बीरेन्द्र कुमार महतो की रचनाएँ

यादें

(अपने संघर्षशील पिता को याद करते हुए)

बाबा तुम्हारी आवाज
गुंजती है
खेत-खलिहानों में
लहलहाते खेतों में
कलकल बहते
नदी और झरनों में
हर दिशाओं में
हर कोने में,
हां, गुंजती है
बाबा तुम्हारी आवाज,
हरदम, हर पल, हर क्षण
गुंजता है, हवाओं में
हौले-हौले से
पवन का झोंका सा,
गुंजती है
बाबा तुम्हारी आवाज,
इस पहर से उस पहर तक
सांझ और भोर
हरदम दिलाती है याद
बाबा तुम्हारी आवाज,
गुंजती है
चहुं-दिशाओं में
बच्चों की किलकारियों सा
रह-रह कर तड़पाती
तुम्हारी सुरीली आवाज,
भोर का जगना
अब तो नहीं लगता जगना
क्योंकि, तुम्हारी
वो मीठी, प्यारी आवाज
न जाने कहां, कब
गुम सा हो गया
और न जाने तुम
हमसे रूठ कर
कहां खो गये,
फिर भी
बचा रह गया है
घर के हरेक कोने में
हरेक साजो सामान में
तुम्हारी मीटठी-प्यारी सी आवाज!
हॉं बाबा, तुम्हारी मीटठी-प्यारी सी आवाज..!

दादा तुम कहाँ हो?

किस दिशा, किस ओर
मेरे आने से पहले ही तुम
क्यों मुझसे रूठ गये
कहो न, दादा तुम कहां हो?
नहीं लगता तुम्हारे बिन
मेरा मन,
जब दादी सुनाती है
तुम्हारी प्यारी बातें,
और मैं
सुनते-सुनते सो जाती हूॅं
दादी की गोद में,
कहो न, दादा तुम कहां हो?
दादी की डबडबायी सी ऑंखों से
ढरकते आंसूओं में डूब जाती हूॅं
और फिर ढूंढती हूॅं
सपनों की उस दुनिया में
जहां, सिर्फ और सिर्फ
सपनें ही हैं,
कहो न, दादा तुम कहां हो?
दादा तुम कहां हो…?

अवकात

वो कर रहे चहुंओर
कत्लेआम,
दिकू संग बैठ बना रहे
मॉडल,
समूल नष्ट करने की,
और तुम रिरया रहे हो
बैठ,
उसी परदेसी के संग?
कभी
भाषा के नाम पर
कभी
संस्कृति के नाम पर
तो कभी
अस्मिता और पहचान के नाम पर,
लूट रहे हैं,
अखड़ा में झूम रहे हैं
दिकू,
सहिया मेहमान बन,
जो खुद जूझ रहे हैं
अपने को खोज रहे हैं
इतिहास के पन्नों में,
वो वातानुकूलित कोठरी में
बैठ,
दिखा रहा तुम्हें
सीखा रहा तुम्हें
बता रहा तुम्हें
तुम्हारे ही घर
तुम्हें,
तुम्हारी अवकात…!

तुम सिर्फ़ नाचो

तुम दूसरों को
रिझाने के लिए बनी हो
अपनी थकान,
मिटाने के बहाने
गीत-नृत्य-संगीत की ताल पर
मेरी थकान मिटाओं,
अपनी हाथों से
मदिरा का,
रस-पान कराओ,
मैं रिझूँ
अपनी प्यास बुझाउँ,
इसलिए,
तुम सिर्फ नाचो
और मैं तुम्हारी
गदराई काया को
देखता रहूँ,
हॉं, देखता रहूँ,
तुम्हारी स्तनों की उभारों को
कमर की चिकनाहटों को
देखता रहूँ,
हॉं, देखता रहूँ,
तुम्हारी नशीली नयनों में
और अपने को डूबोता रहॅ
टूटी-लटकी काया का
मदिरा पान करता रहॅू
तुम्हारी तन-मन को
निचोड़ता रहूँ
तब तक,
तुम सिर्फ और सिर्फ नाचो…!

चाह

अपना गांव भी अब तो
नहीं लगता अपना,
उजाड़ और विरान
हर तरफ
सिर्फ बंजर ही बंजर
पड़े हैं सारे के सारे खेत,
बूढ़ी दादी भी अब तो
नहीं सिझाती धान
हुआ करती थी कभी वो
सुनी खलिहानों की शान,
खाली-ढंगढंग पडें हैं
सारे के सारे बासन-बर्तन
चुल्हें पर भी
नहीं दिखते ताव
पातुर विहिन हो गया अब तो
सारा का सारा गांव बेजान,
चरॅंई चुरगुनों की चहचहाहट
भगजोगनियों की जगमगाती बती
नहीं दिखाई देता अब तो
बूढ़ी दादी की हाथों में
बॉंस की प्यारी लाठी,
नहीं देता सुनाई अब तो
फिकड़ों की आवाज
बूढ़ी दादी की
बेजान काया-सवांग में
बची है अब भी
पथराई टिमटिमाती खुली आँखों में
जीने की चाह… जीने की चाह…!

कफ़न

आँसूओं में डूबी थी
हसरतें हमारी
कई-कई जख्मों का
इल्जाम था हमारे सर,
यूं तो इरादा न था
कत्लेआम की
पर उनकी कातिलाना
अदा देख
रोक न सका
जुल्म-ए-सितम
ढाने को,
बदकिस्मत वो थीं
या मैं
देखो, बैठे हैं
मेरी मैयत में
जनाजा गुजर रहा
हमसे पहले
हमारे ही कफन पर!

विडम्बना

ये कैसी विडम्बना है जीवन की
सब कुछ होते हुए भी
न जाने क्यों
बेचैनी सी होती है
और भी ज्यादा
ज्यादा पाने की,
न जाने क्यों
खुशहाल जिंदगी में अक्सर
रोने का मन करता है
बनी-भूति, मेहनत-मजदूरी के दिन
सुकुन भरी जिंदगी
जिया करता था अक्सर,
दो बखत की
नून-रोटी से काफी खुश था
आज इस उंचाइयों पर
कुछ भी अच्छा नहीं लगता
आखिर किसके लिए
मेहनत करता हूं
किसके लिए कमाता हूं
जिंदगी की इस भागमभाम
रेला में
सिर्फ तनाव ही तनाव हैं
मेरे हिस्से में,
एक तरफ शारीरिक पीड़ा
तो दूसरी तरफ मानसिक बेचैनी,
रंग बदलती इस दुनिया की
आपाधापी में,
यह विडम्बना ही है
सुकुन के वो दो पल
खो दिये मैंने
जिसमें जीवन का सारा
सुख, समृद्धि था छिपा!

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