बोधिसत्व

बोधिसत्व की रचनाएँ

कुछ भी मारो, बस, आँख मत मारो

(मर्यादावादियों के लिए एक नया राष्ट्रगान)

गोरक्षक बन कर मारो
गोमाँस के नाम पर मारो
काश्मीर में सरकार बन कर मारो
बेरोज़गारी से मारो
बेरोज़गार की मारो
मन्दिर के नाम पर मारो
बस, आँख मत मारो।

नोट बन्द कर मारो
लाइन में लगा कर मारो
कर्ज़ से किसान मारो
बोल वचन से मारो
हँस कर और हँसा कर मारो
उल्टे सीधे फँसा कर मारो
बस, आँख मत मारो।

घेर कर मारो घूर कर मारो
कपड़ा फाड़ कर मारो
घर जलाकर मारो
बच्चा चोर कह कर मारो
बाढ़ में डुबोकर मारो
दिन-दहाड़े मारो
बस, आँख मत मारो।

मुसलमान कह कर मारो
दलित कह कर मारो
हिन्दू जैन बौद्ध कह कर मारो
छिनाल डायन कह कर मारो
भड़वा कह कर मारो
आधी रात में मारो
बस, आँख मत मारो

गद्दार कह कर मारो
स्वामी कह कर मारो
वामी कह कर मारो
जय श्रीराम कह कर मारो
बलात्कार करके मारो
तीन तलाक़ देकर मारो
बस, आँख मत मारो।

चक्रव्यूह में मारो
चीरहरण कर मारो
अहिल्या को पत्थर बना कर मारो
अँगूठा काटकर मारो
नाम गोत्र जाति पूछ कर मारो
सीवर में उतार कर
बस, आँख मत मारो।

ऊना में मारो पूना में मारो
जैसे जहाँ मन वैसे मारो
ऊपर नीचे आगे पीछे से मारो
दाएँ बाएँ चौतरफ़ा मारो
पाताल में धँसा कर मारो
अँग्रेज़ी हिन्दी तमिल में मारो
बस, आँख मत मारो।

गाँधी को छाती पर मारो
कलबुर्गी को माथे पर मारो
गौरी लंकेश को आँतों में मारो
राम को अयोध्या में मारो
महामहिम को पुरी में मारो
अग्निवेश को सड़क पर मारो
बस, आँख मत मारो।

संसद में जूता मारो
विधानसभा में लात मारो
बेटी को गर्भ में मारो
बहू को जलाकर मारो
बच्ची को मन्दिर में मारो
सत्य को झुठलाकर मारो
सब कुछ मारो
बस, आँख मत मारो।

गोली मारो बम मारो
पैलटगन मारो पत्थर मारो
पुल से दबाकर मारो
नंगों को दस लाख का वस्त्र दिखा कर मारो
कंगालों को पन्द्रह लाख की झलक देकर मारो
आतंकवादी बताकर मारो
बस, आँख मत मारो।

वन्देमातरम गाकर मारो
जन गण मन चिल्लाकर मारो
मर्यादा से मारो वादा से मारो
लक्ष्मण रेखा में घेरकर मारो
अग्नि परीक्षा लेकर मारो
रामराज्य है जल्दी मारो
बस, आँख मत मारो।

अच्छे दिन देखना है, साहेब ! बताओ किधर देखूँ?

मुझे पत्थर नहीं चलाना
पैलटगन की गोली से
मुझे आँख नहीं फोड़वाना
अच्छे दिन देखना है, साहेब ! बताओ किधर देखूँ?

मुझे नारा नहीं लगाना
मुझे चाय की चाशनी में
डूबे भाषण नहीं चबाना
अच्छे दिन का स्वागत करना है, द्वार कब खोलूँ?

मुझे मन्दिर नहीं जाना
मुझे मस्जिद नहीं जाना
बस पन्द्रह लाख है पाना
सरकार, तुम्ही बताओ, कितने आधार लिंक करूँ?

राफ़ेल का हिसाब नहीं पाना
तेल गैस भी सस्ता नहीं पाना
बच्चों को है इनसान बनाना
बताओ मालिक, उनको किस पाठशाला में रखूँ ?

