मधुरिमा सिंह की रचनाएँ

मेरी ग़ज़ल भी रही इस तरह ज़माने में

मेरी ग़ज़ल भी रही इस तरह ज़माने में,
फ़कीर जैसे हो पीरो के आस्ताने में ।

ये और बात कि अहसास खा गया धोखा,
तुम्हारी याद थी शामिल तुम्हे भुलाने में ।

इस एहतियात से मैंने कहें हैं सारे शेर,
तुम्हारा नाम न पढ़ ले कोई ज़माने में ।

सिवाय इसके कि अपनी ख़बर नहीं उसको,
न पाई कोई कमी आपके दिवाने में ।

तेरी किताब में वो इक वरक जो सादा है,
मेरा वजूद है उतना तेरे फ़साने में ।

 

रात हमारी आँखों से फिर बही कहानी अम्मा की

रात हमारी आँखों से फिर बही कहानी अम्मा की ।
खिड़की से सटकर महकी जब रात की रानी अम्मा की ।

कढ़ी भात खट्टी चटनी और दाल परोंठे गोभी के,
दही दूध अदरक लहसुन सी गंध सुहानी अम्मा की ।

बेसन की सोंधी रोटी-सा यह भी मुझको याद अभी,
पीठ फेरकर पानी पीकर भूख छुपानी अम्मा की ।

घर के सुख में उसने खुद को पूरा – पूरा बाँट दिया,
दो जोड़े सूती धोती में गई जवानी अम्मा की ।

आज अचानक उसको देखा अम्मा जैसी लगती थी,
चाची के टूटे छज्जे पर दही मथानी अम्मा की ।

बाबा की वह गिरी हवेली दादी का तुलसी का चौरा,
पिछवाड़े की नीम भी जाने उमर खपानी अम्मा की ।

जब गैया की पूँछ थी खींची गौरैया का अंडा फोड़ा,
मेरे साथ नहीं सोना यह सज़ा सुनानी अम्मा की ।

छोड़-छाड़ कर चले गए सब किसको उसका याद रहा,
बस बाबू को याद रही वो चिता जलानी अम्मा की ।

जब बच्चे के होने में मै तड़फ – तड़फ कर रोई थी,
तब देखी थी अपने जैसी पीर उठानी अम्मा की ।

मैंने अम्मा की झुर्री को धीरे- धीरे ओढ़ लिया,
कैसे मै बिटिया से कह दूँ बात पुरानी अम्मा की ।

मुट्ठी का सच

जब से तुमने
मेरी हथेली पर
कोई अमूर्त-सी अनुभूति
और मूर्त-सी संवेदना
रखकर मेरी मुट्ठी
बंद कर दी थी ।
तब से मै निरंतर
यह बंद मुट्ठी
लिए जी रही हूँ ।

कभी कभी मन करता है
खोलकर देखूँ
कि वह क्या था ?
कोई सम्बन्ध, अनुबंध
या कोई अधिकार ?
अथवा जन्म-जन्मान्तरों
की सहयात्रा का स्वीकार ?

शनैः शनैः मेरी बंद मुट्ठी
भीतर ही भीतर
पसीजती रही
और वह जो कुछ भी था
मेरे रोम-रोम में समाता हुआ
मेरी चेतना का अंग बन गया ।
और अचानक ही मुझे लगा कि
मेरी मुट्ठी खाली है ।

आज सोंचती हूँ यदि तुम्हे
तुम्हारी धरोहर लौटाना चाहूँ भी ,
तो लौटा नहीं सकती ।
फिर चाहे वह कोई
यथार्थ हो अथवा स्वप्न
या किसी अधिकार का भ्रम
या स्वयं तुम ….।।

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