ब्रज श्रीवास्तव की रचनाएँ

आज की सुबह

ताज़ा हवा से बातचीत हो सकी आज
रात की रही रंगत देखी सुबह की सड़कों पर
नदी की उनींदी और
पेड़ों की उमंग देखी आज सुबह
कल की दुनिया चलकर आई आज
वहाँ उत्सव मनाए गए थे
योजनाएँ बनी थीं और थोड़ा-बहुत
अशुभ भी घटा कुछ शहरों में
यह सुबह रद्द करती पुरानी प्रविष्टियाँ
पेश करतीं नया पृष्ठ
और उसके बाद सम्भावनाओं की
अनेक सुबहों के कोरे पन्ने
नई शुरूआत के लिए फैलाए बाँहें
आई है मुस्कुराती हुई
फिर आज की सुबह

न जाने कौन सी भाषा से

यह कथित विशाल अस्तित्व
हुआ धराशायी
किसी की चाहत की आंधी में
हर समय हवा की तरह उड़ता मन
दिन-रात ताल में चलते क़दम
हर कोशिश में हमराह होती आँखें
सब हार मन गए हैं
सामने आता हर दृश्य स्तब्ध हुआ
साँस से साँस की बातचीत तक सुनाई देने लग गई
एक ही एक बिम्ब दिखाई दे रहा है सब तरफ़
ओस की बूंदों से सजा
बुदबुदाना भी भूल गए हैं होंठ
न जाने कौन सी भाषा से
पहचाना जा रहा होगा मुझे इन दिनों।

ख़बर के बग़ैर

सुबह से ही हम प्यासे हो जाते हैं
ख़बरों की चाय पीने के लिए
रात तक हमारे कान लगे होते हैं
सुनने के लिए कोई चटपटी ख़बर

हम अपने बच्चों को नई-पुरानी
ख़बर ही पढ़ा रहे होते हैं
जानकार,कलाकार और व्यापारी
अपनी तरक्की की राह में इन्हें ही
करते हैं पार

ख़बर के बग़ैर नहीं कर सकते ख़रीदारी हम
चिकित्सक के द्वार तक नहीं पहुँच सकते
गुरु और धार्मिक-स्थल तक का नहीं कर सकते चयन

सब जगहों पर ख़बरों की मार है
हर चीज़ बन जाना चाहती है ख़बर
मालिक का प्रभाव और
मज़दूरों की मेहनत ख़बर बन जाने को बेचैन है
और हर कोई इस तरह से चल रहा है
जैसे वह कोई ख़बर हो

बाज़ार ने वश में कर ली हैं ख़बरें
सब होते जा रहे हैं ख़ुद से बेख़बर।

क्रूरता

भावना की सहजता पर
मारती है ठहाका

अपना शिकार मानती है मन ही मन
खिलने देती है उसे भरपूर
और जब वह करती है
कुछ मासूम-सी अपेक्षाएँ
गला मसक देती है धोखे से
गहरा सन्तोष महसूस करती है
मनाती है एक और जश्न

जाँच करती है लाश की भी
मारकर धीरे-धीरे लाठी
मुत्तमईन होती है कि हाँ
अब पूरी तरह मर चुकी है भावना

सो जाती है तब क्रूरता
चैन की नीद से

तब्दीली

पर्दे के गिरने
और फिर उठने के बाद भी
नहीं दिखाई दिया
जाना-पहचाना सा कुछ भी

जो सुनना चाहता हूँ
नहीं कहा जाता अब
जो देखना चाहता हूँ
नहीं दिखाई देता

तब्दीली गुज़र रही है इधर से
अवसान और प्रस्थान के बीच
निर्मित हो रही है एक रेखा।

 

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