भवेश दिलशाद की रचनाएँ

बहुत बरदाश्त कर ली है मियां ये दुनियादारी क्या

बहुत बरदाश्त कर ली है मियां ये दुनियादारी क्या
जुनूं दिल में कफ़न सर पर सफ़र की है तयारी क्या

कोई नमक़ीन ख़्वाहिश क्या कोई मीठी कटारी क्या
समय के कड़वे सच हैं हम किसी की हमसे यारी क्या

यहीं पर लेनदारी देनदारी सब निपट जाये
वो जब तौले तो चकराये कि हल्का क्या है भारी क्या

जियू ये क़श्मक़श कब तक निभाऊं ज़िन्दगी कितनी
रहेगी यूँ ही क़िरदारों की मुझमें जंग जारी क्या

जवानी हुस्न शोख़ी लोच जलवे सब बहुत दिलक़श
मगर है कोई औरत इस जहाँ में माँ से प्यारी क्या

कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है

कहाँ पहुँचेगा वो कहना ज़रा मुश्किल सा लगता है
मगर उसका सफ़र देखो तो खुद मंज़िल सा लगता है

नहीं सुन पाओगे तुम भी ख़मोशी शोर में उसकी
उसे तनहाई में सुनना भरी महफ़िल सा लगता है

बुझा भी है वो बिखरा भी कई टुकड़ों में तनहा भी
वो सूरत से किसी आशिक़ के टूटे दिल सा लगता है

वो सपना सा है साया सा वो मुझमें मोह माया सा
वो इक दिन छूट जाना है अभी हासिल सा लगता है

कभी बाबू कभी अफ़सर कभी थाने कभी कोरट
वो मुफ़लिस रोज़ सरकारी किसी फ़ाइल सा लगता है

वो बस अपनी ही कहता है किसी की कुछ नहीं सुनता
वो बहसों में कभी जाहिल कभी बुज़दिल सा लगता है

ये लगता है उस इक पल में कि मैं और तू नहीं हैं दो
वो पल जिसमें मुझे माज़ी ही मुस्तक़बिल सा लगता है

न पंछी को दिये दाने न पौधों को दिया पानी
वो ज़िन्दा है नहीं बाहिर से ज़िन्दादिल सा लगता है

उसे तुम ग़ौर से देखोगे तो दिलशाद समझोगे
वो कहने को है इक शाइर मगर नॉविल सा लगता है

नींद से सबको जगाता था यहाँ

नींद से सबको जगाता था यहाँ
इक फ़क़ीरा गीत गाता था यहाँ

था तो नाबीना मगर वो अस्ल में
ज़िन्दगी कितनी दिखाता था यहाँ

ताकती हैं खिड़कियाँ उम्मीद से
पहले अक्सर कोई आता था यहाँ

कह रहा है गाँव बूढ़ा दूर जा
जब जवाँ था तो बुलाता था यहाँ

बेहया कमबख़्त पागल बदतमीज़
मैं भी कितने नाम पाता था यहाँ

कभी तो सामने आ बेलिबास होकर भी

कभी तो सामने आ बेलिबास होकर भी
अभी तो दूर बहुत है तू पास होकर भी

तेरे गले लगूँ कब तक यूँ एहतियातन मैं
लिपट जा मुझसे कभी बदहवास होकर भी

तू एक प्यास है दरिया के भेस में जानां
मगर मैं एक समंदर हूँ प्यास होकर भी

तमाम अहले-नज़र सिर्फ़ ढूँढते ही रहे
मुझे दिखायी दिया सूरदास होकर भी

मुझे ही छूके उठायी थी आग ने ये क़सम
कि नाउमीद न होगी उदास होकर भी

जब कभी कोई दिल दरबदर हो गया

जब कभी कोई दिल दरबदर हो गया
हुस्न से इश्क़ तक का सफ़र हो गया

मैं अधूरा जुड़ा तुझ अधूरे में जब
हो गया पूरा तू मैं सिफ़र हो गया

वो जो तहज़ीब थी अब तमाषा है बस
जो नज़रिया था वो बदनज़र हो गया

था क़यामत का दिन जब ये दुनिया बनी
रह गया वो उधर मैं इधर हो गया

बेअदब बदग़ुमां मत समझना मुझे
बेख़याली सी थी बेख़बर हो गया

कोई अब उम्मीद क्या हो जब तमन्ना कुछ नहीं

कोई अब उम्मीद क्या हो जब तमन्ना कुछ नहीं
सूफ़ियों की सुहबतों में हूँ ये दुनिया कुछ नहीं

चाहता हूँ कुछ कहूँ लेकिन मैं कहता कुछ नहीं
इतना कुछ सबने कहा मतलब तो निकला कुछ नहीं

दिल में इतनी आग है जितनी नहीं सूरज में भी
इतना पानी है इन आँखों में कि दरिया कुछ नहीं

फ़र्क़ क्या पड़ता है कि अमृत मिला किसको कहाँ
ज़हर जब पी ही लिया है तो ये मुद्दा कुछ नहीं

हमख़यालो-हमज़ुबां मिलता कोई तो बोलते
आईना ही था मुक़ाबिल फिर तो बोला कुछ नहीं

लीजिए मत मीरो-ग़ालिब की कड़ी में नाम यूँ
आपकी ज़र्रानवाज़ी है मैं वरना कुछ नहीं

अपने होने के तुझे दूँ मैं हवाले कितने

अपने होने के तुझे दूँ मैं हवाले कितने
जबकि हरियाली है दरिया हैं उजाले कितने

दोस्त हमदर्द मरासिम तू बना ले कितने
आख़िरश बात यही होगी संभाले कितने

ख़ालिसुन्नस्ल बना पाये नहीं एक इंसां
सर गिराते ही रहे मज़हबों वाले कितने

कोई सुकरात कोई मीरा कोई षिव हममें
पी गये ज़हर से लबरेज़ पियाले कितने

आप अपने में मैं लौटा हूँ बड़ी मुद्दत बाद
धूल देखूं जमी कितनी पड़े जाले कितने

सर में बाक़ी कहीं कुछ सनक दिखती है

सर में बाक़ी कहीं कुछ सनक दिखती है
अब भी ख़्वाबों में तेरी झलक दिखती है

जब पसीने में तर मैं तुझे देख लूँ
धूप में चाँदनी की चमक दिखती है

आस्मां जब हँसे दिखता है आधा चाँद
जब ज़मीं हँसती है इक धनक दिखती है

मैं लगातार गर देखता हूँ तुझे
तू मुझे देखती एकटक दिखती है

ओझल आँखों से हो कर भी तू ज़िंदगी
देर तक दिखती है दूर तक दिखती है

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