भोला पंडित प्रणयी

भोला पंडित प्रणयी की रचनाएँ

शीर्षक की तरह

तुम हमारे संघर्षशील जीवन का सच
आज नहीं तो कल
अवश्य जान जाओगे
हवा में तैरती ख़ुशबू की तरह।
तुम्हारी उड़ान शून्य में
भटकती पाखी की तरह
ज़मीन से बहुत ऊपर तो है
लेकिन, घोंसले में वापसी पर
तुम्हारी चोंच में
एक भी दाना नहीं होगा ।

मानवीय दृष्टि का यह अंधत्व ही
हमारी गुलामी का मूल है ।
एक सार्थक बहस के बाद ही
यह समझोगे कि कहाँ तुम्हारी भूल है ।

तुम अपने खंडित अस्तित्व पर
कब तक आत्मश्लाघा की
ऊँची मीनार खड़ी करते रहोगे ?

तुम्हारी केन्द्रीय शक्ति का पता सबको है
और इधर
असहमतियों के प्रभंजन को
तुम्हारे खोखलेपन का पता है ।
तुम्हें तो कविता की तरह
भीतर और बाहर
एक समान जीना चाहिए
एक शीर्षक की तरह ।

अतीतजीवी

सुबह की धूप सेंकती मेरी देह
अब गरमा गई है
और तेरी याद / मुझे भरमा गई है
गुलमोहर की छाँह में पसरी
चितकबरी धूप की तरह / तेरी याद
मुझे शरमा गई है ।

मेरा मानसरोवर जम गया है
और मेरा राजहंस
पंख फड़फड़ाने लगा है ।

तुम अब भी / उसी परिचित गली में खड़ी
लुका-छिपी के खेल में / प्रतीक्षारत हो
और मैंने पीछे से
अपनी कोमल हथेलियों से
तुम्हारी आँखें बंद कर दी हैं ।

और तुमने / मेरी चिरपरिचित गंध से
मुझे पहचान लिया है ।
तुम्हारी धड़कन तेज़ हो गई है
सागर की लहरों की तरह ।

यह सच है
हमारा मिलन जहाँ भी होता
वहाँ हमारा घर नहीं होता
हम अकेले होते / शब्द मौन होते
और साँसें विरल हो
हमारे जीवन को संजीवित रखतीं ।

आज समय की नदी में
मेरी व्यथाएँ तिरती हैं
कई उपधाराओं से मुड़कर भी
तुम तक नहीं पहुँच पाना
तुम्हारी याद / मेरे दुःख
पानी की तरह बहते हैं ।

बेस्वाद फल

बड़ा बेसबब लगता है आज का माहौल
ऐन्द्रिय सुखार्थ
हमने छिपा लिया है स्वत्व
बड़ा गड्ड-मड्ड हो गया है आज का अस्तित्व,
विरासती अस्मिता
बदलते मौसम
सूखती धाराएँ
अनसुने निरर्थक नारे
अब कहाँ छू पा रहे हैं अवाम को ?

टूटते मुल्क
छूटते आग्नेयास्त्र
दुर्घटनाग्रस्त मौतों, हत्याओं का सिलसिला
आतंकित भूगोल
अब कहाँ छिपा है कोई रहस्य?
टूट रही नीतियाँ
मिट रहा इतिहास
अब कहाँ अच्छा लगता यह लोक ?

सबने खो दी है अपनी पहचान
बड़ा कुंठित हो गया इनसान
सचमुच
अब छा गई हैं काइयाँ-सेवार इस सरोवर में ।
अब न जन्म निरापद
न मृत्यु न यात्राएँ और न इच्छाएँ
फिर कोई कैसे कहे इस लोक को अच्छा ?

अस्तु,
खोजते हैं ग्रह-लोक
क्योंकि कोई करना नहीं चाहता
भाषाई शिरकत का झमेला
उष्ण-शीत के आतंक
अपनी नग्नता, निरीहता

और अकर्मण्यता के बीज से फले
हर पेड़ के बेस्वाद फल अब कौन खाएगा ?

कैसे सस्मित हो यह आनन

कैसे सस्मित हो यह आनन, जब मन में उल्लास नहीं है,
सुमन खिले सूखी डाली पर, ऐसा तो विश्वास नहीं है ।

जिस घर माँगा प्यार उसी ने
उलझन का उपहार दिया है,
फूलों के बदले दुनिया ने
पत्थर से सत्कार किया है ।
उलझा-उलझा मन है मेरा, चातक हूँ पर प्यास नहीं है

जब तक मौसम साथ निभाए
तब तक गंध सुमन ने छोड़े,
नीरस जीवन की परिभाषा
देकर वह संत्रास ही जोड़े ।
सूखे अधर दिखाऊँ कैसे, जब उसमें मीठास नहीं है

टूटा पात लौट कर जैसे
कभी नहीं डाली पर आता,
अँखियन में जब नींद नहीं
फिर स्वप्न कहाँ उसमें आ पाता ।
सूखे हुए सुमन में सच ही, फल का कभी विकास नहीं है

आई बार-बार हैं घड़ियाँ
टकराती जब नाव किनारे,
स्वर बंदी तब हो जाते हैं
मिलते जब न शब्द-सहारे ।
क़लम उत्साहित है लिखने को, भाव ही मेरे पास नहीं है

जब से ये पताका फहरी है

जब से ये पताका फहरी है
ख़ूब गहमा-गहमी कचहरी है,
अब कोई किसी की क्या सुने
लगता यह दुनिया बहरी है ।

गत पाँच दशक तक क्या देखे
हर शाम गुज़ारी अनदेखे,
सब अनजाने ही तैर रहे
समझा न नदी यह गहरी है ।

सब अपने राग अलाप रहे
स्व सुख की माला जाप रहे,
हैं राग आलाप रहे भैरव
कहते श्रोता को ठुमरी है !

