बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा 'बिन्दु'

बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा ‘बिन्दु’ की रचनाएँ

आओ चलो चलें

आओ चलो चलें कुछ नेक काम करने
भला और भलाई का एक काम करने।
कुछ हम सीखें कुछ तुम सीखो
न हम चीखें और न तुम चीखो
आपस में प्रेम अब करना है
दुनिया से अब क्या डरना है
आओ चले बढ़ें कुछ नेक काम करने
भला और भलाई का एक काम करने।
कुछ भूले-भटके हमराही को
नेता-नायक और सिपाही को
उन्हें सेवा-सत्य सिखला देंगे
घट अमृत रस उन्हें पिला देंगे
तन-मन से कहें कुछ नेक काम करने
भला और भलाई का एक काम करने।
दुर्जन तुम सज्जन बन कर
अब भेद-भाव सब दूर करो
क्यों खून-खरावा करते हो
आपस में मिलना मंजूर करो
मिलकर सब साथ चलें नेक काम करने
भला और भलाई का एक काम करने।

ऋतु राज

मंद पवन वसंत के अब मंद-मंद मुस्काय
तापर फागुन चढ़ि गई घूंघट लिये हटाय।
निकला मूॅछ आम्र का महुआ गया फुलाय
पोर-पोर में रस भरा पोखर गया सुखाय।
फूल पलास देख लिए देख लिए ऋतु राज
पिहु-पिहु पपिहा बोले सरगम जैसे आज।
धानी चुनर ओढ़ि के अब मधुवन करे श्रृंगार
हरष गया यह देखि के बुलबुल करे विहार।
रंग-गुलाल सी तितली जहाँ-तहाँ इतराय
रस फागुन में भीजकर गया जैसे लपटाय।
चढ़ि जवानी आई गई बूढ़ हो गये सयान
यौवन देखि खिल गये होठन पर मुस्कान।
बिरहन से मत पूछिए उनकी लम्बी तान
यौवन से चूनर हटी लगी नजर की बान।

एकता

कर्म पुंजी है
मेहनत मार्ग है मंजिल की
बल हमारी एकता
एक ताकत है
तकदीर बदलने की।
मेल-मुहब्बत
समन्वय का प्रतिक है
शक्ति जिसकी ऑखें
मेल के बिना कोई खेल नहीं
किसी कि उन्नति
किसी कि तरक्की
किसी का उत्थान नहीं।
जिंदगी
उनके अलग-अलग रास्ते
या फिर और कुछ
बन नहीं सकती
बिन मेल की गाड़ी
बिन मेल की मुहब्बत।
विखर जाती है जिंदगी
टूट जाते हैं सपनें
मिट्टी और शीशे की तरह
अलग हो कर
हम आप और वो
रह जाते है किनारे
किसी कचरे में।
कोई भी
कुछ भी नहीं कर सकता
इस पात्र से जुड़िये
आत्मा कि प्यास
दिल की धड़कन
ताक पर रख दीजिए।
दिल जोड़ने वाला
नायक
हर काम बनाने वाली
यही एकता
यही कर्म
और यही मेहनत है।
प्रेम सिखलाने वाला महा प्रसाद
महा मंत्र बतलाने वाला
एक यंत्र
जो हमें देता है
कभी न खत्म होने वाला
एक सिलसिला।

कमबख्त दिल

बिन मिले ही दूर से आपका सलाम हो गया
बंदा आपके पास आया नहीं गुलाम हो गया।
बिन मिले ही दूर…

मेहमान नमाजी कब तलक ख़िदमत हाजिर रहे
बिनमोल बिकने वाला सरे आम नीलाम हो गया
बिन मिले ही दूर…

दिल की बात मत पूछिये और न खबर लीजिए
कमबख्त अपना दिल लगाया था हलाल हो गया
बिन मिले ही दूर…

कि अब किसे अच्छा और किसे खराब कहियेगा
ऐसा क्या जो मुहब्बत में बंदा बदनाम हो गया
बिन मिले ही दूर…

बहुत याद किया बहुत सपनें देखे थे प्यार के मैंने
सब धरे के धरे रह गये दिल कत्लेआम हो गया
बिन मिले ही दूर…

न तो चैन था और न ही नींद थी ऑखों में मेरे
दिल उखड़ा सा था और चेहरा मलाल हो गया
बिन मिले ही दूर….

कि पूछिये मत दूसरे दिल की बात अपने दिल से
बिन्दु यही किया था कि जिंदगी फटेहाल हो गया
बिन मिले ही दूर…

करप्सन

परदे में कुछ रहा नहीं अब सब परदे के बाहर है
करप्सन खुली किताब क्यों ये सरकार कायर है।
कहीं घोटाला कहीं हवाला कहीं धमाका फायर है
खेलाड़ी आतंकी है क्यों आतंकबाद अम्पायर है।
हर दास्तावेज पर अब घूस की मोहर चलती है
कानून चाहे जो भी हो झूठ की बोली लगती है।
कौन देखता किसको यहॉ कौन भूखा और नंगा है
गरीब के लिए बाढ़-सूखा और हर चीज मंहगा है।
समय बदलता पर आदत आज तलक नहीं बदली
सफेदपोश घूमते खुले आम कौन असली और नकली।
लोग उल्लू सीधा करने में दूसरे का पैर काट देते
पैसे के लिए अपना मरा फोटो पोस्टर में साट देते।
मानवता की बात इंसान अब हैवान से क्या करे
एक नासमझ बेईमान शैतान से उम्मीद क्या करे।
गरीब भूख में सोया तो जहॉ का वहीं पड़ा रह जाता
सरकारी गोदामों में अनाज सड़ा का सड़ा रह जाता।
मरने के बाद मीड़िया ही बस्ती में भीड़ जुटाती है
बदले में चार बोरी अनाज जनता को दे जाती है।
जनता और सरकार सब कुछ देखती और जानती है
मुक दर्शक जनता कुदती है सरकार बेवाक फॉदती है।
इसी तरह चलती है दुनिया कहीं विश्वास तो कहीं झॉसा
वाह रे खेल वाह रे तमाशा कहीं आशा तो कहीं निराशा।

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