भारत भूषण अग्रवाल की रचनाएँ

अहिंसा

खाना खा कर कमरे में बिस्तर पर लेटा

सोच रहा था मैं मन ही मन: ‘हिटलर बेटा’

बड़ा मूर्ख है, जो लड़ता है तुच्छ-क्षुद्र मिट्टी के कारण

क्षणभंगुर ही तो है रे! यह सब वैभव-धन।

अन्त लगेगा हाथ न कुछ, दो दिन का मेला।

लिखूँ एक ख़त, हो जा गाँधी जी का चेला।

वे तुझ को बतलायेंगे आत्मा की सत्ता

होगी प्रकट अहिंसा की तब पूर्ण महत्ता।

कुछ भी तो है नहीं धरा दुनिया के अन्दर।’

छत पर से पत्नी चिल्लायी : “दौड़ो , बन्दर!”

फूटा प्रभात

फूटा प्रभात, फूटा विहान

बह चले रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्झर के स्वर

झर-झर, झर-झर।

प्राची का अरुणाभ क्षितिज,

मानो अम्बर की सरसी में

फूला कोई रक्तिम गुलाब, रक्तिम सरसिज।

धीरे-धीरे,

लो, फैल चली आलोक रेख

घुल गया तिमिर, बह गई निशा;

चहुँ ओर देख,

धुल रही विभा, विमलाभ कांति।

अब दिशा-दिशा

सस्मित,

विस्मित,

खुल गए द्वार, हँस रही उषा।

खुल गए द्वार, दृग खुले कंठ

खुल गए मुकुल

शतदल के शीतल कोषों से निकला मधुकर गुंजार लिए

खुल गए बंध, छवि के बंधन।

जागो जगती के सुप्त बाल!

पलकों की पंखुरियाँ खोलो, खोलो मधुकर के अलस बंध

दृग भर

समेट तो लो यह श्री, यह कांति

बही आती दिगंत से यह छवि की सरिता अमंद

झर-झर।

फूटा प्रभात, फूटा विहान,

छूटे दिनकर के शर ज्यों छवि के व‌ह्नि-बाण

(केशर फूलों के प्रखर बाण}

आलोकित जिनसे धरा

प्रस्फुटित पुष्पों से प्रज्वलित दीप,

लौ-भरे सीप।

फूटीं किरणें ज्यों वह्नि-बाण, ज्यों ज्योति-शल्य

तरु-वन में जिनसे लगी आग।

लहरों के गीले गाल, चमकते ज्यों प्रवाल,

अनुराग लाल।

भारतत्व

गाँवों में समाजवाद, शहरों में पूँजीवाद, दफ़्तर में सामन्तवाद
घर में अधिनायकत्व है
कभी-कभी लगता है
यही भारतत्व है ।

मिलन

छलक कर आई न पलकों पर विगत पहचान
मुस्करा पाया न होठों पर प्रणय का गान;
ज्यों जुड़ी आँखें, मुड़ी तुम, चल पड़ा मैं मूक
इस मिलन से और भी पीड़ित हुए ये प्राण।

चलते-चलते

मैं चाह रहा हूँ, गाऊँ केवल एक गान, आख़िरी समय
पर जी में गीतों की भीड़ लगी
मैं चाह रहा हूँ, बस, बुझ जाएँ यहीं प्राण, रुक जाए हृदय
पर साँसों में तेरी प्रीति जगी

इसलिए मौन हो जाता हूँ, स्वीकार करो यह विदा
आज आख़िरी बार;
मत समझो मेरी नीरवता को व्यथा-जात
या मेरा निज पर अनाचार।

मैं आज बिछुड़ कर भी सचमुच सुखी हुआ मेरी रानी!
इतना विश्वास करो मुझ पर
मैं सुखी हूँ कि तुमने अपनी नारी-जन सुलभ चातुरी से
बिखरा दी मेरी नादानी
पानी-पानी करके सत्वर

मैं सुखी हूँ कि इस विदा-समय भी नहीं नयन गीले तेरे,
मैं सुखी हूँ कि तुमने न बँटाए कभी अलभ्य स्वप्न मेरे,
मैं सुखी हूँ कि कर सकीं मुझे तुम निर्वासित यों अनायास,
मैं सुखी हूँ कि मेरा प्रमाद बन सका नहीं तेरा विलास।
मैं सुखी हूँ कि – पर रहने दो, तुम बस इतना ही जानो
मैं हूँ आज सुखी,
अन्तिम बिछोह, दो विदा आज आख़िरी बार ओ इन्दुमुखी!

