बेढब बनारसी की रचनाएँ

अछूत (पैरोडी)

गाटर ज्यों खंभ पर, तांगा जिमि रंभ पर, अनल का अम्भ पर, होता जिमि राज है
काँटा जिमि राह पर,चन्दा तनखाह पर, केसर कस्तूरी के ऊपर जिमि प्याज है
काई जिमि कुंड पर, छूरी जिमि मुंड पर, मिर्चा जिमि ‘उंड’- पर, सर पर ज्यों खाज है
‘टीचर’ ज्यों डंस पर, हंटर ज्यों हंस पर, त्यों अछूत बंस पर आज द्विजराज है

नोट: उंड = घाव
(भूषन के ‘इंद्र जिमि जम्भ पर’ की तरह)

अवकाश की कमी

संध्या को मैं रह न सकूँगी .
एक मित्र ने बुलवाया है
कुछ विरोध में कह न सकूँगी .

विद्यापति का फ़िल्म आया है,
हम दोनों को वह भाया है .
दुःख होगा यदि साथ न जाऊँ,
जिस दुःख को मैं सह न सकूँगी .

मैं तो हूँगी शीघ्र रवाना,
आज बना लेना तुम खाना .
आज रसोई की धारा में,
प्रियतम, मैं तो बह न सकूँगी .

शरबत भला बनाऊँ कैसे,
मोल मँगा लो देकर पैसे
अभी-अभी क्यूटेक्स लगाया है
मैं दधिको मह न सकूँगी

आत्म परिचय (पैरोडी)

डिगरियों का मैं लिए अम्बार फिरता हूँ,
‘रिकमेन्डेशन’ – का भार लिए फिरता हूँ,
हर जगह, जगह है नहीं, सदा आती है,
फिर भी ‘सरविस’ का प्यार लिए फिरता हूँ,

बीबी बच्चों का भार लिए फिरता हूँ
बेकारी का संसार लिए फिरता हूँ
हर रोज ‘वांटेड’ नया देखने को मैं,
कुछ नए नए अखबार लिए फिरता हूँ.

कविताओं के मैं भंडार लिए फिरता हूँ
नायिकाभेद श्रृंगार लिए फिरता हूँ
पीकर एक प्याला हाला, मधुशाला से
टूटी वीणा का तार लिए फिरता हूँ

कवि-सम्मलेन का तार लिए फिरता हूँ
तुकबंदी की भरमार लिए फिरता हूँ
क्यों आप सभापति नहीं बनाते मुझको,
मैं कविता का कतवार लिए फिरता हूँ

उनके पीछे मैं कार लिए फिरता हूँ
अरमानों के उपहार लिए फिरता हूँ,
बोलेन न सही किक ही करदें वह मुझको
बस यह इच्छा सरकार लिए फिरता हूँ

मैं दिल में उनका प्यार लिए फिरता हूँ
फिर भी दिल में एक ‘खार’ लिए फिरता हूँ
लेली है मैंने खींच के उनकी फोटो
मैं पाकेट में दिलदार लिए फिरता हूँ

मैं उजड़ा एक संसार लिए फिरता हूँ
स्मृतियों का भंडार लिए फिरता हूँ
कितना खोजा तुम नजर नहीं आते हो
फिर भी मैं आँखें चार लिए फिरता हूँ

(बच्चन जी के ‘आत्म परिचय’ की पैरोडी)

कविके भावों की रानी (पैरोडी)

मैं कवि के भावों की रानी
मेरे पायल की छूम छनन
का देती कवि का मन उन्मन
जब आती मैं सम्मुख बनठन
कवि के मुख को मिलती बाणी
मैं कवि के भावों की रानी
रससे भर देती हूँ आनन
जैसे कानों में खूँट सघन
जब ले हाथों में दलबेसन
आती चौके से दीवानी
मैं कवि के भावों की रानी
जब मैं उनके सम्मुख आकर
हूँ डांट बताती गर्जन कर
वह लिख लेते कुछ क़ागज पर
जगती ने वह कविता मानी
मैं कवि के भावों की रानी
कवि के दिल की मैं हूँ सरजन
शासन करती जैसे करजन
बच्चे मेरे आधे दरजन
जिनकी करते वह निगरानी
मैं कवि के भावों की रानी
पूरा होता न बजट मेरा
तब सहलाते वह लट मेरा
कहना करते झटपट मेरा
देते न मगर कौड़ी कानी
मैं कवि के भावों की रानी
वह बैठे बैठे रजनी भर
भन भन करते जैसे मच्छर
सुन सुन कर कानों में जो स्वर
निद्रा की मर जाती नानी
मैं कवि के भावों की रानी
मैं देख उन्हें होती विस्मित
जब उठते वह प्रातः अलसित
मुख पर ऐसी रंगत चित्रित
जैसे हुक्के का हो पानी
मैं कवि के भावों की रानी
मैं गान्धीजी की आशा हूँ
काकाजी की अभिलाषा हूँ
मैं हिन्दुस्तानी भाषा हूँ
अभिनव कवि जिसके अभिमानी
मैं कवि के भावों की रानी
कवि को लगती हूँ बहुत भली
जैसे बच्चों को मूंगफली
बंगाली को जैसे मछली
जैसे बरघे को हो सानी
मैं कवि के भावों की रानी
आँखोंकी रायफल दो नाली
उनके सम्मुख करके आली
करवा देती पाकेट खाली
जैसे सीमा पर अफगानी
मैं कवि के भावों की रानी
पश्चिम में छाई है लाली
पशु बन से फिर आये आली
उठ कवि करदे कमरा खाली
की बहुत अभीतक मनमानी
मैं कवि के भावों की रानी
(कविवर गुलाब खंडेलवाल की कविता –‘मैं कवि के भावों की रानी’ की पैरोडी)

 

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