भगवान स्वरूप कटियार की रचनाएँ

हम फ़ौलाद के गीत गाएँगे

विनायक सेन के प्रति

हम फ़ौलाद के गीत गाएँगे
दुनिया फ़ौलाद की बनी है
और हम फ़ौलाद की संतानें हैं ।

जैसे लोग निहाई पर
पत्तर ढालते हैं
वैसे ही हम
हम नए दिन ढालेंगे
उनमें उल्लास हीरे की तरह जड़ा होगा ।

पसीने से नहाए
हम पाताल में उतरेंगे
और धरती के गर्भ से
हम नया वैभव जीत लाएँगे ।

हम पर्वत के शिखर पर चढ़ कर
सूरज के टुकड़े बन जाएँगे
ऊषा की लाली से
हम अपनी माँसपेशियों में
लाल रंग भरेंगे ।

इंसानियत से सराबोर
हम शानदार ज़िन्दगी ढालेंगे
जहाँ भेदभाव के लिए नहीं होगी
कोई जगह ।

हम अनेक हैं पर एक में
संगठित होंगे
फ़ौलाद के उस गीत में
हम सब की आवाज़ होगी
हम फ़ौलाद के बने हैं
इसलिए फ़ौलाद के गीत गाएँगे ।

उद्बोधन

जहाँ मेरा इंतज़ार हो रहा है
वहाँ मैं पहुँच नहीं पा रहा हूँ
दोस्तों की फैली हुई बाँहें
और बढ़े हुए हाथ
मेरा इंतज़ार कर रहे हैं ।

मेरी उम्र का पल-पल
रेत की तरह गिर रहा है
रैहान मुझे बुला रहा है
ऋतु, अनुराग, निधि, अरशद
शाश्वत, दिव्या और मेरी प्रिय आशा
और मेरे दोस्तों की इतनी बड़ी दुनिया
मैं किस-किस के नाम लूँ
सब मेरा इंतज़ार कर रहे हैं
पर मैं पहुँच नही पा रहा हूँ
मेरी साँसें जबाब दे रही हैं ।

पर याद रखना दोस्तो
मौत, वक़्त की अदालत का
आख़िरी फ़ैसला नहीं है
ज़िन्दगी, मौत से कभी नहीं हारती ।

मेरे दोस्त तो मेरी ताक़त रहे हैं
मैं हमेशा कहता रहा हूं
कि दोस्ती से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता
और न ही होता है
दोस्ती से बड़ा कोई धर्म
मैं तो यहाँ तक कहता हूँ
की दोस्ती से बड़ी कोई
विचारधारा भी नहीं होती
जैसे चूल्हे में जलती आग से बड़ी
कोई रोशनी नहीं होती ।

मेरी गुजारिश है
कि उलझे हुए सवालों से टकराते हुए
एक बेहतर इंसानी दुनिया बनाने क लिए
मेरी यादों के साथ
संघर्ष का यह कारवाँ चलता रहे
मंज़िल के आख़िरी पड़ाव तक ।

मुक्ति का सौन्दर्य

सेवानिवृत्ति के उपरान्त की अनुभूति

मैं वापस कर आया हूँ
उनका दिया हुआ रौबदार हैट
वज़नदार बूट
और तमाम गुनाहों में सनी
लकदक वर्दी ।

मैं छोड़ आया हूँ
वह मेज़ और कुर्सी भी
जिस पर बैठ कर
बेबसी में अनचाहे
हमें करने पड़े थे
घटिया और घृणित समझौते

आज खुली हवा में
अपने मित्रों के बीच
साँस लेते हुए
मैं महसूस कर सकता हूँ
कि जीवन कितना सुन्दर है ।

पिता के पास लोरियाँ नहीं होतीं 

पिता मोटे तने और गहरी जड़ों वाला
एक वृक्ष होता है
एक विशाल वृक्ष
और माँ होती है
उस वृक्ष की छाया
जिसके नीचे बच्चे
बनाते-बिगाड़ते है
अपने घरौंदे ।

