मनोज तिवारी की रचनाएँ

मेरे गाँव का स्कूल उदास है

मेरे गाँव में
नीम की फुनगी पर
बैठ
रोज़ ही
निहारता है
मेरे स्कूल को
पीला चाँद
ढहे – ढनमनाए
छतों – दीवारों से
प्रत्येक कक्षा का
मुआयना करता है
खुरदरे व सफेद
ब्लैकबोर्ड पर
खड़िया से
लिखे प्रत्येक हर्फ को पढने की
कोशिश में
कई बार अपनी
आँखें मींचता है
और वह
पढ पाने में
असफल रहने पर
लंबे डग से
कक्षा को लांघता हुआ
बढ जाता है आगे ।
मेरे गाँव का स्कूल
उदास है आज
तार तार हो आए
चट पर
चाँद को कैसे व कहाँ बिठाए
सोचता है वह
यहाँ तो पारस है
छू जाती है
जब – जब इसकी मिट्टी
जिस किसी को
वह सोना हो जाता है
आखिर पारस भी तो
पत्थर ही है न

नाभिनाल गड़ा है

पैदाइश गांव का
शहर में अनफिट पड़ा हूँ
गाँव -देहात में ही नाभिनाल गड़ा है
हाँ भाई !
जो भी कहो
परंपरावादी या मनुवादी
पर मन से रहा जनवादी
तमगे सदृश अपनाया नहीं
आत्मसात किया जनवाद को
पढना – पढाना काम है
हारा नहीं कभी
न हुआ अधीन परिस्थितियों का
मस्तक ऊँचा रहा विपन्नता में
बह रहा रक्त जब कृषक का रगों में
तो क्यों हों अधीर?
देखा है पिता को
लड़ते हुए उस देव से
जो बना बैठा था विधाता फरेब से
टूट गया पर
डिगा नहीं वह अपनी टेव से
अब तुम्हीं बताओ
जब पिता पर पिता शिखर बन खड़ा है
मन में शौर्य बन अड़ा है
तो मैं बनूँ क्यों दीन अपने कर्म में
डटा रहूंगा यहीं रण में
निष्कर्ष निकले कुछ भी
इसकी चिंता हो मुझे क्यों?

मुश्किल है मुट्ठी भर सुख पाना

रात ढल रही है
आसमान में तारे भी ऊँघने लगे हैं
नींद के झोंके में
मशीन पर गिरते -गिरते
बचे हैं बच्चे
मशीन की आवाज में
उनकी नींद डूब गई है
सुपरवाइजर बाबू
पास ही पडी कुर्सी के हथ्थे पर
अपने पैर टिकाए
मशीन की गज्झिन सी आवाज से
अपने खर्राटे
एकाकार कर रहे हैं
बच्चों को यह
जयजयवंती के सुर से
लग रहे हैं
हवा थक कर
पत्तियों से लिपट गई है
नींद में ऊँघती
माएँ रो रहे शिशुओं को
करवट बदल कर
दूध पिलाने लगी हैं
वे सोच रही हैं
‘अब टेम हो गया है
फैक्ट्रियों से छूटने का’
आधा चाँद कोठरियों में
झांककर भारी कदमों से
गुफा में प्रवेश कर गया चुका है
बच्चे अब भी
नजरें गड़ाए मशीन पर
तार तार हो आए माँ की
साड़ियों के बारे में सोच रहे हैं
उन्हें लगता है
कितना मुश्किल है
मुट्ठी भर सुख पाना ।

मुखौटा

रे मन !
मान भी
कितने लगाएगा मुखौटे
जहाँ जाता है ,
पास होता है जिसके
एक
नया मुखौटा
चढ़ा लेता है ।
छिः!
किसी दिन
मुखौटे ने
विद्रोह कर दिया
सोच क्या होगा?
बहुत हो गया
मुखौटे पर मुखौटा रखे
अब
मेरा कहना
मान भी जा
मेरे मन ।

 

