मणि मोहन की रचनाएँ

एक चलती हुई बस में

मैं एक चलती हुई बस में सवार हूँ
जो दौड़ रही है
देश की राजधानी की सड़कों पर

शायद ये वही बस है
जिसमे कुछ दरिन्दों ने
बलात्कार किया था
एक मासूम लड़की के साथ

शायद मैं रक्त से सनी
उसी बस में बैठा हूँ

मैं बैठा हूँ
शायद उसी सीट पर
जिस पर बैठी होगी वह मासूम लड़की

शायद मैं बैठा हूँ
उस सीट पर
जिस पर बैठे होंगे दरिन्दे
या फिर शायद उस सीट पर
जिस पर बैठा होगा ड्राइवर

बाहर घुप्प अँधेरा है
बस दिल्ली से बाहर निकल आई है
वह किसी दूसरे राज्य की सीमा में
दौड़ रही है इस वक़्त
फिर दूसरे से तीसरे
और तीसरे से चौथे ….

अरे ! यह क्या !!!
यह तो किसी दूसरे ही
मुल्क की सरहद में घुस गई है

पता नहीं कितना रास्ता
तय कर चुकी है यह बस
पर इतना पता है
कि सड़क के दोनों ओर उगे झुरमुटों
और जंगल से
सिर्फ़ चीख़ें सुनाई दे रहीं हैं

तमाम चौराहों के सिग्नल ग्रीन हैं इस वक़्त
चीख़ों से भरी
अन्धेरे में दौड़ती
इस बस का स्टेयरिंग
मेरे हाथ में

थोड़ी-सी भाषा

बच्चों से बतियाते हुए
अन्दर बची रह जाती है
थोड़ी-सी भाषा
बची रह जाती है
थोड़ी-सी भाषा
प्रार्थना के बाद भी ।

थोड़ी-सी भाषा
बच ही जाती है
अपने अन्तरंग मित्र को
दुखड़ा सुनाने के बाद भी ।

किसी को विदा करते वक़्त
जब अचानक आ जाती है
प्लेटफॉर्म पर धड़धड़ाती हुई ट्रेन
तो शोर में बिखर जाती है
थोड़ी-सी भाषा …
चली जाती है थोड़ी-सी भाषा
किसी के साथ
फिर भी बची रह जाती है
थोड़ी-सी भाषा
घर के लिए ।

जब भी कुछ कहने की कोशिश करता हूँ
वह रख देती है
अपने थरथराते होंठ
मेरे होंठो पर
थोड़ी-सी भाषा
फिर बची रह जाती है ।

दिन भर बोलता रहता हूँ
कुछ न कुछ
फिर भी बचा रहता है
बहुत कुछ अनकहा
बची रहती है
थोड़ी-सी भाषा
इस तरह ।

अब देखो न !
कहाँ-कहाँ से
कैसे-कैसे बचाकर लाया हूँ
थोड़ी-सी भाषा
कविता के लिए ।

है ।

 

थोड़ा-सा वक़्त

थोड़ा-सा वक़्त
गला दिया है उसने कपड़ों के साथ
एक बदरंग बाल्टी में

थोड़ा-सा धूसर वक़्त
(जाने किस कपड़े ने छोड़ा है रंग)
सूखने के लिए डाल दिया है
आँगन में बंधी रस्सी पर

थोड़ा-सा वक़्त
बच्चों के टिफिन और बस्ते के साथ
चला गया है स्कूल

अभी-अभी उफनकर बहा है
गैस-स्टेण्ड से सिंक की तरफ
थोड़ा-सा वक़्त

थोड़ा-सा वक़्त
आज फिर वह रखकर भूल आई
छत्त पर सूख रहीं
लाल मिर्ची के पास

घर के किसी कोने में
उसके हाथ से छूटकर
टनटनाता हुआ
अभी-अभी गिरा है
थोड़ा-सा वक़्त

अपनी सृष्टि के ब्रह्माण्ड में
वह सदियों से घूम रही है
वक़्त की क्षत-विक्षत लाश उठाए

सदियों से
गिर रहा है वक़्त
यूँ ही क़तरा-क़तरा ।

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