सब खोद रहे गड़े मुरदे
हैं दागनुमा उनके परदे,
सब खोज रहे चप्पे-चप्पे
मिलता न देश वो नगरी है ।

बह रही कहाँ अब स्वच्छ हवा
नकली मिलती मरीजों को दवा,
बंदूक तो कांधे पर लटकी
ख़ामोश खड़ा अब प्रहरी है ।

मौसम भी पूरा बदल गया
सब बनते नहले पर दहला,
अब छाँव मिले तो कहाँ मिले
यह समय भी खड़ी दुपहरी है !

अब क्यों विश्वास करे कोई
जब सबके मन विष बेलि बोई,
बन अपने आप मियाँ मिट्ठई
सच पूछें तो सब नंबरी है !

गुनगुनाने से चमक आई चमन में आज तक

गुनगुनाने से चमक आई चमन में आज तक,
मुस्कराने से महक आई चमन में आज तक ।

पंछियों ने मंत्र पढ़-पढ़ पेड़ को बौरा दिया,
गीत ने भी पत्थरों की कुक्षि को पिघला दिया ।
कौन कहता है जलेगी अब नहीं ये तीलियॉं
आजमाने से खनक आई चमन में आज तक ।

चमन के शृंगार में कब से लगे मज़दूर हैं,
फिर न जाने आज वे क्यों शून्य में मज़बूर हैं।
जो धरोहर है बची अब देख लो इतिहास उसका
श्रम सजाने से दमक आई चमन में आज तक ।

आज तक झंडे गड़े हैं शक्ति के संचार से,
एकता को बल मिला है, सरफरोशी प्यार से ।
अब नहीं हो चूक मौजूँ आज का विपरीत है
सर कटाने से झलक आई चमन में आज तक ।

आ क़दम बढ़ा, चल साथ मेरे

आ क़दम बढ़ा, चल साथ मेरे, उठ जीने का कर फर्ज अदा !

यह बड़ी बात तू ज़िन्दा है
लड़ना है तुझको वहशत से,
अपने को मफ़फलिस मत समझो
टकराना है इस दहशत से ।
तू बाँध कफ़न अपने सर पर, न रहना है अब ख़ौफ़ज़दा ।

ये ज़ुल्मो सितम सहकर कब तक
तू अपनी जिबह कराएगा,
आदमख़ोरों से कब तक तू
चुपचाप सज़ाएँ पाएगा ?
ख़तरे की घंटी बजती है, मक्तल से आती दर्दे-सदा !

हादसे, कत्ल, बमबारी से
सब आतंकित हैं सोगवार,
दोशीजा की अस्मत लुटती
क्या लाफ़ानी है बलात्कार?
तू रोक इसे आगे बढ़कर, है तेरे कंधे बोझ लदा !

लूटा है गुलशन को जिसने
पहचानो वैसी मूरत को,
ज़ालिम बनकर जिसने चूसा
छलनी कर उसकी फ़ितरत को।
तुम नहीं मुंतजिर बन बैठो, कर दो तुम उसको बेपरदा !

देखो न दाग लगे दामन
यह वतन तुम्हारी अम्मा है,
ऐ वतनपरस्तो, परवानो,
हर शै पर जलती शम्मा है।
तेरी तकदीर बनाने को, हर साँस का ख़िदमतग़ार ख़ुदा !

जब उठकर सब चले गए तो

जब उठकर सब चले गए तो, मन की बात किसे बतलाएँ !

कल तक जो थे साथ हमारे
आज बने हैं सब अनजाने
मन से बढ़ती मन की दूरी
डाल रही नफरत के दाने ।
टूट रहे सब नाते-रिश्ते, मन की बात किसे बतलाएँ !

अपनों के दिन भी क्या दिन थे
सबके सब अपने लगते थे,
सुख-दुःख में भी मिल-बैठकर
साथ-साथ सपने गढ़ते थे ।
अलग-अलग सपनों को लेकर
अब कैसे एक साज सजाएँ, मन की बात किसे बतलाएँ !!

बहुत कठिन है राह बनाना
अपनों से सिंगार सजाना,
संबंधों के विखरेपन को
प्यार-प्रीति की छाँव दिखाना ।
भावहीन गीतों से कैसे
हम अपने मन को बहलाएँ, मन की बात किसे बतलाएँ !!

पर्वत की ऊँचाई जैसी
मेरी मंशा ठहर गई है,
अपने बने पराए की अब
भ्रातृ-भावना बिखर गई है ।
मन में बैठी उन यादों को
अब कैसे जीवित दफनाएँ, मन की बात किसे बतलाएँ !!

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