बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाएँ

चानन गाछ बनल छी

चारू कात बसैए विषधर
पोरे-पोर डसल छी
एहि बिखाह जंगल मे हमही
चानन गाछ बनल छी ।

खेत पथार धान उपटा कें
माहुर लोक रोपै अछि
रस्ता पैरा सभठाँ अगबे
रेङनी काँट फुलै अछि

किछु कमलक खातिर, रवि हम
भरि छाती पाँक धसल छी ।

ओलती कें चिनबार न सोहबइ
दूनू मे न पटै अछि
फूटल बासन रेसनिहार
क्यो नहि एहि गाम भेटै अछि

हम तँ युगक भाल सँ
सिनुरक ठोपे जकाँ पोछल छी ।

नव जातिक होलिका हसय
केवल प्रह्लाद जरै अछि
सूर्यक एहि सतलखा महल मे
बादुर आब रहै अछि

हमर मोल द्वापरे कहत
बसुली हम झोल भरल छी ।

कोहबर

पुरइन दह सन सीतल कोहबर
चानन लागल केबार हे!
ताहि पैसि सुतलाह दुलहा रघुबर दुलहा
संग सुतलि सुकुमारि हे!

नव रंग पटिया, नवहि रंग निनिया
चारू दिसि फूल छिरिआइ हे
पातरि सुहबे सुतहु नहि जानइ
सेज तजि भुइयाँ लेटाइ हे

अलप वयस धनि मुहो न उघारइ
थर-थर काँपइ देह हे
गेरू लिखल माछ सन दूनू आँखि भेल
घामहि भिजल सिनेह हे

पहिलहि राति भेल अगम अथाह सन
तैयो न सपना समाइ हे
अउँठी उतारि पिया धनि पहिराओल
लेलनि अंक लगाइ हे!

नहु-नहु बिहँसैत सुरुज उदित भेला
पुरुब क मुह रतनार हे
कदम क गाछ सूगा उड़ि-उड़ि तेजल
उठु-उठु भेल भिनसार हे!

जीने-मरने की!

जकरा तन सोनित क लैस नहि
तकरा जीने-मरने की!

ओकरे बात सुनै अछि पंचो
जकरा हाथ गड़ाँस
नीक सदा लगलैए सभ कें
निम्मल देह क माँस

जपे करैत भेल पाथर जे
तकर आसनी जरने की!

पिता छला वाचस्पति
बेटा बौक बनल अपने कर्मे
धधरा तापि सकब कतबा दिन
बैसि अहाँ लाह क घर मे

धाङत खेत साँढ़ सब,चेतू
पाछाँ बाध ओगरने की!

पक्का पीटि रहल अछि सभ क्यो
बजा-बजा कें गाल
भाङ पीबि दू धूर क डीहे
पर की रहब नेहाल?

जागू, काज करू किछु, बैसल
हाथ माथ पर धरने की!

दीप जकाँ एक नाम

दिन भरि गाछक छाँह जकाँ
क्यो संग चलय अभिराम
साँझ परैत बरैए मन मे
दीप जकाँ एक नाम ।

बरिसत कहियो वन-पाँतर
चेतन मेघ क जलधार
एक चिरायु तृषा सँ जीवित
ई जलहीन इनार

स्नेह क स्वाति-विंदु ले’ भटकल
चातक चारू धाम।

राति-विराति पाँखि तोरै अछि
मौन क सोनचिरै
भोरे सिङरहार तर अगबे
दूभि-अछत झहरै

फूल क वाण अनिल संधानय
मारय ठाम-कुठाम।

पुरना काँपी मे गीत क सङ
देखि मयूर क पाँखि
शापित यक्ष क कथा सुमिरि
भरि आयल दूनू आँखि

आर कते दिन शीतलहरि चलतै
ई जानथि राम।

सुराज ई लियऽ अहाँ

किछु मरल माछ सन सपना
दऽ कें तरहथ पर
ओ कहलनि हमरा सँऽ
सुराज ई लियऽ अहाँ।

किछु काँट-कूस
किछु अर्थहीन शब्दक पाथर
दऽ कहलनि हमरा सँऽ
सुराज ई लियऽ अहाँ।

ई केहन व्यूह-रचना क
नाम थिक लोकतंत्र
अभिमन्यु फँसैए आर
हसैए दुर्योधन
वासना इन्द्र केर
शिला भेलि गौतमी नारि
असहाय द्रौपदी नित्य
सहै छथि चीरहरण
भोजन क बेर पुर्जी पर
लिखि कें किछु आखर
ओ कहलनि हमरा सँ
सुराज ई लियऽ अहाँ ।

हम सूर्य उगाबय चलल रही
एहि धरती पर
सुरसा क कृपा सँ भेलहुँ
अन्हरिया केँ गुलाम
दऽ प्राण अहाँ भऽ गेलहुँ
अजायबघर क वस्तु
संभव अछि शोभित करी
कोनो सेठ क गोदाम
ओझरा कें ऊनक सभ गोला
सोझरैल हमर
ओ कहलनि हमरा सँ
सुराज ई लियऽ अहाँ।