विदा बेला

पाया स्नेह, पा सकीं न पर तुम विदा-रीति का ज्ञान
पगली! बिछोह की बेला में बिन मांगे ही प्रीति का दान
दो मुझे। कहो इस अन्तिम पल में एक बार ’प्रियतम’ धीमे
पूछो : ’कब लौटोगे वसन्त में? वर्षा में? शारद-श्री में?
शीत की शर्वरी में?’ सरले! मत रह जाओ नतमुख उदास
लाज से दबी। कल जब यह पल होगा अतीत, तब अनायास
मुखरित होगी यह नीरवता, बन व्यथा, वियोगी प्राणों में
तब तुम सोचोगी बार-बार : ’क्यों आँसू में, मुस्कानों में
दुख-सुख की उस अद्वितीय घड़ी को किया न मैंने अमर?’ प्रिये!
यह कसक तुम्हें कलपाएगी : ’क्यों मैंने प्रिय के अश्रु पिये
नयनों से नहला दिया न, संचित किया न क्यों कुछ आश्वासन
इस विरह-काल के लिए हाय! भर आलिंगन, पा कर चुम्बन!

प्रश्नचिह्न

मूर्ति तो हटी, परन्तु
तम में भटकती हुई अनगिनती आंखों को
जिसने नई दृष्टि दी,
खोल दिए सम्मुख नए क्षितिज,
नूतन आलोक से मंडित की सारी भूमि-
जन-मन के मुक्तिदूत
उस देवता के प्रति,
श्रध्दा से प्रेरित हो,
समवेत जन ने,
प्रतिमा प्रतिष्ठित की अपने सम्मुख विराट!
अपने हृदयों में बसी ऊर्ध्यबाहु कल्पना,
पत्थर पर आंकी अति यत्न से!
मूर्ति वह अद्वितीय, महाकाय,
शीश पर जिसके हाथ, धरते थे मेघराज,
चरणों में जिसके जन, झुकते थे भक्ति से
अंजलि के फूल-भार के समान,
अधरों पर जिसके थी मंत्रमयी मुसकान
उल्लसित करती थी लोक-प्राण!
यों ही दिन बीत चले,
और वह मूर्ति-
दिन-पर-दिन, स्वयमेव
मानो और बडी, और बडी होती चली गई!
जड प्रतिमा में बंद यह रहस्य, यह जादू,
कितने समझ सके, कितने न समझे- यह कहना कठिन है।
क्योंकि उसे पूजा सब जन ने
भूलकर एक छोटा सत्य यह,
पत्थर न घटता है, न बढता है रंच मात्र,
मूर्ति बडी होती जा रही थी क्योंकि
वे स्वयं छोटे होते जाते थे,
भूलकर एक बडा सत्य यह,
मूर्ति की विराटता ने ढंक लिए वे क्षितिज,
देवता ने एक-एक करके जो खोले थे।
आखिर में एक दिन ऐसा भी आ पहुंचा,
मूर्ति जब बन चुकी थी आसमान,
और जन बन चुके थे चूहों-से, मेंढक-से,
छोटे-ओछे, नगण्य!
क्षितिजों के सूर्य की जगह भी वह मुस्कान,
जिसमें नहीं था कोई अपना आलोक-स्रोत!
होकर वे तम में बंद
फिर छटपटाने लगे!
तभी कुछ साहसी जनों ने बढ
अपनी लघुता का ज्ञान दिया हर व्यक्ति को।
और फिर,
शून्य बन जाने के भय से अनुप्राणित हो-
समवेत जन ने-
अपने ही हाथों से गढी हुई देवता की मूर्ति वह
तोड डाली-
छैनी से, टांकी से, हथौडी से,
जिसको जो मिला उसी शस्त्र से,
गढते समय भी ऐसा उत्साह कब था?
देखा तब सबने आश्चर्य से :
प्रतिमा की ओट में जो रमी रही एक युग,
उनकी वे दृष्टियां अब असमर्थ थीं,
कि सह सके सहज प्रकाश आसमान का!
और फिर सबने यह देखा असमंजस से :
मूर्ति तो हटी, परंतु सामने डटा था प्रश्न चिह्न यह :
मूंद लें वे आंखें या कि प्रतिमा गढें नई?
हर अंधी श्रध्दा की परिणति है यह खण्डन!
हर खण्डित मूर्ति

समाधि लेख

रस तो अनंत था, अंजुरी भर ही पिया,
जी में वसंत था, एक फूल ही दिया।
मिटने के दिन आज मुझको यह सोच है,
कैसे बडे युग में कैसा छोटा जीवन जिया।

का प्रसाद है यह

 

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