पाकिस्तान की तुम जानो
गंगा मैया की तुम जानो
अपने गाय बैल लेकर
बताओ प्रभुजी, किस सड़क से ज़िन्दा घर पहुँचू?

अब

बहुत घिरे हैं बादल
कोना अन्तरा महागगन का ढँका हुआ है
उमड़े हैं नील-धवल दल
धरती का मुख आशा सुख से टँका हुआ है।

बहुत पानी बरसेगा
बहुत हरियाली छाएगी,
इस घनघोर वृष्टि में
पिछली बरखा धुल जाएगी।

सब नया और
सब सरस सुगढ़ सजल होगा
अषाढ़ हो या माघ
अन्त: कुछ शस्य सरल होगा।

गोडसे हिन्दू नहीं सनातन हत्यारा है

गोडसे
पहला राष्ट्रीय भक्त था

वह पहला
अन्तरराष्ट्रीय हत्यारा था

वह पहला
ग्लोबल नागरिक था
जिसने एक ग्लोबल हिन्दू की हत्या की।

किसी महान
हिन्दू को मारने वाला
पहला विश्व वधिक है गोडसे।

गोडसे हिन्दू नहीं सनातन हत्यारा है

कच्चे चाँद को देखा है

तुमने कच्चे चाँद को देखा है
किसी एकदम कोमल कच्चे चाँद को
गोबर और चिकनी मिट्टी से बने चाँद को
भूंसी और पुआल से बने चाँद को
कुम्हार के चाक पर चढ़े चक्कर काटते चाँद को।

ऐसे चाँद को जिसकी छाती पर
खड़ाऊँ पहन कर टहल गया है कोई
अभी-अभी

कोई कैसे चल सकता है कच्चे चाँद की छाती पर
कच्ची छाती पर कौन टहल सकता है
वह भी खड़ाऊँ पहन कर

गीली और नम ज़मीन पर चलना भी
कठिन होता है
और इस तरह कुछ कुचलते विदीर्ण करते हुए चलना कितना
कठिन है।

कभी सोचा है विदर्ण करना जितना कठिन है तुम्हारे लिए
उतना ही सरल भी है
कुछ भी तोड़ देना, काट देना फोड़ देना, गिरा देना, ढहा देना
मिटा देना, नष्ट कर देना
सबसे सरल है चोट करना

सहेजना-सम्हालना कितना कठिन,
कठिन है कच्चे चाँद की छाती पर खड़ाऊँ पहन कर टहलना।

बाहर निकलता हूँ
आने और जाने के, भगदड़ और दौड़ने के निशान दिखते हैं
कौन गया कुचलता हुआ
कच्चे चाँद को
गोबर और भूँसी से बने चाँद को
उस पर तो उँगलियों के निशान थे
किसी के।

तुम तो नहीं थे
वे पैर तुम्हारे तो नहीं थे
वो खड़ाऊँ तुम तो नहीं पहने ते
देखो मिट्टी में लिपटे हैं तुम्हारे पैर या कुछ और
देखो
अभी न दिख रहा हो तो उजाला होने तक रुको
अगले चाँद के उजाले तक रुकना पड़े तब तक रुको

अगली दौड़ के पहले देखो
जो बिना अपना पैर देखे दौड़ते हैं
वे कहाँ दूर तक जा पाते हैं
जो बिना अपना खड़ाऊँ देखे दौड़ते हैं
वे कहाँ-कहीं भी पहुँच पाते हैं

देखो आकाश में चाँद की सिसकी व्याप रही है
सुनों धरा को एक-एक कर चौतरफ़ा रुलाई ढाँप रही है।
तुम्हें जितना दौड़ना हो दौड़ो लेकिन देख लो
तुम किसी चाँद पर तो नहीं दौड़ रहे
कच्चे चाँद पर
गोबर और भूँसी से बने चाँद पर
पुआल और सूखे पत्तों से बने चाँद पर।
चिकनी मिट्टी से बने चाँद पर।

Share