मदनलाल मधु की रचनाएँ

 

अपनी धरती स्वर्ग बना लोगे

जितनी भी जल्दी तुम मिलकर
अपने क़दम बढ़ा लोगे
उतनी ही जल्दी तुम अपनी
धरती स्वर्ग बना लोगे ।

शक्ति न हो मेरी जनता में
मैं यह मान नहीं सकता
कितने लाल छिपे गुदड़ी में
मैं अनुमान नहीं सकता,
ढूँढ़ोंगे तो अपने घर में
हीरे-मोती पा लोगे,
उतनी ही जल्दी तुम अपनी
धरती स्वर्ग बना लोगे ।

वह अतीत मेरे भारत का
गर्व कि जिस पर होता है
उससे भी उज्ज्वल भविष्य
उसकी पलकों में सोता है,
जागेंगे पलकों के सपने
यदि तुम उन्हें जगा लोगे
उतनी ही जल्दी तुम अपनी
धरती स्वर्ग बना लोगे ।

एक अकेला थकता राही
दो हों तो मंज़िल कटती
अगर करोड़ों क़दम साथ हों
तो पथ की दूरी घटती,
मंज़िल भी दौड़ी आएगी
यदि तुम उसे बुला लोगे
उतनी ही जल्दी तुम अपनी
धरती स्वर्ग बना लोगे !

मेरे सपनों का भारत

मैं तो देख रहा हूँ सपना
ऐसे हिन्दुस्तान का
जन्म जहाँ पर होगा आख़िर
नए, सुखी इन्सान का
मैं तो देख रहा हूँ सपना ऐसे हिन्दुस्तान का ।

जहाँ न होगी अन्न-समस्या
और भूख का रोना
हरियाली से लहराएगा
जिसका कोना-कोना,
जय-जयकार जहाँ पर होगा, श्रम का और किसान का
मैं तो देख रहा हूँ सपना ऐसे हिन्दुस्तान का ।

राज जहाँ पर नहीं करेगी
पूँजी शोषणकारी
जहाँ न कुछ महलों वाले हों
लाखों नग्न, भिखारी,
जहाँ बनें सच्चे जन-सेवक
शासक सत्ताधारी
पूजा पाठ जहाँ पर होगा, जनता के भगवान का
मैं तो देख रहा हूँ सपना ऐसे हिन्दुस्तान का ।

सदियों का अज्ञान, अँधेरा
जहाँ न शेष रहेगा
धर्म, जाति के मतभेदों का
जहाँ न क्लेश रहेगा,
भारत का हर वासी जिसको
अपना देश कहेगा,
जहाँ मिलेगा पुण्य सभी को, वीरों के बलिदान का
मैं तो देख रहा हूँ सपना ऐसे हिन्दुस्तान का ।

देश-देश में जिसका आदर
जिसका मान बढ़ेगा
ऊँचे नील गगन में जिसका
नव दिनमान चढ़ेगा,
नई सभ्यता, मानवता के
जो भगवान गढ़ेगा,
अग्रदूत बन जाएगा जो अनुपम स्वर्ण-विहान का
मैं तो देख रहा हूँ सपना, ऐसे हिन्दुस्तान का ।

यह देश हमारा है

हम भारत-भाग्य विधाता हैं
यह देश हमारा है
यह देश हमारा है ।

हमने सदियों की ज़ंजीरों को तोड़ गिराया है
हमने आज़ादी का झण्डा ऊँचा फहराया है
दे प्राण करें इसकी रक्षा यह ध्येय बनाया है,
भारत की जागृत जनता तो
अब बढ़ती धारा है,
यह देश हमारा है
यह देश हमारा है ।

अब हरे खेत लहराते हैं
बादल भी उमड़े आते हैं
तुम चूमो अपनी धरती को
मानो वे यही सिखाते हैं,
भारत माता की मिट्टी ने
बेटॊं को आज पुकारा है,
यह देश हमारा है
यह देश हमारा है ।

हम मिलकर यन्त्र चलाएँगे
हम मिलकर अन्न उगाएँगे
सुख-दुख में हाथ बँटाएँगे,
जो भूखे हैं, जो नंगे हैं
हम खाना उन्हें खिलाएँगे
तन पर कपड़ा पहनाएँगे
मिट्टी को सोना करने का
प्रण हमने धारा है,
यह देश हमारा है, देश हमारा,
यह देश हमारा है ।

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