बृजनाथ श्रीवास्तव

बृजनाथ श्रीवास्तव की रचनाएँ

योगक्षेम

सुनो साधुजन
सूखी नदियाँ फिर लहरायें
कुछ जतन करें

बडा दु:ख है
हम सबको भी
पशुओं और परिन्दों को भी
मंदिर दुखी
मँजीरे दुख में
दुखी पेड़ दुख संतों को भी

सुनो साधुजन
हिम पिघले, जल घन बरसाये
कुछ जतन करें

नेह भरे पुल
को हम सिरजें
इधर-उधर सब आयें जायें
बंजर रिश्तों
की यह खेती
नदी जोग से फिर लहराये

सुनो साधुजन
योगक्षेम के दिन हरियायें
कुछ जतन करें

हरियर मुखरित
पुलिन-पुलिन हों
वन प्रांतर में नदी गीत हों
ऐसा योग
रचें हम साधो
सभी शत्रु जन सगे मीत हों

सुनो साधु जन
तीरथ होती नदी नहायें
कुछ जतन करें

वैदिक ऋचाएँ

भूर्ज पत्रों पर लिखीं
वैदिक ऋचाएँ
पढ़ रहीं फिर से हवाएँ

देववन की
गंध उजली
फिर यहाँ आने लगी है
हाथ में
अमृतकलश ले
भोर छलकाने लगी है

यज्ञ मंत्रों में बँधी
वैदिक ऋचाएँ
फिर लगीं गाने दिशाएँ

लोग उकताये
नगर के
ढूढ़ते संदल पवन फिर
हो रहे फिर
शांति वन में
हैं नदी तट पर हवन फिर

लोग फिर पढ़ने लगे
वैदिक ऋचाएँ
और वे पिछली कथाएँ

भौतिकी दिन
लोभ के अब
आपसी सम्बंध तोड़ें
सार्वभौमिक
बात को भी
तर्क से अपने मरोड़ें

और फिर फिर पावनी
वैदिक ऋचाएँ
रात-दिन घर में सुनाएँ

तनिक धीरज

कि लौटेंगे
सुनहरे दिन
तनिक धीरज धरो तो तुम

अभी अभिसार
के दिन हैं
धरा-घन के तनिक सोचो
जुटे निर्माण
में दोनों
अभी इनको नहीं टोको

तुम्हारा मन
बडा उन्मन
तनिक धीरज धरो तो तुम

पहुँचने दो
अमृत बूँदें
धरा की कोख में कुछ अब
बुये जो बीज
हैं हमने
लगेंगे कुनमुनाने अब

यही ईश्वर
सुदर्शन है
तनिक धीरज धरो तो तुम

सकल ब्रह्माण्ड
में माया
उसी की सब जगह पसरी
ठहर करके
जरा देखो
उसी की सृष्टि है सगरी

हँसेंगे कल
अचर, चर सब
तनिक धीरज धरो तो तुम

अच्छे दिन फिर आयें

सभी सुखी हों
और सभी मुसकायें
अच्छे दिन फिर आयें

एक दूसरे से
खुलकर हम
सुख-दुख की सब कर लें बातें
भरी दुपहरी
घने अँधेरे
साथ रहें हम हँसते गाते

गाँठ-गाँठ के
खोल बंध सुलझायें
अच्छे दिन फ़िर आयें

पेंड़ बनें हम
छाया बाँटें
लायें बादल मलय हवाएँ
बोनसाई को
काटें फेंके
बडे पेंड़ कुछ पुन: लगाएँ

ग्राम देवता
सच्चे न्याय सुनायें
अच्छे दिन फिर आयें

पुन: धेनुकुल
अमिय दुग्ध के
मीठे-मीठे भंडार भरें
सोना उपजे
खेत-खेत से
फिर अन्नों से आगार भरें

भोर सुनहरी
दरवाजे इठलाये
अच्छे दिन फिर आयें

सही वक्त है

सुनो सयानो
चलो पवन को हम दुलरायें
सही वक्त है

इसी पवन के
आखर-आखर
श्वास और प्रश्वास हमारे
और इसी के रहते सबने
देखे हैं दिन के उजियारे

सुनो सयानो
मैली है यह , इसे बचायें
सही वक्त है

इसके होने
का मतलब है
बंजर भू का प्रसवा होना
इसके होने का मतलब है
दिशा-दिशा हरियाली बोना

सुनो सयानो
मंतर पढ़-पढ़ इसे जगायें
सही वक्त है

पवन देवता
की यशगाथा
मेरे पुरखों ने थी गाई
इसीलिए आह्लाद मनुजता
की फूली थी वह फुलवाई

सुनो सयानो
पूजा करके पेड़ लगायें
सही वक्त है

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