पिता के पास
दो ऊँचे और मज़बूत कंधे भी होते हैं
जिन पर चढ़ कर बच्चे
आसमान छूने के सपने देखते हैं ।

पिता के पास एक चौड़ा और गहरा
सीना भी होता है
जिसमें जज़्ब रखता है
वह अपने सारे दुख
चेहरे पर जाड़े की धूप की तरह फैली
चिर मुस्कान के साथ ।

पिता के दो मज़बूत हांथ
छेनी और हथौड़ी की तरह
दिन-रात तराशते रहते हैं सपने
सिर्फ़ और सिर्फ़ बच्चों के लिए ।

इसके लिए वह अक्सर
अपनी ज़रूरतें
और यहाँ तक की अपने सपने भी
कर देता है मुल्तवी
और कई बार तो स्थगित भी ।

पिता भूत, वर्तमान, और भविष्य
तीनों को एक साथ जीता है
भूत की स्मृतियाँ
वर्तमान का संघर्ष और बच्चों में भविष्य ।

पिता की उँगली पकड़ कर
चलना सीखते बच्चे
एक दिन इतने बड़े हो जाते हैं
कि भूल जाते हैं रिश्तों की संवेदना
और सड़क, पुल और बीहड़ रास्तों में
उँगली पकड़ कर तय किया कठिन सफ़र ।

बाँहें डाल कर
बच्चे जब झूलते हैं
और भरते हैं किलकारियाँ
तब पूरी कायनात सिमट आती है उसकी बाँहों में
इसी सुख पर पिता कुरबान करता है
अपनी पूरी ज़िन्दगी ।

और इसी के लिए पिता
बहाता है पसीना ता ज़िन्दगी
ढोता है बोझा, खपता है फ़ैक्ट्री में
पिसता है दफ़्तर में
और बनता है बुनियाद का पत्थर
जिस पर तामीर होते हैं
बच्चों के सपने

पर फिर भी पिता के पास
बच्चों को बहलाने और सुलाने के लिए
लोरियाँ नहीं होतीं ।

समय की आवाज़

रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ के प्रति

अराजक-सा दिखने वाला वह शख़्स
चलता-फिरता बम है
जिस दिन फटेगा
पूरी दुनिया दहल जाएगी ।

कितना यूरेनियम भरा है उसके भीतर
उसे ख़ुद भी नही पता है ।

उसके पत्थर जैसे कठोर हाथ
छेनी-हथौड़ी की तरह
दिन-रात चलते रहते हैं
बेहतर कल की तामीर के वास्ते ।

उसके चेहरे पर उग आया है
अपने समय का बीहड़ बियावान ।

अनवरत चलते रहने वाले
फटी बिवाइयों वाले उसके पाँव
किसी देवता से अधिक पवित्र हैं

वह बीच चौराहे पर
सरेआम व्यवस्था को ललकारता है
पर व्यवस्था उसका कुछ नहीं
बिगाड़ पाती
तभी तो वह सोचता है
कि वह कितना टेरिबुल हो गया है ।

तभी तो वह
बडे आत्मविश्वास के साथ कहता है
कि मसीहाई में उसका
कोई यक़ीन ही नहीं है
और ना मैं मानता हूँ
कि कोई मुझ से बड़ा है ।

वह ऊर्जा का भरा-पूरा पावर-हाउस है
जिससे ऊर्जावान है
पूरी एक पीढ़ी ।

बच्चों जैसी उसकी मासूम आँखों में
पूरा एक समन्दर इठलाता है
और हृदय में भरी गहरी संवेदनाओं के साथ
जब वह हुँकारता है
तो समय भी ठहर कर सुनता है उसे
क्योंकि वह न सिर्फ़
अपने समय की आवाज़ है
बल्कि भविष्य का आगाज़ भी है ।

Share