महाराज बहादुर `बर्क़'

महाराज बहादुर `बर्क़’की रचनाएँ

तेग़े-हिन्दी

तेग़े-हिन्दी[1]

साफ़ करती सफ़े-दुश्मन [2]तू जिधर चलती है
हाथ बाँधे तेरे साये में ज़फ़र [3]चलती है
* *
तुझ में वोह आब है शेरों का जिगर पानी है
दुश्मनों के लिए जुम्बिश तेरी तूफ़ानी है
तू वो है बहरे-रवाँ [4]जिससे रवानी [5]माँगे
तेरा मारा हुआ मैदाँ[6]में न पानी माँगे

* *
दिल लरज़ते हैं ज़रा तू जो लचक जाती है
चश्मे-ग़द्दार [7]में बिजली-सी चमक जाती है
अपने मरक़ज़ [8]से ज़मीं [9]रन [10]की सरक जाती है
मौत भी सामने आए तो झिझक जाती है
* *
जब कभी रन में चमकती हुई तू निकली है
ख़ौफ़[11]से हो के फ़ना[12]जाने-उदू [13]निकली है
* *
लोहा माने हुए बैठा है ज़माना तेरा
कि लबे-ज़ख़्म[14] पर अब तक है फ़साना तेरा

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