‘बिन्दु’ मय तव नाम हो॥

अधमों के नाथ उबारना तुम्हें याद हो कि न याद हो

अधमों के नाथ उबारना तुम्हें याद हो कि न याद हो।
मद खल जनों का उतारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
प्रह्लाद जब मरने लगा, खंजर पै सिर धरने लगा।
उस दिन का खंम्भ बिदारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
धृतराष्ट्र के दरबार में दुखी द्रौपदी की पुकार में।
साड़ी के थान संवारना तुम्हें याद हो कि न याद हो।
सुरराज ने जो किया प्रलय, ब्रजधाम बसने के समय।
गिरवर नखों पर धारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥
हम ‘बिन्दु’ जिनके निराश हो, केवल तुम्हारी आस हो।
उनकी दशाएँ सुधारना तुम्हें याद हो कि न याद हो॥

दशा मुझ दीन की भगवन सम्हालोगे तो क्या होगा

दशा मुझ दीन की भगवन सम्हालोगे तो क्या होगा।
अगर चरणों की सेवा में लगा लोगे तो क्या होगा॥
नामी पातकी हूँ मैं और नामी पापहर तुम हो।
जो लज्जा दोनों कि बचा लोगे तो क्या होगा॥
जिन्होंने तुमको करुणाकर पतितपावन बनाया है।
उन्हीं पतितों को तुम पावन बना लोगे तो क्या होगा॥
यहाँ सब मुझसे कहते हैं तू मेरा तू मेरा है।
मैं किसका हूँ ये झगड़ा तुम मिटा दोगे तो क्या होगा॥
अजामिल गिद्ध गणिका जिस दया गंगा से तरते हैं।
उसी में ‘बिन्दु’ सा पापी मिला लोगे तो क्या होगा?

जिधर मैं देखता हूँ मुझको नज़र वो घनश्याम आ रहा है

जिधर मैं देखता हूँ मुझको नज़र वो घनश्याम आ रहा है।
जगत कि हर एक वस्तु में प्रकाश अपना दिखा रहा है॥
ग्रहादि नक्षत्र रवि सुधाकर निशा दिवस वायु व्योम जलधर।
अनेक रंगों के रूप धरकर सभी के दिल को लुभा रहा है॥
सघन निर्जन में वन चमन में धरा में धामों में धान्य थल में।
हरेक तन में हरेक मन में वो नन्द-नन्दन स्मर रहा है।
कभी वो माखन चुरा रहा है कभी वो गायें चरा रहा है।
कभी वो बंसी बजा रहा है कभी गीता सुना रहा है॥
कभी मिला वो कृष्ण राम बनकर हरेक अवतार नाम बनकर।
तो ‘बिन्दु’ भी उसका धाम बनकर दृगों में उसको बसा रहा है॥

कन्हैया प्यारे दुलारे मोहन बजाओ फिर अपनी प्यारी बंसी

कन्हैया प्यारे दुलारे मोहन बजाओ फिर अपनी प्यारी बंसी।
जो भक्त बेसुध हैं जो उठेंगे सुनेंगे जिस दम तुम्हारी बंसी॥
जो चलता दुष्टों का बार जग में जो बढ़ता पापों का भार जग में।
तो लेके कृष्णावतार जग में बजा दो मोहन मुरारी बंसी॥
सभी निशा मोह से जगे थे, स्वधर्म पालन में सब लगे थे।
सभी के दिल प्रेम में रंगे थे पर जब तुमने धारी बंसी।
कभी बनी बंसी प्रेम सूरत, कभी बनी बंसी ज्ञान मूरत।
पड़ी जो सत्कर्म कि जरूरत तो गीता बन कर पुकारी बंसी॥
कहे यमुना प्रेम ‘बिन्दु’ तन में, हों इन्द्रियां सब लगन में।
तो फिर इस दिल के वृन्दावन में बजायेंगे बांकेबिहारी बंसी॥

कृपा करो हम पै श्यामसुंदर ऐ भक्तवत्सल कहने वाले

कृपा करो हम पै श्यामसुंदर ऐ भक्तवत्सल कहने वाले।
तुम्हीं हो धनुशर चलाने वाले तुम्हीं हो मुरली बजाने वाले॥
तुम्हें पुकारा था द्रौपदी ने बचाया प्रहलाद को तुम्हीं ने॥
तुम्हीं हो खम्भे में आने वाले, तुम्हीं हो साड़ी बढाने वाले॥
तुम्हीं ने ब्रज से प्रलय हटाया, समुद्र में सेतु भी बनाया।
ऐ जल पे पत्थर तैरने वाले, ऐ नख पे गिरवर उठाने वाले॥
इधर सुदामा गरीब ब्राम्हण, उधर दुखी दीन था विभीषण।
उसे भी लंका दिलाने वाले, इसे त्रिलोकी लुटाने वाले॥
ऐ कोशिलासुत यशोदानंदन, अधीन दुःख ‘बिन्दु’ के निकंदन।
छुड़ा दो मेरे भी जग के बंधन, ऐ गज के फंदे छुड़ाने वाले॥

हमें निज धर्म पर चलना बताती रोज रामायण

हमें निज धर्म पर चलना बताती रोज रामायण।
सदा शुभ आचरण करना सिखाती रोज रामायण॥
जिन्हें संसार सागर से उतर कर पार जाना है।
उन्हें सुख से किनारे पर लगाती रोज रामायण॥
कहीं छवि विष्णु की बाकी, कहीं शंकर की है झाँकी।
हृदय आनंद झूले पर झुलाती रोज रामायण॥
सरल कविता की कुंजों में बना मंदिर है हिंदी का।
जहाँ प्रभु प्रेम का दर्शन कराती रोज रामायण॥
कभी वेदों के सागर में कभी गीता की गंगा में।
सभी रस ‘बिन्दु’ में मन को दबाती रोज रामायण॥

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