अधलेटा सा पड़ा पीपल

पोखर के बांध पर
अधलेटा सा पड़ा पीपल
आज बिल्कुल दुखी था
उसकी डाल पर
चिडियाँ गपशप करती थी
अंडे सेती थी घोंसले में
कुछ चिडियाँ तो सुस्ताने
व अपनी थकान मिटाने ही
बैठती थी उसकी डालियों पर
खेतों से छूटे बैल
आजमाइश करते थे अपनी
ताकत या खुजली मिटाने
के लिए पीपल के तने से
रगड़ते थे अपनी खाल
एक समय था जब
वासंती बल्लरियाँ सीने से लग
इठलाती थी अपने भाग्य पर
उसकी सफेद हंसी से
पास के पोखर के ठंडे जल
में भी तरंगें उठने लगती थी
घंटोंऽऽऽ बैठ
किसान दुख -सुख की
बातें बतियाते थे
उभर आए जड़ों पर बैठ कर
एक पूरी दुनिया होती थी
आसपास उसके
अब कोई नहीं जाता
पास उसके
वह ठूंठ सा अधलेटा
देखता रहता था
सूने आकाश की ओर ।
पास आता देख मुझे
होठों पर हल्की मुस्कान लिए
स्वागत किया जब उसने मेरा
तो कहते – कहते कुछ
कह न सका उस पीपल से
सिर्फ बैठ ही सका
आलथी- पालथी लगाकर
उसके तने से लगकर ।

मेरे आंगन की चिड़िया

मेरे आंगन में
एक छतनार पेड़ है
उस पर अनेक रंगों वाली
चिड़िया बैठी है
वह फुदकती है इधर – उधर
वह जहाँ भी जाती है
अपने सभी रंगों
को समेटे चलती है
वह एक रंग
दूसरे रंग
से नहीं मिलाती
वह चंचल सी
हठीली चिड़िया
बदलते समय में
भी रंग नहीं
बदलती
उसे कब
किस पंख को कितना
खोलना है
स्वयं निर्णय
लेती है
रंगों को बिना बिखराए
स्वाभाविक उडान
भर कर
शाम होते ही
अपने घोसले
में बैठ
चिडा से
पेड से
आस-पास-पडोस से
बतियाती है ।
वहीं
एक दूसरी
चिड़िया है
उसके भी
रंग – बिरंगे
पंख हैं
वह
हमेशा
सामयिक दृष्टि से
रंग बदलती रहती है
लंबी उडान
भरती है
सभी से वाहवाही
बटोरती है
फिर भी वह
अप्रसन्न और बेचैन
एक डाली से
दूसरी डाली पर
पंखों के रंग बिखराए
फुदकती है
मानो तलाश में
हो किसी के
और
अंधेरा पसरते ही
मेरे आंगन का
छतनार पेड़
आगोश में ले
दोनों को
रात्रि के बिस्तर
में समा जाता है
पहली किरण के लिए ।

जब भी लिखूँगा

जब लिखना बहुत जरूरी हो जाएगा
तो प्रेम लिखूँगा
कार्तिक मास में
गंगा नहा कर
लिखती थी जैसे माँ
बेल पत्र पर ‘ओऽम’
रंग – बिरंगी तितलियों के पंखों पर
नदियों व पहाडों पर
फूल – पत्तियों पर
और चील के डैनों पर
अंकित कर दूँगा
प्रेम ।
नहीं लिखूँगा कभी
बिछोह
प्रेम ही तो है मेरे
निर्निमेष पलकों पर ।

 

बेटियाँ

बेटियाँ
लाडली होती हैं पिता की
सखी होती हैं माँ की
पिता के दहाडने पर
ढाल बनती हैं भाइयों की
घर में
इस कोने से
उस कोने तक
अनुशासन की डोर
होती हैं बेटियाँ ।
बेटियाँ
जब विदा होती हैं
टूट जाता है पिता
बिछड जाती है माँ
अपनी सखी से
अपनी बहनों से
अलग हो उन्मत्त
हो जाता है भाई ।
बेटियाँ
घर की
होती हैं रौनक
बेटियों के न
होने से
उदास हो जाता है
घर ।

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