भगवतीप्रसाद द्विवेदी

भगवतीप्रसाद द्विवेदी की रचनाएँ

निंदिया आ री

निंदिया, तू है कितनी प्यारी,
बिटिया की अंखियों में आ री!
आ जा फुदक-फुदक चिड़िया-सी
रुनझुन-गुनगुन गाती,
आंगन में उतरी चंदनिया
ठुमक-ठुमक लहराती।
आ जा सजा सपन फुलवारी,
महके मह-मह क्यारी-क्यारी।
नींद समंदर में सोए हैं
सूरज दादा थककर,
चंदा में बैठी बुढ़िया भी
लेटी नींद झपककर।
नयनों में छा गई खुमारी,
सोई तितली प्यारी-प्यारी।
उड़नखटोले में बैठाकर
परियों को भी लाना,
बिटिया को भी परीलोक की
मीठी सैर कराना।
पलने में हम रहे झुला री,
निंदिया खील-बताशे खा री!

सो जा ओ बिटिया रानी

थपकी देकर सुला रही तेरी नानी,
सो जा, सो जा, सो जा ओ बिटिया रानी!
तू तो राजकमारी, राजदुलारी है
तेरे बिन फीकी हर महल-अटारी है,
तेरी नादानी, शैतानी के आगे,
सौ-सौ समझदारियां हरदम हारी हैं।
तेरी मस्ती से है दुनिया मस्तानी,
सो जा, सो जा, सो जा, ओ बिटिया रानी!
आएंगे सपने में तारे टिम-टिम-टिम
पुआ पकाएंगे चंदा मामा गिन-गिन-गिन,
दूध-भात की थाली लेकर आएंगे
इंद्रधनुष की छटा दिखे रिमझिम-रिमझिम।
दिखलाएगी कथा चहक निंदिया रानी,
सो जा, सो जा, सो जा, ओ बिटिया रानी!
थकी सांस जैसी तू भी है थकी-थकी
सभी पेड़-पौधे सोए लेकर झपकी,
सुबह तरोताजा हो जा तू, इसीलिए
सुला रही तेरी नानी देकर थपकी।
पलक मूंद ले, गाती है लोरी नानी,
सो जा, सो जा, सो जा, ओ बिटिया रानी!

नई सुबह के तारे हम

हम बागों की हरियाली हैं-
चिड़ियों के चहकारे हम!
हम नदियों की कल-कल, छल-छल
नई सुबह के तारे हम!

हममें है फूलों की खुशबू
झरनों का मधुमय संगीत,
हममें रंग भरे तितली के
हम प्रकृति के हैं नवगीत।
हम श्रोता हैं परी कथा के
दुनिया के उजियारे हम!

हम जीवन के मीठे सपने
हँसी-खुशी के बाइस्कोप,
हम जब खुलकर मुस्कातेहैं
दुख हो जाता पल में लोप।
चहकें-महकें मगर न बहकें
सबसे न्यारे, प्यारे हम!
हम बागों की हरियाली हैं,
चिड़ियों के चहकारे हम!

धुआँ-धुआँ

दिखे मौत का कुआँ-कुआँ,
सभी ओर बस धुआँ-धुआँ!

सुबह-सुबह ही धुआँ उगलतीं
दैत्याकार चिमनियाँ,
जगते ही दिखती है काली
धुआँ भरी यह दुनिया।
शोर, चिल्ल-पों, हुआँ-हुआँ!

निकले सड़कों पर तो सारे
वाहन धुआँ उगलते,
जी मिचलता, दम घुटता है
नेत्र हमारे जलते।
किन रोगों ने हमें छुआ?

कार्बन की कालिख-सी परतें
चेहरे पर छा जातीं,
धूल, धुआँ, ज़हरीली गैसें
अपना असर दिखातीं।
महानगर बीमार हुआ।

सारे वाहन कार, बसें, ट्रक
टैंपो औ’ स्कूटर,
उठता धुआँ कारखानों से
दमघोंटू बिजलीघर।
चेतो भाई-बहन-बुआ!
कैन्सर है यह मुआ धुआँ!

घोंघों रानी

घोंघों रानी, कितना पानी?
दादी अम्माँ, कहो कहानी!

काले-भूरे, बौने-बौने
बादल के प्यारे मृगछौने
नभ के माथे पर दिखते हैं
हो जैसे अनगिनत डिठौने।

किसकी है यह कारस्तानी,
घोंघों रानी, कितना पानी?

ओका-बोका तीन तड़ोका
पहलवान ने ताल है ठोंका,
तैर रहे हैं नभ पर मेघा
लेकर संग हवा का झोंका।

टार्च जलाती बिजली रानी,
घोंघों रानी, कितना पानी?

बादल है क्या जल की गागर?
या गागर में सिमटा सागर?
इस सागर में कितनी सीपी?
हर सीपी क्या मोती का घर?

क्यों धरती की चूनर धानी?
घोंघों रानी, कितना पानी?

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