मनविंदर भिम्बर की रचनाएँ

ज़िंदगी रख के भूल गई है मुझे

ज़िंदगी रख के भूल गई है मुझे
और मैं ज़िंदगी के लिए
ब्रह्मी बूटी खोज रही हूँ
मिले तो ज़िंदगी को पिला दूँ
और वो मुझे याद कर ले

उस दिन

उस दिन
आसमान साफ़ था
बादलों में हलचल थी
वो अचानक मिले
जब उन्हें होश आया तो काफ़ी आगे निकल चुके थे
वापस आना संभव न था

उस दिन
बदली ने कहा
मैं हवाओं के वश में हूँ
मेरी क़िस्मत में हैं पहाड़ों की चट्टानें
मेरे सामने हैं न ख़त्म होने वाली राहें

बिछड़ते हुए उदास न होना
कहीं
भटक जाऊँ पहाड़ों में
या सुनसान राहों में
और मुझे नसीब हो रेत की एक क़ब्र
उस क़ब्र पर अगर पहुँचो
तो उस पर इबारत टाँक देना

“हम उल्टी दिशाओं के बादल
अचानक टकरा गए
फिर सारी उम्र लड़ते रहे हवाओं के खिलाफ़”

 

सुबह सवेरे

सुबह सवेरे
कोहरे में सब कुछ
धुँधला गया

गुलाब का बूटा
जिससे महकता था आँगन
दरख़्त जहाँ पलती थी गर्माहट
मोड़ जहाँ इंतज़ार का डेरा था
कुछ भी तो नहीं दिख रहा
सब धुँधला गया

दिल पर हाथ रखा तो
वह धड़क गया
तेरे ख़याल भर से
सोचा
यह ख़याल है या ज़िक्र भर तेरा

तुम कहते हो
मैं कहीं गया नहीं, यही हूँ तेरे पास

एक तुम हो

एक तुम हो
जो पानी पर भी उकेर देते हो मन की भावनाएँ
एक मैं हूँ
जो काग़ज़ पर भी कुछ उतार नहीं पाती

तुमने अकसर झील के पानी पर
पहाड़ और पेड़ ऐसे उकेर दिए
जैसे झील पर उग आया हो एक संसार

झील पहाड़ और पेड़
मैं खोती रहती हूँ इनमें
और देखती हूँ अपने अक्षरों को
झील में तैरते हुए
पहाड़ पर चढ़ते हुए
पेड़ पर लटके हुए

तब तुम कहते हो
`आँखें खोलो´
पर नज़रें कैसे मिलाऊँ
उस पल

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