'महशर' इनायती

‘महशर’ इनायती की रचनाएँ

आँख में आँसू गुम औसान

आँख में आँसू गुम औसान
इश्‍क़़ के मारो की पहचान

इक अपने चुप रहने से
सारी नगरी क्यूँ सुनसान

ऐ हम पर हँसने वालो
तुम नादाँ के हम नादाँ

दिन है समंदर रात पहाड़
हल्की फुल्की अपनी जान

मौत के माने ज़ीस्त से हार
ज़ीस्त के माने इक तावान

हाल देखो ‘महशर’ की
किस से बातें किस का ध्यान

अब तो उकता ये गए बहार-ए-सफ़र हम भी चलें

अब तो उकता ये गए बहार-ए-सफ़र हम भी चलें
किस तरफ़ जाओगे अरबाब-ए-हुनर हम भी चलें

क़ाफ़िले कल के हमें भी न कहें राह-नुमा
ग़ैर-मालूम सी राहों पे अगर हम भी चलें

किस तरफ़ शाम ओ सहर जाते हैं ये शहर के लोग
किस क़दर शौक़ से जाते हैं उधर हम भी चलें

सुनते हैं भरते नहीं ज़ख़्म छुपे तीरों के
सुब्ह को उठ के किसी दोस्त के घर हम भी चलें

हद नज़र की है के बढ़ती ही चली जाती है
हम ने सोचा था के ता हद्द-ए-नज़र हम भी चलें

शाम को सो के जहाँ सुब्ह को लोग उठते हैं
तुम को मालूम है ‘महशर’ वो नगर हम भी चलें

बे-रंग थे आरज़ू के ख़ाके

बे-रंग थे आरज़ू के ख़ाके
वो देख रहे हैं मुस्कुरा के

ये क्या है के एक तीर-अंदाज़
जब तसके हमारे दिल को ताके

अब सोच रहे हैं किस का दर था
हम सँभले ही क्यूँ थे डगमगा के

इक ये भी अदा-ए-दिलबरी है
हर बात ज़रा घुमा फिरा के

दिल ही को मिटाएँ अब के दिल में
पछताए हैं बस्तियाँ बसा के

हम वो के सदा फ़रेब खाए
ख़ुश होते रहे फरेब खा के

छू आई है उन की ज़ुल्फ ‘महशर’
अंदाज़ तो देखिए सबा के

दौर आया है शादमानी का

दौर आया है शादमानी का
आओ मातम करें जवानी का

दर्स-ए-इबरत नहीं है ऐ दुनिया
ज़िक्र है उन की मेहर-बानी का

अब वो चुप हैं तो हो गया शायद
उन को एहसास बे-ज़बानी का

कल जो आँधी के साथ बादल छाए
मुझ को ध्यान आ गया जवानी का

उन से उन की ह

दूर ऐसे फ़लक-ए-मैहर-ए-जबीं हो जैसे

दूर ऐसे फ़लक-ए-मैहर-ए-जबीं हो जैसे
और मालूम ये होता है यहीं हो जैसे

ख़ाक छानी है भरे शहर की गलियों गलियों
एक कूचा है के फ़िर्दोस-ए-बरीं हो जैसे

तुम भी कुछ ऐसे छुपे हो के नज़र तरसे है
मैं भी यूँ ढूँढ रहा हूँ के कहीं हो जैसे

तुम तो यकता हो मगर लोग मुझे भी अब तो
यूँ तकते हैं कोई मुझ सा भी नहीं हो जैसे

यूँ छुपाता हूँ ज़माने से मैं दिल की बातें
के मोहब्बत कोई नौ-ख़ेज हसीं हो जैसे

आप आएँगे किसी रोज़ गुमाँ है मेरा
और आलम वो गुम़ाँ का के यक़ीं हो जैसे

अब तो ‘महशर’ भी हैं कुछ ऐसे ही तन्हा तन्हा
ज़ाहिद-ए-मुहतरम-ए-गोशा-नशीं हो जैसे

क़ीक़त ऐ ‘महशर’
दौर कब है ये हक़-बयानी का

 

एहसास का सवाल भी लो दूर हो गया

एहसास का सवाल भी लो दूर हो गया
अब तर्क-ए-आरज़ू मेरा दस्तुर हो गया

उठते गए हिजाब फ़रेब-ए-ख़ुलूस के
आता गया जो पास वही दूर हो गया

राह-ए-हयात मुझ से ही मंसूब हो गई
मैं इस तरह मिटा हूँ के मशहूर हो गया

हद से ज़्यादा रौशनियाँ ज़ुल्मतें बनीं
हद से सिवा अँधेरा बढ़ा नूर हो गया

ये शहर-ए-ज़िंदगी के उजालों से पूछिए
मैं किस लिए फ़रार पे मजबूर हो गया

फ़रेबों से न बहलेगा दिल-ए-आशुफ़्ता-काम अपना

फ़रेबों से न बहलेगा दिल-ए-आशुफ़्ता-काम अपना
ब-ज़ाहिर मुस्कुरा कर देखने वाले सलाम अपना

किसी की बज़्म के हालात ने समझा दिया मुझ को
के जब साक़ी नहीं अपना तो मय अपनी न जाम अपना

अगर अपने दिल-ए-बे-ताब को समझा लिया मैं ने
तो ये काफ़िर निगाहें कर सकेंगी इंतिज़ाम अपना

मुकम्मल कर गया जल कर हयात-ए-ग़म को परवाना
और इक हम थे हिरास अफ़साना भी छोड़ा ना-तमाम अपना

जहान-ए-इश्‍क़ में ऐसे मक़ामों से भी गुज़रा हूँ
हिरास बाज़-औक़ात ख़ुद करना पड़ा है एहतराम अपना

मैं दीवाना सही लेकिन वो ख़ुश-क़िस्मत हूँ ऐ ‘महशर’
हिरास दुनिया की ज़बाँ पर आ गया है आज नाम अपना

फ़िक्र-ए-तजदीद-ए-रवायात-ए-कुहन आज भी है

फ़िक्र-ए-तजदीद-ए-रवायात-ए-कुहन आज भी है
हक़-बयानी का सिला दार ओ रसन आज भी है

पासबानान-ए-चमन की रविश-ए-कोराना
वजह-ए-रूसवाई-ए-आईं-ए-चमन आज भी है

मय-ए-पिंदार के दो घूँट की बर्दाश्‍त किसे
था जो पहले वो बहकने का चलन आज भी है

रह-नुमा हैं के सर-ए-राह अड़े बैठे हैं
कारवाँ है के सज़ा-वार-ए-महन आज भी है

वक़्त के नब्ज़-शनासों से कहो तेज़ चलें
ख़ुद-फ़रेबों की जबीनों पे शिकन आज भी है

कर चुका है जो हर इक दौर में तिर्याक़ का काम
मेरे साग़र में वही ज़हर-ए-सुख़न आज भी है

वही ‘महशर’ जो निगाहों में खटकता ही रहा
अपनी बेबाक-बयानी पे मगन आज भी है

 

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