महावीर प्रसाद ‘मधुप’की रचनाएँ

साबरमती का संत

देखी निज भारत की भारी दयनीय दशा,
मर्म पे अचानक अचूक लगा नेज़ा था।
प्यारी मातृभूमि को निहारा परतंत्र जब,
दारूण व्यथा से हुआ द्रवित कलेजा था।।
देश को स्वतंत्र करने का प्रण ठान लिया,
दीन-दुखियों को दर्द दिल में सहेजा था।
सत्यव्रत धारी औ’ अहिंसा का पुजारी दृढ़,
भूतल पे विधि ने बना के उसे भेजा था।।

ऊपर धरा पे बन आया सुध-वारिधर,
लाया देश वाटिका में नूतन वसंत था।
सारे सुख-वैभव लगाए लक्ष्य दाँव पर,
धारे उर-अंतर में साहस अनंत था।।
जीता अस्त्र-शस्त्र बिना ही स्वत्व संगर को ,
ऐसा धीर-वीर गुरू ज्ञानी गुणवंत था।
रख दी फिरंगियों के राज्य की हिला के नींव,
अद्वितीय साबरमती का वह संत था।

भीषण विपत्तियों में भीत हो न पाया रंच,
ध्येय धारणा क विपरीत न कभी गया।
सत्य की सुरक्षा हित पीना विष भी जो पड़ा,
शिव के समान मधु जान उसे पी गया।।
पावन बनाया पतितों को भी लगाया कंठ,
माँ की महिमा के चाक दामन को सी गया।
ऐसे भी हैं लोग जो कि जीते जी ही जाते मर,
बापू मर के भी किंतु मरा नहीं, जी गया।।

महर्षि दयानंद

हे भारत वसुधा के गौरव! हे वेद-सुधा रस के प्रपात!
आक्रांत रूढ़ि-रोगों से क्षत-विक्षत समाज हित मलय वात!
हे पावनतम वैदिक संस्कृति के नगपति जैसे महास्तंभ!
हे अंधकार से घिरे देश में नई ज्योति के समारंभ!
कर दिया असंभव को संभव ऋषिवर तुमने बलिदानों से।
चेतनता के निर्झर फूटे, जड़ताओं की चट्टानों से।।

ये देश बना था धर्म-भीरू उज्ज्वल अतीत को बिसरा कर,
अज्ञान-तिमिर में भटक रहा था, पाखंडों को अपना कर,
वरदान रूप तुम प्रकट हुए, लेकर वेदों का तत्व-ज्ञान,
दिनकर की किरणों-सा तुमने प्रकटाया फिर स्वमिर्णम विहान,
तुमने आत्मा के अमरदीप में भरा स्नेह, बाती डाली।
सपनों के वन में बोल उठी आशा की कोकिल मतवाली।।

जय! साहस के मार्तण्ड प्रखर, जय भवसागर के महासेतु!
जय! दिव्य चेतना के शिखरों पर उड़ने वाले विजय-केतु!
जय! हे नरता के महाकाश, हिन्दू संस्कृति के कर्णधार!
आसेतु हिमाचल वेदध्वज फहराने वाले ऋषि उदार!
जय हो ऋषियों के ओज तेज, जय हो मुनियों के अमर ज्ञान!
जय ध्वस्त ग्रस्त मानवता के प्रश्नों के उज्ज्वल समाधान!

निज लक्ष्य-प्रप्ति के लिए लगाई तुमने प्राणों की बाज़ी,
हो कर परास्त लौटा, जो आया पोप या कि मुल्ला-काज़ी,
जो बना प्राण-घातक उसको भी विहँस क्षमा का दान दिया,
शरणागत दानव को तुमने, मानवता का वरदान दिया,
देवत्व मूर्ति तुम दया और आनंद लिए उर में अमंद।
नित रहे देश-नैया के कुशल खिवैया ऋषिवर दयानंद।।

तुमने जो फूँका मंत्र, राष्ट्र के आँगन में साकार हुआ,
तुमने जिस मिट्टी के ढेले को छुआ वही अंगार हुआ,
तुमने जो बोये बीज देश रत है उनके ही बोने में,
वेदों का ध्वज लहराता है दुनिया के कोने-कोने में ,
वह अमिट रहेगा संसृति में तुमने जो यश विस्तारा है।
पथ-दर्शक सबाका बना आज, ‘सत्यार्थ प्रकाश’ तुम्हारा है।।

तुम दुखी बाल-विधवाओं के भोले मुख की मुस्कान बने,
अपनाकर दलित-अछूतों को मानव से देव महान बने,
जीवन के रोते पतझर में, तुम खिला गए मधुमास नया,
अपने साहसमय कृत्यों से लिख गए एक इतिहास नया,
इस धरती का कण-कण गरिमा के गीत तुम्हारें गाएगा।
ये देश तुम्हारे उपकारों से उऋण नहीं हो पाएगा।।

शत-शत नमन

जाम शहादत का पीकर जो दुनिया में हो गए अमर।
सौ-सौ बार नमन करता मैं उनको नत-मस्तक होकर।।

थे सपूत माता के निज कर्त्तव्य निभा कर चले गए,
मरे स्वयं पर मृत समाज को, अमृत पिला कर चले गए,
माँ के चरणों में सादर सिर-सुमन चढ़ा कर चले गए,
देशभक्ति के गीत अभय आजीवन गाकर चले गए,
गर्व आज करता है भारत जिनकी गौरव-गाथा पर।
सौ-सौ बार नमन करता मैं उनको नत-मस्तक होकर।।

कूद पडे़ जो स्वत्व-समर में डरे न लाठी, गोली से,
दिशा-दिशा को किया निनादित इंक़लाब की बोली से,
जूझ पड़े निश्शस्त्र और निर्भीक शत्रु की टोली से,
मातृभूमि की पूजा अर्चना रक्त की रोली से,
वार दिया प्रण पर प्राणों को कभी न जो चूके अवसर।
सौ-सौ बार नमन करता मैं उनको नत-मस्तक होकर।।

नौनिहाल माँ केकितने ही हँसते-हँसते जेल गए,
पड़ी मुसीबत जो भी सिर ख़ुशी-ख़ुशी सब झेल गए,
आज़ादी के दीपक में ,भर निज लोह का तेल गए,
शान बचाने को स्वदेश की स्वयं जान पर खेल गए,
चूम लिया फाँसी का फंदा नव-उमंग अंतर में भर।
सौ-सौ बार नमन करता मैं उनको नत-मस्तक होकर।।

बलि-पथ को स्वीकार कर लिया देश प्रेम की पी हाला,
उमड़ पड़ा था दीवानों का, दल बादल-सा मतवाला,
अमित यातनाएँ सहकर भी नहीं प्रतिज्ञा को टाला,
है जिनका यशगान जगत् को सुना रहा जलियांवाला,
जन-जन के हैं हृदय-पटल पर अंकित जिनके स्वर्णक्षर।
सौ-सौ बार नमन करता मैं उनको नत-मस्तक होकर।।

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