मंजूर ‘हाशमी’ की रचनाएँ

बदन को ज़ख़्म करें ख़ाक को लबादा करें

बदन को ज़ख़्म करें ख़ाक को लबादा करें
जुनूँ की भूली हुई रस्म का इआदा करें

तमाम अगले ज़मानों को ये इजाज़त है
हमारे अहद-ए-गुज़िश्‍ता से इस्तिफ़ादा करें

उन्हें अगर मेरी वहशत को आज़माना है
ज़मीं को सख़्त करें दश्‍त को कुशादा करें

चलो लहू भी चरागों की नज़र कर देंगे
ये शर्त है कि वो फिर रौशनी ज़्यादा करें

सुना है सच्ची हो नियत तो राह खुलती है
चलो सफ़र न करें

फ़ौज की आख़िरी सफ़ हो जाऊँ

फ़ौज की आख़िरी सफ़ हो जाऊँ
और फिर उस की तरफ़ हो जाऊँ

तीर कोई हो कमाँ कोई हो
चाहते हैं के हदफ़ हो जाऊँ

इक ज़माना है हवाओं की तरफ
मैं चराग़ों की तरफ़ हो जाऊँ

अश्‍क इस आँख में आए न कभी
और टपके तो सदफ़ हो जाऊँ

अहद-ए-नौ का न सही गुज़राँ का
बाइस-ए-इज़-ओ-शरफ़ हो जाऊँ

कम से कम

ख़याल ओ शौक़ को जब हम तेरी तस्वीर करते हैं

ख़याल ओ शौक़ को जब हम तेरी तस्वीर करते हैं
तो दिल को आईना और आँख को तनवीर करते हैं

नज़र के सामने जितना इलाक़ा है वो दिल का है
तो उस की बे-दिली के नाम ये जागीर करते हैं

हवा मिसमार भी कर दे अगर शहर-ए-तमन्ना को
फिर उस मलबे से कस्र-ए-आरज़ू तामीर करते हैं

हवाएँ पढ़ के अपने नाम के ख़त झूम जाती हैं
मोहब्बत से जो पत्तों पर शजर तहरीर करते हैं

हमारे लफ़्ज आइंदा ज़मानों से इबारत हैं
पढ़ा जाएगा कल जो आज वो तहरीर करते हैं

इरादा करें

किसी बहाने सही दिल लहू तो होना है

किसी बहाने सही दिल लहू तो होना है
इस इम्तिहाँ में मगर सुर्ख़-रू तो होना है

हमारे पास बशारत है सब्ज़ मौसम की
यक़ीं की फ़स्ल लगाएँ नुमू तो होना है

मैं उस के बारे में इतना ज़्यादा सोचता हूँ
के एक रोज़ उसे रू-ब-रू तो होना है

लहू-लुहान रहें हम के शाद काम रहें
शरीफ क़ाफ़िला-ए-रंग-ओ-बू तो होना है

कोई कहानी कोई रौशनी कोई सूरत
तुलू मेरे उफ़ुक़ से कभू तो होना है

 

कुछ ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद तो कर लेना था

कुछ ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद तो कर लेना था
वो नहीं था तो उसे याद तो कर लेना था

कुछ उड़ानों के लिए अपने परों को पहले
जुम्बिश ओ जस्त से आज़ाद तो कर लेना था

फिर ज़रा देखते तासीर किसे कहते हैं
दिल को भी शामिल-ए-फ़रियाद तो कर लेना था

कोई तामीर की सूरत भी निकल ही आती
पहले इस शहर को बर्बाद तो कर लेना था

क़ैस के बाद गज़ालाँ की तसल्ली के लिए
‘हाशमी’ दश्‍त को आबाद तो कर लेना था

 

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