मज़हर इमाम की रचनाएँ

अपने खोए हुए लम्हात को पाया था कभी

अपने खोए हुए लम्हात को पाया था कभी
मैं ने कुछ वक़्त तिरे साथ गुज़ारा था कभी

आप को मेरे तआरूफ़ की ज़रूरत क्या है
मैं वही हूँ कि जिसे आप ने चाहा था कभी

अब अगर अश्‍क उमँडते हैं तो पी जाता हूँ
हौसला आप के दामन ने बढ़ाया था कभी

अब उसी गीत की लै सोच रही है दुनिया
मैं ने जो गीत तिरी बज़्म में गाया था कभी

मेरी उल्फ़त ने किया ग़ैर को माइल वर्ना
मैं तिरी अंजुमन-ए-नाज़ में तन्हा था कभी

कर दिया आप की क़ुर्बत ने बहुत दूर मुझे
आप से बोद का एहसास न इतना था कभी

दोस्त नादाँ हो तो दुश्‍मन से बुरा होता है
मुझ को अपने दिल-ए-नादाँ पे भरोसा था कभी

 

अपने रिसते हुए ज़ख़्मो की क़बा लाया हूँ

अपने रिसते हुए ज़ख़्मो की क़बा लाया हूँ
ज़िंदगी मेरी तरफ़ देख कि मैं आया हूँ

किसी सुनसान ज़जीरे से पुकारो मुझ को
मै सदाओं के समुंदर में निकल आया हूँ

काम आई है वही छाँव घनी भी जो न थी
वक़्त की धूप में जिस वक़्त मैं कुम्हलाया हूँ

ख़ैरियत पूछते हैं लोग बडे़ तंज़ के साथ
जुर्म बस ये है कि इक शोख़ का हम-साया हूँ

सुब्ह हो जाए तो उस फूल को देखूँ कि जिसे
मैं शबिस्तान-ए-बहाराँ से उठा लाया हूँ

अस्त्र-ए-नौ मुझ को निगाहों मैं छुपा कर रख ले
एक मि

अब भी पर्दे हैं वही पर्दा-दरी तो देखो

अब भी पर्दे हैं वही पर्दा-दरी तो देखो
अक़्ल का दावा-ए-बालिग़-नज़री तो देखो

सर पटकते हैं कि दीवार-ए-ख़ुमिस्ताँ ढा दें
हज़रत-ए-शैख़ की आशुफ़्ताँ-सरी तो देखो

आज हर ज़ख़्म के मुँह में है ज़बान-ए-फ़रियाद
मेरे ईसा की ये वसीअ-उन-नज़री तो देखो

कै़द-ए-नज़्ज़ारा से जल्वो को निकलने न दिया
दोस्तो की ये वसीअ-उन-नज़री तो देखा

उन से पहले ही चले आए जनाब-ए-नासेह
मेरे नालो की ज़रा ज़ूद-असरी तो देखो

है तग़ाफ़ुल कि तरवज्जोह नही खुलने पाता
हुस्न-ए-मासूम की बेदाद-गरी तो देखो

मुझ से ही पूछ रहा है मिरी मंजिल का पता
मेरे रहबर की ज़रा राह-बरी तो देखो

उन दे आए हैं ख़ुद अपनी मोहब्बत के ख़ुतूत
ग़म-ग़ुसारो की ज़रा नामा-बरी तो देखो

दोनो ही राह में टकराते चले जाते हैं
इश्‍क़ और अक़्ल की ये हम-सफ़री तो देखो

जावेदाँ क़ुर्ब के लम्हात हुए हैं मज़हर
ताइर-ए-वक़्त की बे-बाल-ओ-परी तो देखो

टती हुई तहज़ीब का सरमाया हूँ

उस की आँखों में तमन्ना-ए-सहर रख देना

उस की आँखों में तमन्ना-ए-सहर रख देना
सीना-ए-शब में किसी बात का डर रख देना

आज गुज़रेगा इसी सम्त से वो महर-ए-बदन
दिल रस्ते में ज़रा चंद शजर रख देना

ये ना कहना कि अँधेरा है बहुत राहो में
उस से मिलना तो हथेली पे क़मर रख देना

उस को अशआर सुनाना तो करामात के साथ
अपने टूटे हुए लफ़्ज़ों में असर रख देना

वारदातें तो कई शहर में गुज़री होंगी
आज अख़बार में मेरी भी ख़बर रख देना

जिस वरक़ पर है हदीस-ए-लब-ओ-रूख़्सार रक़म
उस वरक़ पर कोई बर्ग-ए-गुल-ए-तर रख देना

एक महताब दरख़्शाँ है सर-ए-बाम-ए-ख़याल
मेरी आँखो में भी नैरंग-ए-नजर रख देना

लाला-ए-नम से तराशे वो कोई पैकर-ए-संग
दस्त-ए-सन्नास में ये भी हुनर रख देना

 

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