गामक लोक

बैरङ चिट्ठी जकाँ फिरैए
गामक लोक ।
कस्तूरी मृग जकाँ मरैए
गामक लोक ।

महानगर अपराध करय
बुधियार बनल
आ जरिमाना तकर
भरैए गामक लोक ।

दऽ सर्वस्व जियाबैए
न्यायालय कें
कोना न कहबै
भने लड़ैए गामक लोक ।

सभ इजोत भऽ गेल निपत्ता
साँझहि में
माटिक डिबिया जकाँ
बरैए गामक लोक ।

घरक लाज नाङट भऽ
विज्ञापन बनि गेल
टूटल धनुखा तर
नमरैए गामक लोक ।

मंदिर केर देवांश
पुजारी लूटि रहल
धूजा बनि-बनि कें
फहरैए गामक लोक ।

काँटक बन मे

लहुआ लिधुर भेल फूलक सपना
काँटक बन मे ।

टोलक टोल बबूर फुलायल
छटपट करइछ आमक पखिना
काँटक बन मे ।

छूटि धनुष गेल व्याधक कर सँ
देखि पियाक पियासल हिरना
काँटक बन मे ।

हमरे सँ ई दिन, ई रितु अछि
कटिते फसिल भेलौं हम अदना
काँटक बन मे ।

हरदिक रंग नहाओल विधु कें
ताम्रपत्र लिखि गेल अछि मदना
काँटक बन मे ।

कजरौटा सन एहि नगरक लेल
सूर्यक जन्म एक दुर्घटना
काँटक बन मे ।

गुमसुम तकै छी

राति-दिन थर-थर कँपइए पानि
हम गुमसुम तकै छी ।
आइना केर वैह पुरना बानि
हम गुमसुम तकै छी ।

भीत पर उखरल अहाँ केर नाम
कहियो इजोरिया छल
आइ सभ आखर रहल अछि कानि
हम गुमसुम तकै छी ।

हम प्रतीक्षा मे छलहुँ
क्यो रंग घोरत कासवन मे
इन्द्रधनु टूटत कत’ के जानि
हम गुमसुम तकै छी ।

दीप तर पसरल अन्हारक साँप
पलथी मारने अछि
आँखि मे फेर डबडबायल ग्लानि
हम गुमसुम तकै छी ।

यात्रा तँ यात्रा थिक
ल’ग की थिक, दूर की थिक
किंतु सूतब एना तौनी तानि
हम गुमसुम तकै छी ।

चन्द्रमा

चौरा पर साँझ दीप बारि कें
पूजा सँ प्यार बनल चन्द्रमा
राति जेकर ठाँढि धेने ठाढि अछि
गाछ सिंगरहार बनल चन्द्रमा ।

काँच बाँस बान्हल आकाशदीप
बिहुँसल अछि फेर कोनो बात पर
मोती सन आखर सँ प्रेमपत्र
लिखि गेल अछि के पुरइन-पात पर

नीनक मातल चानन गाछ तर
एक समाचार बनल चन्द्रमा ।

अयना मे सतरंगी प्रेमगीत
झलकै अछि माछ जेना जाल मे
कालिन्दी मे नहाइत राधिका-
कृष्णक अभिसार बनल चन्द्रमा ।

कहलो ने मानै मन- मृग जखन
बंसी-स्वर पसरै अछि साँझ-भोर
एखनो धरि मोन परैए अहाँक
गहना छारल देहक पोर-पोर

दूभि-धान पान-फूल सँ भरल
सोना कें थार बनल चन्द्रमा।

विपटा क स्राप

सपटा सँ भेटल वरदान
विपटा केर स्राप भ’ गेलै
की करतै यज्ञक संकल्प
उनटा जँ जाप भ’ गेलै ।

पाबनि-पाबनि बाँटल लोक
बन्हकी लागल मुरेठ भेल
आखर- आखर कीलित देश
कठरा छूटल सिलेठ भेल

सदिखन जागल आँखिक लेल
सपना संताप भ’ गेलै ।

तोरि गेलै खेतक सभ आरि
गाम- गाम आबिकें दहार
कत’ गेलै ‘बहिंगा सन मोछ’
कत’ गेलै ‘बज्जर केवार’

बौनवीर सभ लगैछ आइ
राजनीति नाप भ’ गेलै ।

टोल-टोल अछि मसान घाट
जरइछ बारहमासा गीत
नगरक फुटपाथ पर बिकाइ
आँचर केर खूँट बन्हल प्रीत

हुनका ले’ सभटा आदर्श
रमनामी छाप भ’ गेलै ।

रौदी अछि, दाही अछि

रौदी अछि, दाही अछि
हमरा ले’ धैन सन।
गामक तबाही अछि
हमरा ले’ धैन सन।

हम महान छी,चटइत
तरबा इतिहास अछि
विपदे सँ गढल हमर
व्यक्तिगत विकास अछि
पुस्त-पुस्त सँ सूर्यक
रथ जोतल लोक पर
पडइत अछाँही अछि
हमरा ले’ धैन सन।

हम देशक कर्णधार
हमरहि सँ देश अछि
भासन मे हम, रन मे
राजा सलहेस अछि
सरनागत-पालक हम
तैं चारू सीमा पर
ई आवाजाही अछि
हमरा लॆ’ धैन सन।

अहाँ धरापुत्र, धरा पर
अहींक घाम खसय
शीततापहीन हमर
पलिवारक राज रहय
न्याय वैह जे हमरा प्रिय,
हमरे हित मे हो
सत्यक गवाही अछि
हमरा ले’ धैन सन।

Share